“आखिर क्यों अमेरिका की मॉनिटरिंग लिस्‍ट से बाहर हुआ भारतीय मुद्रा?”

हाल ही में अमेरिका ने भारत और स्विट्ज़रलैंड को अपनी मुद्रा निगरानी सूची से बाहर कर दिया है। गौरतलब है कि अमेरिका ने मुद्रा सम्बन्धित क्रियाकलापों पर नज़र रखने के लिए भारत, चीन और जापान के साथ-साथ जर्मनी, दक्षिण कोरिया और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों को भी अक्टूबर 2018 में निगरानी सूची में शामिल किया था।

अमेरिका ने पहली बार मई 2018 में संदेहास्पद विदेशी मुद्रा नीतियों वाले देशों की निगरानी सूची में भारत को शामिल किया था। वर्तमान में इस सूची में केवल चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, इटली, आयरलैंड, सिंगापुर, मलेशिया और वियतनाम शामिल हैं।

मुद्रा निगरानी सूची

अमेरिकी ट्रेज़री विभाग अर्द्ध-वार्षिक रिपोर्ट जारी करती है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के विकास पर नज़र रखी जाती है तथा उनकी विदेशी विनिमय दरों का निरीक्षण किया जाता है। चीन अपनी लगातार कमज़ोर मुद्रा के कारण निगरानी सूची में बना हुआ है।

हालांकि इस सूची में शामिल होना किसी प्रकार के दंड और प्रतिबंधों के अधीन नहीं होता है। यह निर्यात लाभ हासिल करने के लिए मुद्राओं के अवमूल्यन सहित वित्तीय बाज़ारों में देश की वैश्विक वित्तीय छवि को नुकसान पहुंचाता है।

मानदंड

अमेरिका ने कुछ निश्चित घटनाक्रमों के बाद प्रमुख व्यापारिक भागीदारों की मुद्रा निगरानी सूची से भारत को हटाने का निर्णय लिया। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “भारत को सूची से इसलिए बाहर किया गया है क्योंकि वह तीन मानदंडों में से केवल एक में ही प्रतिकूल है। वह मानदंड है अमेरिका के साथ बायलैटरल सरप्लस।

भारत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मानकों के अनुसार समुचित विदेशी मुद्रा भंडार रखता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और स्विट्ज़रलैंड ने वर्ष 2018 में विदेशी मुद्रा खरीदारी में काफी कमी की है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कोई भी देश अपनी मुद्रा को बेचकर उसका मूल्य घटा सकता है। इससे अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उसका निर्यात सस्ता और प्रतिस्पर्द्धी हो जाता है।

इस कार्रवाई का प्रभाव

यह भारत के लिए एक सकारात्मक गतिविधि है क्योंकि अब भारत मुद्रा निगरानी सूची के दायरे से बाहर हो गया है। सूची में शामिल देशों को मुद्रा हेरफेर करने वाले देश के रूप में वर्णित करने की संभावना रहती है। वे देश जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अनुचित प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ प्राप्त करने के लिए मुद्रा विनिमय दर में हेरफेर करते हैं, उन पर अक्सर मुद्रा हेरफेर करने वाली अर्थव्यवस्था का टैग लगा दिया जाता है।

नरेन्द्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। फोटो साभार: Getty Images

भारत के इस सूची से बाहर होने से निश्चित रूप से भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार संबंधों में बातचीत का मार्ग प्रशस्त होगा और व्यापार से संबंधित मतभेदों को कम करने में सफलता मिलने की भी उम्मीद है, विशेष रूप से सामान्यीकृत प्रणाली के संदर्भ में।

संयुक्त राज्य अमेरिका का हालिया कदम भारत सरकार के हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिलों पर आयात शुल्क को 100% से घटाकर 50% करने के फैसले को पूरक बना देगा। इसका कारण यह है कि अक्सर अमेरिका द्वारा भारत पर “टैरिफ किंग” के रूप में काम करने का आरोप लगाया जाता रहा है।

अमेरिका का पक्ष है कि भारत, अमेरिकी उत्पादों पर अधिक टैरिफ लगाता है। यह कदम अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार में भारत की वैश्विक वित्तीय छवि में भी सुधार करेगा।

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