“स्कूली लड़कियों ने बताया, फ्री मेट्रो राइड से ले सकेंगी मनपसंद स्कूल में दाखिला”

हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा महिलाओं को फ्री मेट्रो राइड की सुविधा मुहैया कराने की घोषणा की गई है। दिल्ली में विधानसभा चुनाव नज़दीक है, इसलिए प्रथम दृष्टया में तो यह फैसला चुनावी स्टंट लग सकता है। इस फैसले का फायदा चुनाव में ज़रूर हो सकता है परन्तु इसके आगामी परिणाम को देखेंगे तो चुनावी स्टंट कहना शायद सतही विरोध के अलावा कुछ ना लगे।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट के हालात में हो सकता है सुधार

मेट्रो के आने से पहले डीटीसी बस दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का एक मात्र सहारा हुआ करता थी। वर्तमान सरकार में डीटीसी बसों की संख्या में भारी गिरावट आई है। सेन्टर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक आंकड़े के मुताबिक अगर दिल्ली सरकार का बसों के प्रति ऐसा रवैया रहा तो 2025 तक डीटीसी बस विलुप्त हो जाएगी। ऐसी स्थिति में दिल्ली मेट्रो एक मात्र पब्लिक ट्रांसपोर्ट रह जाएगा। दिल्ली सरकार का मास्टर प्लान 2020 तक अस्सी प्रतिशत सवारी को पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर आश्रित करने का है। दिल्ली में बसों की स्थिति को देखकर मास्टर प्लान का बेड़ा गर्क होता नज़र आता है।

डीएमआरसी के फरवरी 2018 आंकड़े के मुताबिक पिंक लाइन और मेजेंटा लाइन मेट्रो की शुरुआत के बाद मेट्रो की सवारी में 27 लाख की बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ोतरी के बावजूद केवल 30 प्रतिशत कामगार महिलाएं ही मेट्रो में सफर करती हैं। इस स्कीम के बाद यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी लाज़िम तौर पर बसों में भीड़ को कम करेगी।

फ्री मेट्रो राइड डीटीसी बसों की निर्भरता को भी कम करेगा। डीटीसी बस की जैसे-जैसे निर्भरता कम होगी, बसों की हालात में सुधार करने का भी पर्याप्त समय मिल जाएगा। दिल्ली सरकार साफ नियत से काम करना चाहे तो इस समय का फायदा उठा सकती है। 2020 का मास्टर प्लान सफल हो या ना हो परन्तु पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत में सुधार लाया जा सकता है।

जेंडर समानता को करेगा एडरेस

इस पहल से लैंगिक समानता पर भी असर पड़ेगा। महिलाओं की मौजूदगी पब्लिक प्लेस में बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। यूएन जेंडर फ्रेंडली सिटीज़ की ज़रूरत को रेखांकित कर चुका है।  पब्लिस प्लेस में निम्न वर्गीय महिलाओं की सहभागिता के सवाल पर दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर सुजाता बताती हैं,

उस निम्न वर्गीय महिलाओं के बारे में सोचिए, जो त्रिलोकपुरी से लाजपत नगर कोठी में काम करने जाती हैं। कितना समय का बचत होगा? आप अवसर देंगे नहीं और सामर्थ्य की बात करेंगे।

महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना क्यों ज़रूरी है?

फोटो प्रतीकात्मक है। सोर्स-Getty

यूएन जेंडर फ्रेंडली सिटीज़ बनाने पर ज़ोर देती है। यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की आधी आबादी शहरी क्षेत्र में रहती है। 95 प्रतिशत शहरी विकास विकासशील देशों में हो रहा है लेकिन इस समय शहरों में लैंगिक असामनता शहरी विकास के रास्ते में रोड़ा बन रहा है। दिल्लीवासी यूएन की इस रिपोर्ट को कुछ मिनट के लिए अपने सामने रखें और खुद से पूछें क्या यह ज़रूरी नहीं कि इस असामनता को खत्म किया जाए? यह माना जा सकता है कि फ्री राइड पूर्णतः असामनता को खत्म नहीं कर सकता है परन्तु उस दिशा में सार्थक कदम ज़रूर साबित हो सकता है।

स्कूली स्टूडेंट्स को मनमाफिक जगह पढ़ने में करेगा मदद

फ्री राइड के सवाल पर स्कूली छात्रा शिवानी चहक उठती है। चेहरे पर खुशी की असीमित रेखाएं खिच जाती हैं। शिवानी बताती है,

मम्मी-पापा की आपस में बात नहीं होती है। पापा मिल में काम करते हैं लेकिन घर में कोई मदद नहीं करते। इस बार दसवीं पास की हूं,मम्मी पास के खानपुर नंबर वन स्कूल में दाखिला दिलाना चाहती हैं, क्योंकि दूर जाने में किराया का वहन मुश्किल है। मैं लोधी गार्डन के पास वाली स्कूल में पढ़ना चाहती हूं। वहां स्कूल कोएड है। मैं भी समाज को समझना चाहती हूं। इस फैसले के बाद मम्मी को मना लूंगी और लोधी गार्डन में दाखिला लूंगी।

सुजाता बताती हैं,

स्कूल दूर होने और उसका किराया वहन ना कर पाने की स्थिति में सरकारी स्कूल की कई लड़कियां ग्यारहवीं में मनपसंद कोर्स नहीं ले पाती हैं। पास के स्कूल से ही पढ़ाई करने पर मजबूर हो जाती हैं। आर्थिक दिक्कतें लड़कियों की मोबिलिटी को बहुत ज़्यादा प्रभावित करती है।

लैंगिक समानता को धरातल पर उतारने में फ्री राइड मदद करेगा। स्कूली छात्रा मनमाफिक जगह दाखिल ले सकेंगी। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सुधारने में मदद मिल सकती है। अगर कोई चुनावी स्टंट सीधे तौर पर जनता को लाभ पहुंचाता है तो उसे महज़ चुनावी स्टंट कहकर नकारना उचित नहीं होगा, बल्कि नागरिक ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हुए सरकार पर जल्द-से-जल्द फैसले को कार्यान्वित करने के लिए दबाव बनाना उचित होगा।

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