आर्टिकल 15: “अनुभव सिन्हा इस विषय पर फिल्म बनाने के लिए हिम्मत चाहिए थी”

पिछले कुछ दिनों से निजी कामों में मसरूफ होने के कारण ‘आर्टिकल 15’ देख नहीं पाया था। फिल्म का मज़ा खराब ना हो इसके डर से रिव्यू भी नहीं पढ़ा था। दिमाग में एक बात क्लियर थी कि यह फिल्म देखनी है।

मैंने फिल्म को लेकर जो पूर्वाग्रह बनाए थे, वह बिल्कुल गलत निकले। यह फिल्म उम्मीद से कई ज़्यादा गहरी और सोशल मैसेज देने वाली फिल्म है। फिल्म का हर सीन आपको कुछ गंभीर बात बता रहा होता है, चाहे वह अयान का अपनी बीवी से बात करना हो या सीबीआई से बात करना। फिल्म ने बाबा साहब, भगत सिंह और पाश को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है।

इस मुद्दे पर फिल्म बनाने के लिए चाहिए थी हिम्मत

फिल्म आर्टिकल 15 का दृश्य। फोटो सोर्स- Youtube

इस फिल्म में जो दिखाया गया है उसके बारे में एक आम भारतीय अच्छे से वाकिफ है और एक आम संवेदनशील इंसान को इससे फर्क पड़ना चाहिए। होता लेकिन इसके उलट है, हम इतने सहज हो चुके हैं कि हमें इन सब चीज़ों से फर्क नहीं पड़ता है। हर रोज़ अखबार दलितों पर अत्याचार की कहानियों से भरा होता है पर हमें फर्क नहीं पड़ता है। ऐसे में अव्वल तो यह है कि फिल्म बनाना ही बड़ी हिम्मत का काम है। अनुभव सिन्हा को लगातार धमकियां मिल रही हैं, कोई ज़ुबान काटने की बात कर रहा है, तो कोई गला काटने की। खैर फिल्म पर आते हैं।

जैसा कि मैं पहले भी कह चूका हूं कि फिल्म ने हमें नया कुछ नहीं बताया है, बस हम जिन मुद्दों से आंख मूंदकर भाग रहे थे, उनपर बात करने को मजबूर किया है। जातिगत संघर्ष फिल्म ने बताया ही है पर यह संघर्ष दलितों के बीच भी आपस में होता हुआ दिखाया है। जब अयान सभी से उनकी जातियां पूछ रहा होता है, तो जाटव जी कहते हैं,

साहब हम SC/ST में ऊंचे हैं और हम दूसरी नीची जातियों का छुआ नहीं खाते हैं।

एक सीन जब निषाद हड़ताल का ऐलान करता है, तब पुलिस स्टेशन पूरा गटर के पानी से भर जाता है और कोई भी माय का लाल उस गटर में उतरकर उसे साफ नहीं करने वाला होता है। हड़ताल खुलने के बाद जो दृश्य आप देखते हैं उससे आपको विचलित होना चाहिए और अगर वह आपको विचलित नहीं करता है तो आप जातीय अंधता में इतना विलीन हो चुके हैं कि आपके लिए इंसानियत के कोई मायने नहीं रह गए हैं।

जिस गटर के पास से गुज़रते हुए लोग अपने नाक पर रुमाल रख रहे थे, उसी गटर में इंसान अपना नाक पकड़कर उतर जाता है। उस गटर में जो उतरता है, वह खुशकिस्मत था कि वापस आ गया वरना सैकड़ों लोग ऐसे हैं, जो आपकी टट्टी से भरे गटर में आपकी टट्टी साफ करने उतरते हैं और वापस तक नहीं आते।

आज़ादी के 70 सालों बाद भी हमारे पास मैनुअल स्कैवेंजिंग का कोई विकल्प नहीं है, तो हमें भी उसी गटर में डूबकर मर जाना चाहिए, क्योंकि साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार जितने सैनिक सीमा पर शहीद नहीं होते हैं और जितने लोग आतंकवाद से नहीं मरते हैं, उससे ज़्यादा लोग गटर साफ करते हुए मर जाते हैं।

अब आते हैं औकाद की बात पर, अयान ने सीबीआई अफसर के सामने कहा था,

वे लोग चाहते तो इनका रेप करके कही फेंक भी सकते थे पर उन्होंने इन्हें मारकर पेड़ पर लटकाया ताकि एक उदाहरण स्थापित कर सके कि आज के बाद किसी ने ऐसी ज़ुर्रत की तो उसका अंजाम मौत होगा।

अफसोसजनक बात यह है कि मैं खुद कुछ ऐसे लोगों को जानता हूं (हालांकि वे मुझे दोस्त मानते हैं) जिनकी भाषा वही होती है, जो फिल्म में निहाल सिंह की होती है,

ये लोग, वे लोग, इनकी औकात उनकी जात, उनका काम, वे ऐसे

ये सारी चीज़ें सुनी हुई हैं। पिछले साल जो 2 अप्रैल का आंदोलन हुआ था, उसके बाद फेसबुक पर वायरल मैसेज सभी ने पढ़े, जब कुछ कुंठित मानसिकता के लोगों ने लिखा था,

भारत बंद हो गया हो तो मेरी नाली का गटर साफ कर लो

यह तो एक उदाहरण मात्र है, ऐसे कई सारे मैसेज वायरल हुए थे। उसी मानसिकता के लोग घोड़ी पर चढ़े दूल्हे को मारते हैं, तो कभी मूंछ रखे युवक को गौ हत्या के शक में मारते हैं। हरिजन बहुजन सबकुछ बन रहे हैं, मैं कहता हूं क्यों बनाना है किसी को हरी का जन? हर व्यक्ति जो इस धरती पर है वह हरिजन ही है क्या? कोई राक्षस का जन भी है क्या? नहीं ना तो फिर अलग पहचान की क्या ज़रूरत है?

महंत जी आए, दलित ब्राह्मण एकता का सन्देश लेकर एक साथ खाना खाने के लिए और वह खाना और थाली अपने साथ लेकर आए। यह ढोंग पिछले साल हकीकत में हुआ था, दलित के घर पहुंचे योगी के मंत्री ने होटल से मंगाकर खाना खाया था। वोट के लिए यह समाज हमेशा एक भीड़ में तब्दील हो जाता है। सुवर ताल में चलते हुए राजनीति की बात में फिल्म ने स्पष्ट किया कि कैसे यूपी में वोट जात के आधार पर दिए जाते हैं।

पुलिस व्यवस्था की असली पोल खोली है फिल्म ने

Article 15 review
फिल्म आर्टिकल 15 का दृश्य। फोटो सोर्स- Youtube

फिल्म में पुलिसिया व्यवस्था को बेहतर तरीके से बताया गया है, मेरा हालिया निजी अनुभव है जो मैं आपसे कुछ दिनों में शेयर करूंगा पर एक बात समझ लीजिये पुलिस प्रशासन की हालत बहुत खस्ता है। जब तक आपके पास बड़ा जैक नहीं है, तब तक एक्शन होना तो दूर FIR तक नहीं होती है। जब प्रार्थी गरीब अशिक्षित दलित हो तो क्या ही कहने।

इस देश में पुलिस और न्याय जैसा कुछ नहीं है। मैं कानून का छात्र हूं, पत्रकारिता में ज़बरदस्ती घुसने की कोशिश कर रहा हूं। दोनों ही मामलों में मुझे कानून पर विश्वास होना चाहिए और है भी पर मुझे पुलिसिया व्यवस्था पर बिलकुल भी विश्वास नहीं है। इस बात की गैरेंटी बहुत काम है कि आप पुलिस के पास जाओ और वह आपको न्याय दिला दे।

जब लड़कियों के परिवार वाले अयान के पास अपनी फरियाद लेकर आ रहे होते हैं, तब फरियादी दलित समुदाय के लोग दूर खड़े होते हैं और पानी भी किसी और के हाथ से पीते हैं। अयान के पूछने पर जूनियर कहता है कि सर यह आपके सामने ग्लास में पानी नहीं पिएंगे। दरअसल, वह उनकी गलती नहीं है, उन्हें पैदा होते ही एक बात दिमाग में फिट कर दी जाती है कि भाई तुम नीच हो और तुम्हें इन इन बातों का ख्याल रखना है। आप विश्वास ना करें पर आज भी मैं अपने एक दोस्त के आंगन तक नहीं जाता हूं। मतलब कभी गया नहीं हूं और उसका अंदर का कमरा तो देखा भी नहीं है, क्योंकि बीच में चूल्हा और परेण्डा (जहां पानी रखा होता है) आता है। जब मैं बहुत छोटा था तभी मेरे दिमाग में यह बात फिट कर दी गई थी कि मैं यहां से आगे नहीं जा सकता हूं।

यह बात आप मैं और खुद अनुभव सिन्हा जानते होंगे कि कुछ नहीं होने वाला है, फिल्म बनेगी कॉन्ट्रोवर्सी होगी, पैसे कमाएंगे और घर लौट जाएंगे, होना जाना कुछ नहीं है, क्योंकि हम आदि हो चुके हैं, सच सुनना हमें पसंद नहीं है। जातिवाद पर बहस अच्छी लगती है पर खुद की बिना बुराई किए।

मुसलमानों को जातिवाद पर बहस बहुत पसंद है पर जब उनसे पसमांदा मुसलमानों के अधिकारों के बारे में सवाल कर लो, तो पजामा ऊंचा करके भाग खड़े होंगे। जब उनसे पूछ लो भाई तुम शाह फकीरों के यहां खाना क्यों नहीं खाते तो बगले झांकने लगते हैं। कोई भी शोषक शोषित को अधिकार नहीं दे सकता, चाहे वह ब्राह्मण हो या शेख सय्यद दोनों से अधिकार छीनने पड़ेंगे।

जिस शख्स का कभी शोषण नहीं हुआ है, उसके लिए यह सिर्फ एक कपोल खोखला शब्द है। कई लोग फिल्म को दलित विरोधी भी कह रहे हैं, मुझे यह फिल्म कहीं से दलित विरोधी नहीं लगी है। समाज को आइना दिखाना सिनेमा का काम होता है, साथ ही पत्रकारों का भी, वह बात अलग है आजकल पत्रकार रहे नहीं हैं।

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