“कर्नाटक राजनीति में संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ रही हैं”

कर्नाटक में राजनीति का नाटक खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। काँग्रेस के दो, बसपा के एक और दो निर्दलीय विधायक सदन से गैर-हाज़िर हैं। इन 20 विधायकों के साथ स्पीकर को भी हटा दें, तो सदन में सदस्यों की संख्या 203 बच रही है।

ऐसे में बहुमत के लिए 102 सदस्यों की संख्या चाहिए। इस स्थिति में काँग्रेस-जेडीएस के पास 98 और भाजपा के पास 105 विधायक हैं और बहुमत परीक्षण आज यानी शुक्रवार को होना है। 20 विधायक गैर-हाज़िर ही रहे तो कुमारस्वामी की सरकार का गिरना तय है।

आज 1:30 बजे तक कर्नाटक में बहुमत परीक्षण हो जाना चाहिए। यह कर्नाटक के राज्यपाल ने कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया है या उनसे अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने भी यह फैसला सुना दिया है कि काँग्रेस के विधायक दल के नेता सीतारमैय्या अब व्हिप भी नहीं जारी कर सकते हैं। यानी कि काँग्रेस अपने विधायकों को विधानसभा में उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। 

कर्नाटक सरकार के 15 बिकाऊ विधायकों की सदस्यता तो रद्द हो सकती है, क्योंकि उन्होंने उस पार्टी से गद्दारी कर दी है, जिससे उन्होंने चुनाव लड़े हैं। उन्होंने एक तरह से पार्टी छोड़ दी है, जबकि भारतीय संविधान की अनुसूची 10 कहती है कि

अगर कोई भी व्यक्ति किसी पार्टी से चुनकर विधानसभा या लोकसभा जाता है, तो वह सदन का सदस्य रहते हुए नहीं छोड़ सकता है लेकिन बहुमत परीक्षण में राज्यपाल का हस्तक्षेप वाकई अलोकतांत्रिक है। जबकि यह अधिकार सदन के अध्यक्ष का होता है। 

यह सभी जानते हैं कि भारत में राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और यह राज्यपाल केंद्र सरकार के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाते हैं। कर्नाटक में भी यही हो रहा है। बहुमत परीक्षण कराने के आदेश को राज्यपाल की अपील कहा जा रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपाल इसके लिए आदेश नहीं दे सकता है। 

हर कोई जानता है कि उन बिकाऊ या बागी विधायकों ने किसके दबाव या लालच में आकर मंत्रीपद के लिए इस्तीफा दिया है। संवैधानिक और लोकतांत्रिक नैतिकता नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं है। जनता ने जिन लोगों को अपने लिए 5 सालों के लिए चुना था, वही अब जनता के साथ धोखा कर रहे हैं।

दलीय राजनीतिक व्यवस्था में जनता सिर्फ प्रत्याशी को अपना मत नहीं देते, बल्कि उस दल या पार्टी को भी मत देते हैं, जिससे कि वह प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा होता है। अब ऐसे में जब उस सदस्य ने इस्तीफा दे दिया है, तो वह जनता और पार्टी दोनों के साथ गद्दारी कर रहा है। 

दल बदल कानून का तो महत्व ही नहीं दिख रहा है। कर्नाटक की वर्तमान राजनीतिक परिस्तिथियों में तो यह बिल्कुल ही व्यर्थ मालूम पड़ रहा है। अब हमें वास्तव में किसी दलीय दृष्टिकोण से हटकर यह सोचना चाहिए कि कर्नाटक में जो भी हो रहा है, वह संवैधानिक मूल्यों के अनुसार है या उसके खिलाफ।

यह दल बदल लोकतंत्र के लिए कितना खतरनाक है?

हम यह भी जानते हैं कि उन विधायकों ने इस्तीफा रणनीतिक विचाराधारा के कारण तो दिया ही नहीं है, क्योंकि आज के दौर में भाजपा के अलावा किसी और राजनीतिक पार्टी की कोई विचारधारा है ही नहीं। उन्होंने सिर्फ दबाव या लालच में आकर जनता को धोखा देते हुए इस्तीफा दिया है। 

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