अनुच्छेद 370: “क्या हम कश्मीरी पंडितों की खुशियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?”

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद खुशी वे लोग मना रहे हैं, जिन्हें कश्मीर में आईएसआईएस के लहराते झंडे देख गज़वा-ए-हिन्द की आहट सुनाई देती थी और अपने सैनिकों पर पड़ती लातें जिनकी नींद उड़ा देती थी। जिनकी देशभक्ति को ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ सरीखे नारे  घायल करते थे, क्यों ना खुश हों वे लोग?  

यह देश 1947 में नहीं बना है। इस देश का इतिहास 5000 साल पुराना है। कुछ वर्षों पहले अगर कोई भूल हुई थी, तो उसे सही कर लेना कहां गलत है? जो लोग इस निर्णय पर प्रश्न उठा रहे हैं कि समूचे कश्मीर को भ्रम में रखकर, कर्फ्यू लगाकर यह निर्णय किया गया, उनसे मात्र एक प्रश्न है कि जब भारत का विभाजन हुआ था तब भारतीय जनता से उनकी राय पूछी गई थी क्या?

क्या उस वक्त जनमत संग्रह हुआ था? कुछ नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने देश के टुकड़े करवा दिए और जनता को दंगों में झोंक दिया।

जनता से नहीं पूछी गई थी सहमति

जब 27 अक्टूबर 1947 को पंडित नेहरू एवं महाराजा हरिसिंह ने ‘जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय पत्र’ पर हस्ताक्षर किए, तब हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर की जनता से पूछा था कि उसकी क्या राय है? खैर, राजतंत्र में राजा का निर्णय सर्वमान्य होना नैसर्गिक था।

अनुच्छेद 370
फोटो साभार: Getty Images

उन्हीं हरिसिंह ने जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 की शर्त के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, तब तय यह भी था कि यह धारा अस्थाई और संक्रमणकालीन है। यानि हरिसिंह ने भी यही सहमति जताई कि भविष्य में जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय उन्हें मंज़ूर होगा और उपबंध के पत्र पर हस्ताक्षर किए गए।

फिर कश्मीरी जन-मन में यह भ्रम किसने फैलाया कि अनुच्छेद 370 स्थाई है और यही उनकी आज़ादी का कारक बनेगा? असली दोषी वे लोग हैं, जिन्होंने यह भ्रम फैलाया और फैलने दिया।

कश्मीरी पंडित की खुशी

असल में यह एक सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध ढंग से भारत को तोड़ने की साज़िश थी। गज़वा-ए-हिन्द का एक और पड़ाव पूरा करने की कोशिश थी, जिसकी शुरुआत 1989 में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन से हुई थी। धीरे-धीरे घाटी के लोगों के मन में अनुच्छेद 370 के स्थायित्व एवं कश्मीर की आज़ादी का भ्रम फैलाया गया और आतंक को चरम पर पहुंचाया गया।

जब कश्मीर के झंड़े छोड़ आईएसआईएस के झंडे लहराए जाने लगे, तब हमें समझ जाना चाहिए था कि बात कश्मीरियत की तो नहीं ही है। इस साज़िश को कुचला गया। यह हर भारतीय जो भारत को मात्र ज़मीन का टुकड़ा ना समझकर जीवंत चेतना समझता है, उसके लिए खुशी का समय है।

जो यह कह रहे हैं कि इस निर्णय से कश्मीरी खुश नहीं हैं, वे ज़रा कश्मीरी पंडितों के चेहरों को भी देख लें। कश्मीरी पंडित भी कश्मीरी ही हैं और इस निर्णय से उनसे अधिक खुश और कोई नहीं है मगर इसपर चर्चा ही नहीं हो रही है। आघिर क्या वजह है कि हम उनकी खुशियों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं? जो खुश नहीं हैं, वे निश्चित ही भ्रम में जी रहे थे। अब जब भ्रम टूटा है, तो दर्द तो होगा ही लेकिन इसका दोषी भारत संघ नहीं, भ्रम फैलाने वाले और भ्रमित होने वाले खुद हैं।

नोट- लेख में प्रस्तुत बातें और ऐतिहासिक तथ्य एम. लक्ष्मीकांत की पुस्तक ‘भारत की राजव्यवस्था’ से ली गई है।

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