कविता: मैंने पीछे मुड़ कर देखा, लेकिन घर ना था

यहां एक घर होता था,

जिसमें बाकी घरों की तरह बच्चे खेलते थे, 

बूढ़े कहानियां सुनाते और औरतें चूल्हा -चौका करती थी।

 

अचानक एक रात किसी के चिल्लाने से नींद टूटी,

तो पता चला कि नदी सामने गरजती हुई खड़ी है।

फिर क्या, रातों-रात घर और उसके लोग बांध के दूसरी तरफ

लेकिन जाते वक्त मैंने पीछे मुड़ कर देखा, 

तो घर के होने की बस एक उम्मीद बची थी ,

बाकी का सब कुछ पानी लील चुका था।

 

फिर टेलीग्राम हुआ,

तार भेजे गए।

तो साहेब लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में हालात का मुआयना करने आए

और अगले दिन अखबार में खबर छपी,

“नेपाल ने छोड़ा दो लाख क्यूसेक पानी हज़ारों घर तबाह, 6 मरे, 36 लापता”

 

एकाध महीने बाद जब गांव लौटना हुआ,

तो रास्ते में अखबार का एक टुकड़ा मिला

“बाढ़ मरम्मत कार्य के लिए निविदा आमंत्रित”

तभी आसमान में कुछ उड़ने की आवाज़ सुनाई दी,

तो मैं उम्मीद भरी निगाहों से

हवाई दौरे पर निकले मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर की ओर निहारता रहा,

और सामने पड़ी घर की टूटी हुई ईंटें

अपनी मौत पर आंसू बहा रही थी,

तभी मुझे याद आया कि यहां मेरा घर होता था।

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