“फाइनल इयर की स्टूडेंट होते हुए नौकरी जाने की खबरें मुझे डरा रही हैं”

भारत का हर युवा आज एक डर के साये में जी रहा है, जिसमें ज़्यादा संख्या उन युवाओं की है, जो इस साल ग्रैजुएशन कंप्लीट करने वाले हैं। ग्रैजुएशन के बाद वह सरकारी नौकरियों की तलाश में निकल जाते हैं, क्योंकि आज भी युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी ही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि प्राइवेट सेक्टर में युवाओं की दिलचस्पी नहीं है मगर सरकारी नौकरी का ख्वाब हर एक युवा की आंखों में पलता है।

मेरा भी ग्रेजुएशन इस साल कंप्लीट होने को है। इसके बाद शायद मैं भी नौकरी की दौड़ में शामिल हो जाऊंगी लेकिन क्या सिर्फ दौड़ में शामिल होने से मुझे नौकरी मिल जाएगी? यहां मैंने सरकारी या प्राइवेट नौकरी का ज़िक्र नहीं किया है, क्योंकि मंदी के इस दौर में कोई भी नौकरी मिलना बेहद मुश्किल हो गया है। मेरे ही कई सीनियर्स नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं।  

जॉब की बात युवाओं को डराने लगी है 

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फोटो प्रतीकात्मक है। फोटो सोर्स- Getty

इस बीच अगर खबर आती है कि प्राइवेट सेक्टर से कर्मचारियों को निकल दिया गया है, तो एक पल को हर युवा डर जाता है और यह डर लाज़िम भी है, क्योंकि अगर जॉब ही नहीं होगा तो एक युवा क्या करेगा?

अभी हाल ही में पारले-जी कंपनी से एक खबर आई है, जहां से 10,000 कर्मचारियों को निकाल दे सकने का मामला सामने आया है। कंपनी की मांग है कि सरकार 100 रुपए प्रति किलो या उससे कम कीमत वाले बिस्किट्स पर जीएसटी घटाए। अगर सरकार यह मांग नहीं मानती है तो उसे कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ेगी, क्योंकि सेल्स कम होने से कंपनी को घाटा हो रहा है। हालांकि पारले कंपनी की सेल 10,000 करोड़ से ज़्यादा है और वहां 1 लाख कर्मचारी काम करते हैं।

टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी संकट में है

इसके साथ ही टेक्सटाइल इंडस्ट्री की हालत भी खराब है। कताई उद्योग मंदी की मार झेल रहा है। देश के करीब एक-तिहाई कताई उत्पादन क्षमता बंद हो चुके हैं और जो मीलें चल रही हैं, वे भी भारी घाटे का सामना कर रही हैं। अगर यह संकट दूर नहीं हुआ तो, हज़ारों लोगों की नौकरियां जा सकती हैं। कॉटन और ब्लेंड्स स्पाइनिंग इंडस्ट्री कुछ उसी तरह के संकट से गुज़र रही है, जैसा कि 2010-11 में देखा गया था।

नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन (NITMA) के अनुसार राज्य और केंद्रीय जीएसटी और अन्य करों की वजह से भारतीय यार्न वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के लायक नहीं रह गया है। जिस कारण हज़ारों लोगों की नौकरियां संकट में पड़ सकती हैं। भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री 10 करोड़ लोगों को रोज़गार प्रदान करता है, जिससे यह साफ है कि लोगों में बेरोज़गारी दर की संख्या किस हद तक बढ़ जाएगी।

प्राइवेट कंपनियों में अवसर लेकिन डर का माहौल

प्राइवेट कंपनियों में भी रोज़गार के काफी अच्छे अवसर हैं लेकिन प्राइवेट कंपनियों में काम का वक्त, सैलरी और अनिश्चिता का वातावरण रहता है कि कब वहां के कर्मचारियों को निकाल दिया जाए। हालांकि इसके खिलाफ कर्मचारी अपनी आवाज़ उठा सकते हैं। 

सरकार केवल नौकरियां देने का वादा करती है, जिससे युवाओं को भरोसा तो मिल जाता है लेकिन सरकार वादे पूरे करने से पहले ही जुमलों में फंसा देती है। कुछ महीने पहले ही खबर आई थी कि पिछले 45 सालों में बेरोज़गारी का दर सबसे ज़्यादा रहा। जिस पर सरकार ने सीधे तरीके से कुछ नहीं कहा।

सवालों के साथ जी रहा है युवा 

यह बात केवल मेरे मन में ही नहीं बल्कि हर उस युवा के मन में अवश्य उठती होगी कि क्या उसे कोई नौकरी मिलेगी? क्या उसे अपनी ज़िंदगी में कभी स्थिरता का अनुभव होगा? क्या ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी होते ही नौकरी मिलेगी? इस तरह के अनेक सवालों के साथ आज का युवा जी रहा है। यह तो मैंने केवल आने वाले समय का आईना दिखाया है कि आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा का स्तर क्या होगा?

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