भारत में एक के बाद एक उद्योगों पर संकट की वजहें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को एक सपना दिखाया है, 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाने का। भारत की अर्थव्यवस्था कुछ वक्त पहले दुनिया में पांचवे स्थान पर थी, वह सातवें स्थान पर आ गई है। फ्रांस ने हमें पछाड़ दिया है, ऐसी स्थिति में 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल लगता है।

अगर 2025 तक इस लक्ष्य को हासिल करना है तो अर्थव्यवस्था लगभग 9% की रफ्तार से बढ़नी चाहिए। मौजूदा वक्त में इसके कोई आसार नज़र नहीं आते हैं। अर्थव्यवस्था में कई सेक्टर मंदी से जूझ रहे हैं।

ऑटोमोबाइल- देश के ऑटोमोबाइल सेक्टर में भारी मंदी चल रही है। लाखों लोगों को अपनी नौकरियां गंवानी पड़ रही हैं। देशभर में कई कंपनियों के शोरूम मंदी के कारण बंद करने पड़े हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर का देश के जीडीपी में 7% का हिस्सा है। पिछले कई महीनों में वाहनों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है।

ऑटो मोबाइल इंडस्ट्री। फोटो सोर्स- Getty

टेक्सटाइल इंडस्ट्री- खेती के बाद सबसे ज़्यादा रोज़गार टेक्सटाइल इंडस्ट्री में ही मिलता है। खबर है कि टेक्सटाइल इंडस्ट्री भी भारी मंदी से गुज़र रही है, कपड़े का निर्यात कम हो गया है। जबकि बांग्लादेश से कपड़े का आयात बढ़ा है, क्योंकि बांग्लादेशी कपड़ा सस्ता है। टेक्सटाइल एसोसिएशन को अखबार में ऐड देकर देश का ध्यान इस मसले पर खींचना पड़ा, समस्या कितनी गंभीर है इस बात से समझा जा सकता है।

पार्ले बिस्किट- पार्ले कंपनी देश में सबसे ज़्यादा बिस्किट का उत्पादन करती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे ही हालात बने रहें तो लगभग 10 हज़ार लोगों को नौकरी से निकालना पड़ सकता है। सवाल खड़ा होता है कि देश के लोग बिस्किट नहीं खरीद रहे हैं? मूल समस्या बिस्किट की खपत को लेकर नहीं है, बल्कि कंपनी के घाटे में होने की है।

कंपनी का कहना है कि जीएसटी के बाद सबसे ज़्यादा बिकने वाले ₹5 के पैक पर भारी जीएसटी लगाया गया, जिसके चलते कंपनी को कम मुनाफे में प्रोडक्ट बेचना पड़ा, एक पैकेट में बिस्किट की संख्या कम करनी पड़ी, छोटा पैकेट होने के चलते ग्राहक उसे खरीद नहीं रहे हैं। इस चक्कर से बाहर निकालना मुश्किल हो गया है। खर्चा कम करने के लिए लोगों को नौकरी से निकालना पड़ेगा।

पार्लेजी, फोटो सोर्स- सोशल मीडिया

मंदी की वजह- अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी हालात कुछ ठीक नहीं हैं। कच्चे तेलों के दाम भी बढ़ रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर देखा जा सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्या अंतरराष्ट्रीय कम और घरेलू ज़्यादा नज़र आती है। भारत स्वयं ही एक बड़ा बाज़ार है, यहां मध्यमवर्ग की जनसंख्या अच्छी खासी है। बाज़ार में फिर भी वस्तुओं के लिए मांग नहीं है। बैंकों की एक अपनी अलग समस्या है बैंक एनपीए से जूझ रहे हैं।

नोटबंदी और जीएसटी- नोटबंदी के फैसले ने असंगठित क्षेत्र पर ज़ोरदार प्रहार हुआ है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह स्वीकार किया है कि नोटबंदी के बाद भ्रष्टाचार बढ़ा है। नोटबंदी के तुरंत बाद जीएसटी लागू करना एक गलत फैसला था, टैक्स को अलग-अलग स्लैब में रखना भी सही नहीं था। जीवन आवश्यक चीज़ों पर टैक्स ज़रूरी नहीं था, अन्य चीज़ों को एक ही रेट लागू किया जा सकता था मगर ऐसा नहीं किया गया। अपने राजनीतिक फायदे के लिए टैक्स रेट में कभी भी बदलाव किए गए।

मंदी की इस समस्या से निकलने के लिए कई उद्योग सरकारी मदद मिलने की अपेक्षा कर रहे थे। नीति आयोग का कहना है कि कुछ ज़रूरी कदम उठाने होंगे। अर्थव्यवस्था की हालत काफी नाज़ुक है, आने वाला वक्त ही बताएगा कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए क्या करेगी?

चीन और अमेरिका के व्यापारिक तनाव पर हम अपना निर्यात बढ़ा सकते थे, सरकार के पास इसके लिए कोई प्लान नहीं था। हमने वह मौका गंवा दिया है। आशा करते हैं जल्द ही हमारी अर्थव्यवस्था मंदी से बाहर आए।

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