“कपड़े का चुनाव महिलाओं की फ्रीडम ऑफ च्वाइस है, फिर समाज ज्ञान क्यों देता है?”

“पहनावा” वह चीज़, जिससे हर एक इंसान जुड़ा हुआ है। अपनी-अपनी सभ्यता-संस्कृति के हिसाब से भी और आधुनिक हो रही सभ्यता में अपने विचारों के हिसाब से भी। यहां तक किसी को कोई समस्या नहीं है।

“पहनावा” को जैसे ही महिलाओं की आधी दुनिया में सेट करते हैं, समाज में लोगों के नथुने फुलने शुरू हो जाते हैं, मुठ्ठियां तन जाती हैं, यहां तक कि फतबे भी जारी हो जाते हैं साहब।

माफ करें यह किसी एक जाति, वर्ग और धर्म के साथ नहीं है, सभी थाली के बैंगन की तरह हैं। कभी इधर तो कभी उधर। चाहे वह जिस तरफ भी हो, एक ही नसीहत आधी आबादी को दी जाती है कि महिला चाहे आधुनिक हो या परंपरागत अपने पहनावे के प्रति ज़िम्मेदार होना ही चाहिए।

फ्रीडम ऑफ च्वाइस का मामला है, महिलाओं द्वारा उनके कपड़ों का चुनाव

फोटो प्रतीकात्मक है। सोर्स- Getty

मेरे हिसाब से महिलाओं को कब क्या पहनना है, कैसा दिखना है और क्या नहीं पहनना है, ये उनकी “फ्रीडम ऑफ च्वाइस” का मामला है और महिलाओं के पहनावे पर फतवा या किसी भी तरह की आधुनिक और परंपरागत सोच को ज़ाहिर करने वालों पर सख्त-से-सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

महिलाओं के परिधान पर टीका-टिप्पणी या फब्तियां तत्काल महिलाओं को असहज तो बनाता ही हैं, उनके आत्मविश्वास की भी धज्जियां उड़ा देती हैं, जिसके बनने में जाने कितने पहाड़ जैसे साल लगते हैं।

हाल ही में सोशल मीडिया में एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसमें एक ज़हीन महीला ने किसी मॉल में किसी लड़की के छोटे कपड़ों पर टीका टिप्पणी कर दी, उस लड़की ने महिला का पीछा भी किया और उनसे मांफी मांगने के लिए विवश भी किया।

यह वीडियो सोशल मीडिया के बाद मुख्यधारा की मीडिया में भी काफी चर्चे में रहा था। किसी का भी पहनावा ना ही फुहरपना है, ना ही आधुनिकता, वह मात्र पहनावा है, जिसमें कई बार वह खुद को सहज महसूस करती हैं, तो कई बार आकर्षक महसूस करती हैं। किसी भी महिला का सहज, सुरक्षित या आकर्षक दिखना या महसूस करना कोई गुनाह नहीं है।

अगर महिलाओं को पूरे शरीर ढकने वाले परिधान पहनने का अधिकार है, तो उन्हें छोटे कपड़े पहनने का अधिकार भी है, उन्हें नकाब में रहने का भी अधिकार है। महिलाओं का कोई भी परिधान, कैसा भी परिधान सिर्फ और सिर्फ उनकी सहजता से जुड़ा हुआ मामला है। यह कहीं से भी समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेल देने का मामला नहीं है।

किसी की सोच का मामला उसके परिधान से नहीं हो सकता तय

आधुनिक परिधान पहने हुए लोगों की सोच पुरातन भी हो सकती है और हिजाब पहनी हुई महिला की सोच आधुनिक भी हो सकती है। किसी की भी सोच का मामला उसके परिधान से तय नहीं किया जा सकता है।

महिलाओं की “फ्रीडम ऑफ च्वाइस” का यह मामला किसी परंपरा का, या आधुनिक विचारों का नहीं है। मामला उस सोच का है, जो कभी आधुनिकता तो कभी परंपरा, किसी-ना-किसी बहाने से महिलाओं के पहनावे पर नियंत्रण रखना चाहती है।

किसी भी परिधान में महिलाओं के अस्तित्व को बतौर इकाई स्वीकार करने में समस्या क्यों है, लोगों को सवाल यह है। सवाल यह भी है कि कम कपड़े आधुनिक और कपड़ों से ढका हुआ शरीर परंपरागत कैसे हो गया? यह मापदंड किसने तय किया? कब किया और कैसे किया?

समाज के बारे में एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि समाज के दो हिस्से हैं- एक प्रगतिशील और एक पिछड़ा।

  • जब हमारा प्रगतिशील समाज किसी महिला को ऐसी ही कुरीतियों को धर्म और आस्था के नाम पर ढोते हए देखता है, तो वह निराश होता है इसीलिए वह घूंघट ना करने वाली लड़की के साथ खड़ा होता है।
  • जबकि पिछड़ा समाज उन महिलाओं के लिए तालियां बजाता है, जो सदियों पुरानी कुप्रथाओं को परंपरा मानकर जी रही हैं।

तब मुख्य सवाल यह होना चाहिए कि खंडित मानसिकता वाले समाज के किसी भी मर्यादा का बोझ महिलाएं कोल्हू के बैल के तरह क्यों उठाएं? वह क्यों नहीं अपने पहनावे के लिए “फ्रीडम ऑफ च्वाइस” का परचम बुलंद करे और अपने किसी भी पहनावे की खुदमुख्तारी करते हुए तरक्कीपसंद भी बने और ज़हीन-सहीन भी बने।

आधी आबादी की “फ्रीडम ऑफ च्वाइस” पर “सेंस ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी” का पहाड़ डालकर उनको मजबूर करने की बजाए, इन मानसिकताओं पर चोट करने की ज़रूरत अधिक है, जो किसी भी सोच को पहनावे का गुलाम मानकर चलते हैं। आज भारत में कितनी ही महिलाएं घर से बाहर निकलकर सिर्फ पहनावे पर समाज की मानसिकता के कारण कार्यक्षेत्र में सहज नहीं हो पाती हैं।

हमें या समाज को यह समझना पड़ेगा कि वस्त्रों का अपना एक अर्थ होता है और हम उन कपड़ों में सहज होते हैं, जो हमारी आत्मछवि से मेल खाते हैं।

यकीनन वातावरण का अपना महत्व है और लोग अपने व्यवसाय के मुताबिक ही कपड़े पहनते हैं लेकिन पहनावे की बाध्यता ऐसी ना हो कि वह महिलाओं के स्वास्थ्य और आत्मविश्वास पर चोट पहुंचाए। आज आधी आबादी हर जगह ड्रेस कोड के दबाव से जूझ रही है, तमाम विरोधों और कोशिशों के बावजूद पहनावे के सख्त मानदंड खत्म नहीं हो रहे हैं, इसलिए कहीं भी पहनावे को लेकर कही गई छोटी-सी-छोटी बात अस्मिता पर हावी हो जा रही है और बहस फिर से शुरू हो जाती है कि आधी आबादी को अपने पहनावे के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए।

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