“टिहरी में डूबे मेरे घर के कारण, मैं पार्टीशन से बेघर लोगों का दुख समझ पाया”

जनवरी 2018 की एक सुबह, उत्तराखंड के उच्च हिमालयी ज़िले बागेश्वर के एक गाँव कपकोट में ऑफिस जाते वक़्त, रास्ते में एक पक्की उम्र का आदमी अपनी बकरियों और गाय को लेकर आ रहा था, उसके पशुओं ने पूरे रास्ते को घेरा हुआ था तो मैं किनारे हो गया, पर एक दूसरे आदमी ने उसे डांटते हुए कहा कि

यह सड़क क्या तेरे बाप की है ? हटा अपनी बकरी।

बकरी वाले ने बड़े प्यार से कहा,

हां साब मेरे बाप की ही है, पहले मेरे दादा ने इस गाँव में खेती की फिर मेरे बाप ने और फिर मैंने। यहां की सारी चीज़ें मेरी है। मेरी सड़क, मेरी हवा, मेरा पानी और सिर्फ मेरा ही नहीं, हम सब का पहला हक बनता है जिनके बाप-दादा ने गाँव को बसाने और आगे बढ़ाने में मदद की।

यह कहते हुए वह आदमी अपनी गाय और बकरी को लेकर आगे बढ़ गया।

इस छोटे से किस्से ने उस वक़्त मुझे उस सड़क पर एक बड़े सवाल के साथ खड़ा कर दिया कि मेरे हिस्से की ज़मीन कहां है ? “वसुधैव कुटुम्बकम्” का नारा लेकर मैं हर जगह अपनी जगह बना लेता हूं, पर क्या सच में मेरा उस जगह पर पहला हक है ? क्योंकि संविधान के अनुसार तो मैं अपने देश में कहीं भी रह सकता हूं पर सभ्यता के बसने की कड़ी में उस जगह की सभ्यता पर कितना हक है ? और कम से कम पहला हक तो नहीं है।

देश के बंटने का दिन

यह आर्टिकल मैं स्वतंत्रता दिवस के आसपास लिख रहा हूं। यह सिर्फ एक ऐसा दिन नहीं है जिसमें हम ने अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ादी पाई थी बल्कि वह दिन भी है जब इस देश के 2 हिस्से हो गये थे, एक भारत और दूसरा पकिस्तान।

दोनों देशों के राजनैतिक माहौल जैसे भी हों, पर हम इस बात को नहीं झुठला सकते कि हम दोनों की भाषा, संस्कृति और सभ्यताएं तकरीबन एक जैसी ही हैं। हम ने दो टुकड़ों में बंटने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। इतना कत्लेआम और रातों-रात इतने लोगों को अपनी-अपनी ज़मीन जायजाद छोड़ कर, देश छोड़ना पड़ा, कितने बुरे हालात थे वह।

भारत में कश्मीरी पंडितों को भी कमोबेश कुछ ऐसा ही झलेना पड़ा था।

घर दोबारा देखने की चाहत

कुछ दिनों पहले मैं अल जज़ीरा चैनल की एक डॉक्यूमेंटरी देख रहा था, गोइंग बैक टू पाकिस्तान: 70 ईयर आफ्टर पार्टीशन । 22 साल की उम्र में कृष्ण कुमार खन्ना को आज़ादी के बाद पकिस्तान छोड़ना पड़ा था। यह फिल्म उनकी उस तमन्ना को हकीकत में बदलने की कहानी है जिसमें वो अपनी ज़मीन को दोबारा देखना चाहते थे।

फिल्म Going Back to Pakistan: 70 Years After Partition का सीन, फोटो क्रेडिट-यूट्यूब

फिल्म में दिखाया गया कि कैसे कृष्ण कुमार खन्ना पकिस्तान गए और वहां जाकर उन्होंने अपना घर देखा, अपनी गलियां देखी, अपने स्कूल गए। माना बहुत कुछ बदल गया था पर उस ज़मीन को मरने से पहले एक बार छुआ जिसमें उनका जन्म हुआ था। पाकिस्तान से नफरत करने से इतर एक इंसानी जज़्बातों की कहानी है ये 25 मिनट की फिल्म।

मेरे वजूद के डूबने की कहानी

ऊपर की दोनों कहानियां मेरे वजूद के करीब है। मेरा जन्म उत्तराखंड के टिहरी जिले के सिराई गाँव में हुआ। यह गाँव नेशनल हाईवे पर बसा हुआ था जिसकी दूरी पुरानी टिहरी से केवल 10 किलोमीटर थी। टिहरी बांध के कारण सन 2004 में यह शहर डूब गया और एक बहुत बड़ी झील का हिस्सा हो गया।

सन 2002 में मैं पढाई के लिए राज्य की राजधानी देहरादून आ गया था। जन्म से 12 साल की उम्र तक मेरी पढाई गांव के ही स्कूल में हुई थी। देहरादून बनने के बाद गाँव जाना कई बार हुआ, पर गाँव डूब जाने के बाद वो ऑप्शन खत्म हो गया। कई बार जब झील में पानी कम हो जाता तो गाँव के अवशेष दिखते और मैं अपने पापा के साथ स्कूटर से अपने घर के अवशेषों के पास जाने की कोशिश करता। उस वक़्त उतनी अक्ल नहीं थी पर फिर भी यादगार के तौर पर मैं अपने घर के 2 पत्थर देहरादून ले आया और सजावट के तौर पर रख लिए।

आज ज़िन्दगी के तीसरे दशक में खड़ा हूं और तक़रीबन पूरा भारत घूमने के बाद महसूस करता हूं कि मैं सब कुछ कर सकता हूँ, पर उन जगहों को नहीं छू सकता जिस से मेरे वजूद की शुरुआत हुई थी।

फोटो क्रेडिट- सोशल मीडिया

इतने सालों के बाद भी मुझे सपनों में मेरे बचपन का स्कूल याद आता हैं, गाँव में हर साल बड के पेड़ के पास होने वाली पूरे गाँव की हफ्ते भर चलने वाली कथा याद आती है। स्कूल जाने वाला रास्ता याद आता है, गाँव की गंगा नदी याद आती है।

मुझे अब भी याद आता है कि मेरे स्कूल की कौन सी खिड़की बंद नहीं होती थी। यह बात मेरे सपनों का हिस्सा आज भी है, जिसे मैं कई बार जीता हूं, पर अफसोस मैं उसे छू नहीं सकता। काफी सालों से घर से बाहर हूँ। साल दो साल पहले सफाई के दौरान शायद किसी ने घर से लाए हुए उन पत्थरों को यूं ही समझ कर फेंक दिया और उसके बाद मेरे उस वजूद की आखिरी निशानी, जिसे मैं छू सकता था वो भी खत्म कर दी।

मैं बहुत बार रात में जब बेचैन होता हूं तो फेसबुक पर अपनी पांचवीं तक के स्कूल के साथियों को खोजता हूं। मैं अधिकतर अपने पांचवीं तक के स्कूल टाइम के दोस्तों के टाइमलाइन की फोटो तलाशता हूं कि क्या पता गाँव से जुडी कोई फोटो हो उनके पास ?

हज़ारों कहानियों के एक तार

देहरादून में घर जरूर है, पर शायद वह घर किसी के इस सवाल का जवाब देने का अधिकार नहीं रखता कि “ये जमीन तेरे बाप की है ?” क्योंकि, उस जमीन पर ना मेरे दादा ने खेती की और ना मेरे पिता का बचपन गुज़रा। वहां की हवा पानी पर पहला हक़ कभी भी हमारा नहीं रहा। वह घर और ज़मीन कागजों में तो हमारा है, पर हमारे वजूद की कहानी वहां से शुरू नहीं होती।

फोटो क्रेडिट- बिमल रतूड़ी

घूमने का बहुत शौक़ीन हूं, कई देशों को करीब से देखने का मन है और इत्तेफाक से पाकिस्तान जाने की ख्वाहिश भी रखता हूं क्योंकि किसी किताब में पढ़ा था “जिन लाहौर नईं वेख्या, वो जन्म्या ही नईं” यानि  जिन्होंने लाहौर नहीं देखा, वह तो जन्मा ही नहीं। मैं हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों की वजूद की कहानियों को करीब से देखने के लिए वहां जाना चाहता हूं।

दोनों देशों के बीच के हालात ठीक नहीं है, बहुत से मतभेदों के बीच, मैं यह अच्छे से जानता हूं कि भारत और पकिस्तान उन दो भाईयों जैसे हैं जो ज़मीन जायजाद के लिए लड़ तो रहे हैं, पर दोनों के दिल के तार आपस में जुड़े हुए हैं क्योंकि बचपन की सारी यादें साथ की हैं। उनके वजूद की कहानी एक ही है। देश के अलग-अलग कोनों में पार्टीशन के बाद की हज़ारों कहानियां ऐसी हैं, जिनके तार मुल्क के दोनों तरफ जुड़े हुए हैं।

आज मैं कृष्ण कुमार खन्ना जी की तरह कभी भी अपने गाँव की ज़मीन को तो नहीं छू सकता और ना ही उम्र के एक पड़ाव में जा कर अपने स्कूल जा सकता हूं। मैं वहां जाकर आज के बच्चों से मिल कर अपने वक़्त की कहानियां नहीं सुना सकता हूं, पर अपने वजूद की निशानी को अपने से जोड़े रखने के लिए, मैंने जानबूझ कर अपने पासपोर्ट पर अपने गाँव का नाम “सिराई” लिखवाया है।

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