स्टूडेंट्स को हम पसंदीदा विषय चुनने की आज़ादी क्यों नहीं देते हैं?

आज हम 73वां स्वतंत्रता दिवस हम मना रहे हैं लेकिन वास्तव में स्वतंत्रता के मायने क्या हैं, यह आज तक हमारा समाज नहीं जान पाया है।भारत अन्य देशों के मुकाबले शिक्षा के मामले में इतना पिछड़ा हुआ देश है कि विश्व के टॉप 100 विश्वविद्यालयों में एक भी विश्वविद्यालय भारत का नहीं है।

उच्च शिक्षा में भारत के पिछड़ने के सामाजिक और आर्थिक कारणों के साथ-साथ एक अहम दिक्कत यह भी है कि स्टूडेंट्स 10वीं के बाद अपनी मर्ज़ी से विषय भी चयन नहीं कर पाते। यदि कोई लड़का 10वीं पास करता है तो उसे कहा जाता है कि आईआईटी की तैयारी करो और लड़की के संदर्भ में यह कहा जाता है कि मेडिकल की तैयारी करो।

स्टूडेंट यदि गरीब मध्यमवर्ग परिवार से है, तो लड़के को किसी तरह साइंस विषय लेने के लिए विवश किया जाता है, जबकि लड़की के मामले में इससे उलट उसकी मर्ज़ी के खिलाफ आर्ट सब्जेक्ट उस पर थोप दिया जाता है।

मेडिकल और इंजीनियरिंग के अलावा औसत पेरेन्ट्स को कोई और सब्जेक्ट नहीं दिखता है। यही कारण है कि अधिकतर संख्या में स्टूडेंट्स साइंस विषय चुनते हैं। कई दफा स्टूडेंट्स दबाव में आकर आत्महत्या तक कर लेते हैं।

स्टूडेंट
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार: Getty Images

पेरेन्ट्स के दबाव में जब स्टूडेंट्स को मनचाहा सबजेक्ट नहीं मिल पाता है, तब वे दबाव में पढ़ने लगते हैं जिस कारण अच्छे परिणाम नहीं निकल पाते हैं। इस वजह से कई दफा वे अवसाद में भी चले जाते हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे उनका करियर खत्म हो जाता है। इन सबके बीच पेरेन्ट्स का दबाव जारी रहता है जिस कारण कई दफा स्टूडेंट्स को गलत कदम भी उठाना पड़ता है।

आपको बता दें आईआईटी और मेडिकल की तैयारियों के लिए हब कहे जाने वाले कोटा में स्टूडेंट्स की आत्महत्या के आंकड़ों में लगातार बढ़त हो रही है। इनमें अधिकतर बच्चे वे होते हैं, जो या तो अपनी मर्ज़ी के खिलाफ कोटा आते हैं या उन पर गार्जियन का अधिक दबाव होता है।

मैंने लेख की शुरुआत में ही इस बात का ज़िक किया है कि भारत के उच्च शिक्षा में पिछड़ने का एक मुख्य कारण बच्चों के विषय चुनने के अधिकार का हनन है। यह सत्य है कि जब बच्चों को उनके फेवरेट सब्जेक्ट चुनने का अधिकार दिया जाएगा, तब वे अपने मतानुसार निर्णय लेकर अपने फेवरेट सब्जेक्ट का चुनाव करेंगे। ऐसे में अच्छे परिणाम अवश्य आएंगे।

जब अच्छे परिणाम आएंगे तब निश्चित तौर पर विश्वविद्यालयों का नाम रौशन होगा और जब विश्वविद्यालयों का नाम रौशन होगा, तब मुझे विश्वास है कि भारत के विश्वविद्यालय, विश्व के टॉप विश्वविद्यालयों में शामिल होंगे।

सरकार से हमारी मांग है कि इन मामलों में जागरूकता अभियान चलाते हुए बच्चों की मर्ज़ी के खिलाफ नामांकन ना होने दें। हमारा यह मानना है कि यदि हम स्वतंत्रता को सही मायने में सेलिब्रेट करना चाहते हैं, तो हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने बच्चों और अपने परिवार को आज़ादी देनी पड़ेगी और खासकर शिक्षा के मामले में हमें ज़रूर उन्हें आज़ादी देनी चाहिए।

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