नौकरी के लिए क्वॉलिफिकेशन की बजाय मेरे मैरिटल स्टेटस में इंटरेस्ट क्यों?

कहते हैं शादी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला होता है। हमारी भारतीय संस्कृति में, खासकर मिडिल क्लास फैमिली में यह फैसला सब मिल-जुल कर लेते हैं। इसी तरह मेरे लिए भी यह फैसला लिया गया था।

हमारे परिवार में कभी शादी को इतनी प्राथमिकता नहीं दी गई। हमारे लिए सबसे पहले शिक्षा रही। मेरे पिता जी ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि बेटियों को अच्छी शिक्षा प्राप्त हो और वे अपन पैरों पर खड़ी हो जाएं। यह हुआ भी, मैंने मीडिया के अच्छे संस्थानों से पढ़ाई की, खूब घूमना-फिरना किया, रेडियो में नौकरी की और फिर शादी भी हो गई।

शादी के बाद की मैं

सब कहते हैं कि शादी के बाद एक लड़की की ज़िंदगी बदल जाती है। सही बोलते हैं, सब कुछ बदल जाता है, आपका उठना, आपका बैठना, आपका बोलना और यहां तक कि आपकी डाइट भी।

शादी के बाद ये बदलाव फ्रस्ट्रेटिंग होते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि ये बदलाव केवल एक लड़की ही झेलती है। काफी हद तक बदलाव उस नए परिवार में भी आते हैं। हालांकि उनके अंदर या उस घर में आए बदलाव के बावजूद वे अपने कंमफर्ट ज़ोन में ही होते हैं लेकिन एक लड़की का कंफर्ट ज़ोन दूर-दूर तक नहीं दिखता है।

शादी के बाद करियर

शादी के बाद की इन उथल-पुथल के बावजूद एक चीज़ जो नहीं  बदली वह थी मेरा करियर। बाकी कई लड़कियों की तरह मुझे अपने करियर से कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना पड़ा। अगर किसी चीज़ से कॉम्प्रोमाइज़ करना पड़ा था तो वह था शहर।

मैं एक छोटे से शहर में नौकरी कर रही थी जहां मेरा करियर और मेरी ग्रोथ रुक सी गई थी। कभी जब मैं अपने दोस्तों या घरवालों से इस बारे में बात करती तो उनके पास सीधा जवाब होता,

इतने संपन्न घर से आती हो, घर के पास ही नौकरी कर रही हो, जितना कमाती हो सब बचता है, फिर क्यों परेशान हो?

यह सुनकर मैं थोड़ी देर निश्चिंत हो जाती लेकिन फिर परेशान हो उठती और सोचती क्या सच में यहां मेरी जगह है? मैंने जिन संस्थानों से पढ़ाई की या मैंने जिस भी टैलेंट से इस शहर में लोगों का दिल जीता, क्या मैं उसे यहीं दफना दूं?

यह शहर छोटा था, यहां मौके नहीं थे, यहां मेरी क्वालिफिकेशन और कैलिबर के हिसाब से पैसा नहीं था, तो सिर्फ महज़ घर के पास की नौकरी के लालच में मैं अपना समय नहीं खराब कर सकती थी।

दिल्ली जाने का फैसला

दिल्ली मीडिया का हब है। यहां सीखने के वह सारे मौके हैं जो मेरे उस शहर में नहीं थे। इसलिए, मैंने दिल्ली जाने का फैसला लिया जिसपर कई लोगों ने आपत्ति जताई।

मुझे आज तक समझ नहीं आया कि ज़्यादा चाहना हमारे समाज या परिवार में बुरा क्यों है? वैसे यह ज़्यादा ना चाहना भी सिर्फ महिलाओं पर लागू होता है। जहां आप बड़े सपने पालने लगेंगी तुरंत आपको “संतोष से बड़ा कोई सुख नहीं” वाला डायलॉग चिपका दिया जाएगा।

अगर कोई पुरुष अपनी नौकरी से खुश नहीं है और शहर बदल कर आगे बढ़ना चाहता है तो वह फैसला उसकी ज़िम्मेदारी हो जाती है लेकिन वही चीज़ अगर एक महिला करे तो वह उसका ज़िम्मेदारियों से भागना कहा जाएगा।

खैर, महिलाओं के लिए कब चीज़ें समान रही तो यहां भी थोड़ा बहुत झेलना था लेकिन परिवार वालों ने साथ दिया और मैंने भी दिल्ली में सीवी भेजना शुरू किया।

यह सेटल डाउन होना क्या होता है?

दिल्ली सीवी भेजने पर मुझे कई मीडिया संस्थानों से कॉल आई। जब उनकी कॉल आती तो मैं बहुत खुश होती क्योंकि मुझे अपने कैलिबर पर कभी शक नहीं था। मुझे अंदर से विश्वास रहता कि जो मेरा इंटरव्यू लेगा वह मुझे ज़रूर सलेक्ट करेगा।

होता भी यही था, सब स्मूथ जाता रहता लेकिन सिर्फ तब तक जब तक वे यह ना पूछते कि आपकी फैमिली में कौन-कौन है? या फिर आप कब तक सेटल होने का सोच रहीं है?

इसके जवाब में मैं जैसे ही कहती कि मैं मैरिड हूं तो उनकी टोन चेंज हो जाती और फिर “विल गेट बैक टू यू” वाली लाइन के बाद किस्सा खत्म हो जाता। इसी तरह एक टेलीफोनिक इंटरव्यू था जिससे पहले मैंने उस कंपनी का रिटन टेस्ट और स्काइप वाले राउंड क्लीयर कर दिए थे क्योंकि उस प्रोसेस में किसी ने शादी या बच्चे कब पैदा करोगी जैसे सवाल नहीं पूछे थे।

जब वह टेलीफोनिक इंटरव्यू हुआ तो सब अच्छा रहा। सैलरी डिसाइड हो गई, ज्वाइनिंग भी तय कर ली कि तभी अचानक सामने से सवाल टपका

आपकी एज क्या है? कब तक सेटल डाउन होने का सोच रही हैं?

आगे मेरे जवाब से क्या हुआ होगा, आप समझ ही सकते हैं। इन सवालों से मैं यह सोचती कि यह सेटल डाउन जैसे शब्द क्या होते हैं? क्या शादी का हो जाना सच में सेटल डाउन होना होता है? बेचारे अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपयी, लता मंगेश्कर और हमारे मोदी जी मुझे आप लोगों के लिए दुख है कि आप सेटल डाउन नहीं हो सके।

बड़े शहर के छोटे लोग

इंटरव्यू में लगातार रिजेक्शन हिम्मत तोड़ते रहे लेकिन हौसला बुलंद रहा। इसी बीच मुझे दिल्ली से कॉल आई और कहा गया कि आप इंटरव्यू देने आ जाएं। मैंने मेल में साफ-साफ लिखा था कि मैं शादीशुदा हूं लेकिन उसके बावजूद उन्होंने मुझे बुलाया।

मैं बहुत खुश हुई और फिर मन ही मन सोचा कि देखा यह होता है शहर और संस्थानों का अंतर, बड़े शहर के लोगों और संस्थानों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हो या क्या हो?

बड़ी खुशी-खुशी मैं दिल्ली गई। सुबह एक रिटन टेस्ट दिया और शाम को इंटरव्यू का नंबर आया। दिमाग वैसे ही थक चुका था कि उस पर इंटरव्यू करने वाले का पहला सवाल,

तुम यहां रहोगी तो हसबैंड कहां रहेंगे?

दूसरा सवाल,

यहां तो 9-10 घंटे काम करना पड़ता है घरवालों को कैसे समझाओगी?

मैं इन सवालों को सुनकर अजीब सी कश्मकश में फंस गई, जवाब में सिर्फ इतना बोल पाई कि अगर घर पर दिक्कत होती तो मैं सीवी भेजती ही क्यों? इस पर तीसरा सवाल,

इतने सालों से उस शहर में क्या कर रही हो? बाहर निकलने की क्यों नहीं सोची?

जवाब तो देना चाह रही थी,

सर निकलना ही चाह रही हूं लेकिन आप जैसे लोग जो बड़े शहर के बड़े संस्थानों में बैठे हैं ना, वे दरअसल बहुत छोटे हैं इसलिए निकल नहीं पा रही।

खैर, ऐसा तो मैं बोल नहीं पाई और फिर घर, परिवार, शादी, पति, बच्चा कब पैदा करोगी टाइप सवालों के बीच मैं परेशान होती रही।

मैं कभी-कभी सोचती हूं कि जब युवा वर्ग के उत्थान की बात होती है तो उसमें लड़का और लड़की को अलग कर दिया जाता है। फिर लड़की के मैरिटल स्टेटस के हिसाब से उसे अलग किया जाता है, फिर मैरिटल स्टेटस के बाद उसके बच्चे होने और ना होने के आधार पर।

क्या पुरुषों को भी इंटरव्यू में यह सवाल पूछे जाते हैं कि उनकी बीवी कहां रहेगी? उनके परिवार वालों को दिक्कत तो नहीं होगी? या फिर क्या कभी पुरुष शादीशुदा होने की वजह से रिजेक्ट होता होगा?

यूं तो हम बड़ी बातें कर लेते हैं कि हर लड़की अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, तो क्यों उसके शादी करने या ना करने के फैसले का सम्मान नहीं है? क्यों करियर बनाने या हाउस वाइफ बनने पर उसके लिए जजमेंटल हैं?

नौकरी देने वालों, अगर किसी लड़की को शादी के बाद करियर बनाने या शहर शिफ्ट करने से दिक्कत होगी तो वह अपना सीवी आपको नहीं भेजेगी। आप लोग क्यों नहीं समझ पाते कि आपको मेल पर सीवी भेजने से पहले भी एक लंबी लड़ाई लड़ती है और जीत के बाद ही आपको अप्रोच करती है।

इन तमाम रिजेक्शन के बावजूद मेरा हौसला नहीं टूटा, मैं जानती थी कि अगर मेरे सपनो का ताला है तो उसकी चाबी भी होगी। आखिरकार चाबी मिली और आज मैं दिल्ली में हूं, सीख रही हूं और खुद के कैलिबर को फिर से चैलेंज कर रहीं हूं।

लेकिन जब तक समाज में यह बेसिक समझ नहीं आएगी कि महिलाओं का सेटलमेंट और उनका बायलॉजिकल क्लॉक दूसरों की ज़िम्मेदारी नहीं है, तब तक यूथ डे, विमेंस डे या इंडिपेंडेंस डे मनाना मूर्खता है।

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