आने वाले दिनों में भारत में कहीं बाढ़ होगी और कहीं पीने को नहीं मिलेगा पानी

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आज भारत सहित दुनियाभर में ‘पर्यावरण संरक्षण’ ज़रूरी हो गया है लेकिन अमेरिका और ब्राज़ील जैसे देश इस ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं। लाखों-करोड़ों वर्षों में विकसित हुए पर्यावरण का संतुलन पिछले सालों में तेज़ी से बदला है और यह बदलाव मानव जाति समेत पूरी पृथ्वी के लिए खतरा बन गया है।

पर्यावरण पर मानवीय गतिविधियों का परिणाम दूरगामी होता है और अतीत में पर्यावरण से किया गया खिलवाड़ आने वाली पीढ़ियों और जीव-जंतुओं समेत पूरी धरती के लिए नई कठिनाइयां पैदा करता है।

पर्यावरण क्षति से होने वाले संकट

वायु, जल, भूमि और जीव-जंतु समेत सभी पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। पर्यावरण को हुई क्षति के मुख्य परिणाम जलवायु परिवर्तन, ग्रीन हाउस प्रभाव और जीव-जंतुओं के विलुप्त होने के रूप में सामने आ रहे हैं। इसके कारण बाढ़, सूखा, अत्यधिक वर्षा, अम्लीय वर्षा और भयंकर गर्मी जैसी प्राकृतिक आपदाएं और खाद्य संकट की स्थिति पैदा हो रही है। वायु, जल और भूमि के प्रदूषण की वजह से लोग बीमार हो रहे हैं।

  • कैम्ब्रिज शब्दकोश में पर्यावरण के समानार्थी अंग्रेज़ी शब्द एनवायरमेंट का संबंध वायु, जल, भूमि और यहां रहने वाले लोग, जानवर और पेड़-पौधे से हैं।
  • मरियम वेबस्टर शब्दकोश के मुताबिक जिस परिस्थिति, वस्तु या परिवेश से कोई घिरा हो उसे पर्यावरण कहते हैं।
  • डिक्शनरी डॉट कॉम के मुताबिक पर्यावरण का अर्थ, हवा, पानी, खनिज, सजीव और सजीव को प्रभावित करने वाले सभी बाहरी कारक से है।

मानव गतिविधियां खतरे की घंटी बन रही हैं

पृथ्वी पर मौजूद सजीव स्वाभाविक रूप की तुलना में आज हज़ार गुना तेज़ी से विलुप्त हो रहे हैं। यूएन एनवायरमेंट प्रोग्राम के मुताबिक हर 24 घंटे में 150-200 पादप, पक्षी और स्तनधारी नस्लें विलुप्त हो रही हैं। 1970 के बाद से मानव गतिविधियों की वजह से 60 फीसदी स्तनपायी, चिड़ियां, मछली और सरीसृप विलुप्त हो चुके हैं। ये घटनाएं पूरी पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरे की घंटी हैं।

ग्रीन हाउस इफेक्ट से बढ़ रहा बाढ़ का खतरा

वायुमंडल में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा बढ़ने (ग्रीन हाउस इफेक्ट) से पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है। विश्व बैंक ने साल 2050 तक मध्य भारत में जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रति व्यक्ति जीडीपी में 10 फीसदी कमी होने का अनुमान लगाया है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से हिमालय पर जमी बर्फ तेज़ी से पिघल रही है, जिससे हिमालयी क्षेत्रों के साथ-साथ मैदानी इलाकों में भी बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।

जल प्रबंधन बड़ी समस्या

वहीं, जल प्रबंधन की कमी की वजह से देश का बड़ा हिस्सा पानी की कमी से जूझ रहा है। साल 2018 में जारी कम्पोज़िट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स (सीडब्लूएमआई) के मुताबिक दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद सहित देश के 21 बड़े शहरों में 2020 तक भूमिगत जल खत्म हो जाएगा, जिससे 1,000 लाख लोग प्रभावित होंगे।

फोटो साभार- Getty Images

आंकड़ों के मुताबिक भारत की 12 फीसदी आबादी के पास पानी का कोई स्रोत नहीं है। 2030 तक पानी की मांग भी दोगुनी हो जाएगी। पानी की कमी की वजह से भारत की जीडीपी को 6 फीसदी का नुकसान हो सकता है।

वायु प्रदूषण से हो रहे नुकसान

दुनिया के ज़्यादातर बड़े शहर वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं। डब्लू.एच.ओ. की रिपोर्ट के मुताबिक 93 फीसदी   बच्चे प्रदूषित वायु में सांस लेने को मजबूर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर साल करीब 70 लाख लोग वायु प्रदूषण की वजह से मर जाते हैं। 

वहीं, खेती में कीटनाशक और अन्य रसायनों का तेज़ी से उपयोग बढ़ रहा है, जिसकी वजह से भूमि की उर्वरता घटी है और लोग कीटनाशकों वाले सामान खाने को मजबूर हैं। उद्योगों और कूड़ा डंपिंग साइट्स की वजह से भूमिगत जल और भूमि प्रदूषित हो रहे हैं।

जल, वायु, भूमि और पृथ्वी पर मौजूद सभी सजीवों को बचाने के लिए हमें व्यक्तिगत स्तर के साथ-साथ सामुदायिक स्तर पर प्रयास करने की ज़रूरत है। हमें ऐसी सरकार को चुनना चाहिए जो सतत विकास को प्राथमिकता दे। अगर भारत में जलवायु परिवर्तन की बात की जाए, तो इसके लिए लद्दाख जाइए क्योंकि वहां इसका प्रभाव देखा जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए 3R

पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें 3R यानि रियूज़, रिड्युस और रिसाइकिल के मूल मंत्र को अपनाने की ज़रूरत है। हमें पुरानी चीज़ों का रियूज़ यानि दोबारा इस्तेमाल के तरीके अपनाने चाहिए। 

उदाहरण के लिए प्लास्टिक की बोतल से बेड बनाए जा सकते हैं, पुराने कपड़ों का इस्तेमाल गद्दे बनाने में हो सकता है या रोटी को लपेटने के लिए इस्तेमाल फॉइल को धोकर दोबारा प्रयोग किया जा सकता है। 

दिल्ली स्थित ‘गूंज’ नामक स्वयंसेवी संस्था पुराने सामानों से रोज़मर्रा की चीज़ें बनाकर ज़रूरतमंद लोगों के बीच बांटती है। इसके अलावा यूट्यूब पर हम इससे संबंधित नए आइडिया पा सकते हैं।

कूड़े से बनाई जा सकती है खाद

हम कई चीज़ें बिना ज़रूरत के खरीद लेते हैं। रिड्युस यानि हमें किफायत के साथ चीज़ों को इस्तेमाल करना चाहिए। हमें टिकाऊ सामान को प्राथमिकता देनी चाहिए और गैर-ज़रूरी चीज़ों को खरीदने से बचना चाहिए। प्लास्टिक, धातु और कागज़ जैसी चीजों से बनी वस्तुओं को रिसाइकल किया जा सकता है। इसके लिए ज़रूरी है कि हम कूड़े को उनकी प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग रखें। 

कूड़े को जैविक और अजैविक में बांटकर रखने से छंटाई में कम समय लगता है और अधिकतम कूड़ा रीसाइकिल के योग्य बना रहता है। जैविक कूड़े से घर में भी खाद बनाई जा सकती है।

इस्तेमाल करें रिड्युस के मंत्र

रिड्युस के मंत्र को हम बिजली, पानी और परिवहन पर भी लागू कर सकते हैं। घरों और कारखानों से बिना ट्रीटमेंट के निकला पानी नदियों और अन्य जल स्त्रोतों को प्रदूषित करता है। आज देश की बड़ी आबादी प्रदूषित जल पीने को मजबूर है। 

ग्रे वॉटर (मल-जल) और अन्य जल को अलग-अलग करके उनका घर पर ही ट्रीटमेंट किया जा सकता है। कई जगहों पर घरेलू स्तर पर ही लोगों ने पानी को रिसाइकिल करके मिसाल पेश की है।

इसके साथ ही खेती और घरेलू कामों में पानी का किफायत के साथ इस्तेमाल से ना सिर्फ पानी की बचत होगी, बल्कि कम से कम रिसाइकिल करने की आवश्यकता होगी।

कोयला उत्पादन से वायु प्रदूषण का खतरा

भारत में 60 फिसदी बिजली का उत्पादन कोयला जलाने से होता है, जो वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है। बिजली बचाने का मतलब कोयले को जलने से रोकना है और इसका सीधा संबंध वायु प्रदूषण और ग्रीन हाउस इफेक्ट से है। हमें आइएसआई मार्क और फाइव स्टार एप्लायंस को प्राथमिकता देनी चाहिए।

इसके साथ ही सौर उर्जा जैसे नवीकरणीय उर्जा स्रोतों के इस्तेमाल से कोयले पर निर्भरता को कम कर सकते हैं। इसके साथ ही इको फ्रेंडली घर के डिज़ाइन से हम एसी लगाने से बच सकते हैं।

वायु प्रदूषण से बचने के लिए कुछ ज़रूरी सुझाव

मोटर गाड़ियों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण की बड़ी वजह है इसलिए हमें दूरी के हिसाब से वाहन का चुनाव करना चाहिए। 

  • छोटी दूरी के लिए साइकिल का इस्तेमाल पर्यावरण के साथ-साथ हमारी सेहत के लिए भी फायदेमंद है। 
  • इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी पर्यावरण संरक्षण के लिहाज़ से बेहतर विकल्प हैं। 
  • सार्वजनिक वाहन और गाड़ी पूल करना एक स्मार्ट फैसला है। 
  • इसके साथ ही गाड़ियों की नियमित देखरेख और सही स्पीड में चलाने से ईंधन की बचत की जा सकती है।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली चीज़ों का प्रयोग करने से बचना होगा

हमें उन प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से परहेज़ करना चाहिए जिनके निर्माण, उपयोग या निस्तारण (इस्तेमाल के बाद) से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता हो। जैसे कि प्लास्टिक की थैलियों की जगह हम कपड़े या कागज़ की थैलियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। सामान खरीदते हुए इको प्रोडक्ट के निशान को देखने की आदत बना लेनी चाहिए।

फोटो साभार- Flickr

हमें सिंगल यूज़ प्रोडक्ट की बजाय बार-बार इस्तेमाल होने वाले प्रोडक्ट के इस्तेमाल की आदत डालनी चाहिए। उदाहरण के लिए सैनिटरी नैपकिन की जगह कप का इस्तेमाल हो सकता है, क्योंकि यह सैनिटरी नैपकिन की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए खेतों में कीटनाशक और रसायनों का कम से कम प्रयोग और जैविक विकल्पों को अपनाने की ज़रूरत है। ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स खरीदकर हम जैविक खेती को बढ़ावा दे सकते हैं।

भारत की जैव विविधता बनाए रखने के लिए ज़रूरी कदम

भारत सहित दुनिया भर में वन्य क्षेत्र घट रहा है। जैव विविधता और पारिस्थिकी तंत्र में संतुलन के लिए वन होना बेहद ज़रूरी है। हमें खास मौकों को पेड़ लगाकर मनाना चाहिए। ‘बीज-बॉल’ जैसे अनूठे अभियानों से जुड़कर हम पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी निभा सकते हैं।

बीज बॉल में जंगली और आसानी से उगने वाले पेड़ों के बीज होते हैं। इसे मिट्टी के बॉल में रखकर खुली और बंजर जगहों में फेंका जाता है, जिससे यहां पेड़ उग आते हैं।

दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर अभियान चलाए जा रहे हैं। हमें ऐसी बेस्ट प्रैक्टिस को अपने जीवन में शामिल करना चाहिए और लोगों को ऐसे अभियानों से जुड़ना चाहिए।

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