“कॉमरेड भगत, तुम चले गए और पीछे छूट गई मज़दूरों, किसानों के हक की लड़ाई”

प्रिय कॉमरेड,

मुझे पता है बहुत दुखी होगे तुम। तुम जो काम हमारे लिए छोड़ गए थे, हम पूरा नहीं कर पाए। तुम्हारे सपने आज भी अधूरे हैं। मेरी ही उम्र के रहे होगे तुम जब अपने मुल्क के लोगों की खातिर फांसी के फंदे पर झूल गए थे।

सरकारी दस्तावेज़ों में तुम आज भी राजद्रोही हो। यही खेल है इस सत्ता का, जो इसके राज़ जान लेता है उसे आतंकवादी करार दिया जाता है। सत्ता का चरित्र हर जगह एक जैसा है, चाहे यह विदेशियों के हाथों में हो या अपने ही मुल्क के चंद लोगों के हाथों में, यह ज़ुल्म करने से बाज नहीं आती।

तुम्हें भी तो यही डर था ना कि सत्ता अगर गोरों के हाथों से निकलकर अपने देश के बुर्जुआ वर्ग के हाथों में आ जाएगी, तब भी हम गुलाम ही रहेंगे। हुआ भी वही। तुम चले गए और पीछे छूट गई मज़दूरों, किसानों के हक की लड़ाई, जो आज भी कोई लड़ने को तैयार नहीं है। जो लड़ता है, उसे शहरी नक्सल, आतंकवादी, देशद्रोही और भी ना जाने क्या-क्या कहा जाता है।

तुम्हारे मुल्क के युवा राजनीति नहीं करना चाहते हैं। नौजवानों को अपने ही लोगों की पीड़ा का एहसास नहीं है, है भी तो सबकी जु़बानें सिली हुई हैं। तुम भी राजनीति करते थे, तुम भी तो लड़ा करते थे इस मुल्क के लोगों के आत्मसम्मान की लड़ाई। तुम्हें तो कभी नहीं लगा कि यह नौजवानों का काम नहीं। तुम नहीं कतराए इंकलाब लिखने से। तुम्हारे मुल्क के लोग आज धर्म की चरस के नशे में इस कदर डूबे हुए हैं कि इंसान होने का सबक भूल गए हैं।

कॉमरेड अब सब बदल गया है। इतना कि तुम खुद अपनी ही ज़मीं को नहीं पहचान पाओगे। या शायद तुम्हारी याददाश्त हमारे जितनी कमज़ोर नहीं होगी। हम तो हमारे साथ हुए हर अन्याय को आंसू के साथ बहा देते हैं।

तुम्हें तो सब याद होगा। जब तुम जलियांवाला बाग की दीवार पर गोलियों के निशान देखोगे, तुम्हारे भीतर फिर वही भगत जाग जाएगा, जिसे लोग उद्दंडी आतंकवादी कहते हैं। इस बार तुम अपने भीतर का क्रोध अपने किसी कॉमरेड को दे जाना।

इस मुल्क को तुम्हारे भीतर की धधकती आग और तुम्हारे साहस की बहुत ज़रूरत है। साथ ही वह संवेदनाएं भी छोड़ जाना, जिसने तुम्हें अपने लोगों की तकलीफ का एहसास कराया। वह करुणा से भरा हृदय भी दे जाना जो साथियों की पीड़ा पर मरहम लगाए बिना चैन नहीं पाता।

कॉमरेड तुम होते तो कितना अच्छा होता। आजकल तुम्हें केसरिया पगड़ी पहनाया जाने लगा है, जगह-जगह तुम्हारी मूर्तियां भी हैं लेकिन दुख इस बात का है कि इन मूर्तियों पर फूल चढ़ाने वाले लोग नहीं जानते कि असल में भगत हैं कौन? वे नहीं जानते कि ज़मीन का टुकड़ा भगत सिंह का देश नहीं था, भगत के लिए तो उसके नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े ही मुल्क की आत्मा थी।

जब तुम्हारा जन्मदिन आता है ना, तुम्हें सब याद करते हैं लेकिन असल में कोई याद नहीं करता। हर फांसी पर लटकते किसान के साथ तुम भी बार-बार, ना जाने कितनी बार मरते हो। दोज़ख सी ज़िन्दगी जीते मज़दूरों के शरीर से टपकती अनगिनत पसीने की बूंदों के साथ जाने तुम्हारे भी कितने आंसू निकलते होंगे।

तुम हमारे हवाले कर तो गए थे इस वतन को लेकिन तुम्हारे सपने अब भी अधूरे हैं। चारों ओर घना अंधेरा है लेकिन उस अंधेरे को चीरती हुई एक तीखी सी रौशनी है तुम्हारी याद, तुम्हारा बोला गया हर लफ्ज़, तुम्हारी कलम से लिखा गया हर एक शब्द। जब तक तुम हो, तुम्हारी याद है, तुम्हारी परछाई है, तब तक उम्मीद ज़िन्दा है। इंकलाब की सारी संभावनाएं जीवित हैं। क्रांतिकारियों की ऊर्जा का स्त्रोत हो तुम। तुम सर्वहारा का हौसला हो।

कभी मिले नहीं तुमसे लेकिन कभी किसी नारे में, किसी पोस्टर में देख-सुनकर महसूस कर लिया करते हैं तुम्हारे साहस को, तुम्हारे जुनून को, इंसानियत के प्रति तुम्हारे प्रेम को, तुम्हारे ज्ञान और विवेक को।

जन्मदिन मुबारक हो कॉमरेड।

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