अपर्याप्त हेडमास्टरों की कमी से जूझते बिहार के स्कूल

बिहार के विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। बदलाव और विकास के नारों के साथ, वोटबैंक के एक्टिव होने का समय भी आ ही गया है। ऐसे में मैं आपका ध्यान उस मुद्दे पर लेकर आ रहा हूं जो धर्म और जाति के तले दब जाएगा। यह मुद्दा है शिक्षा।

इस मुद्दे को दबाने के पीछे भी एक रीजनीति है। खुद सोचिए, अगर सब शिक्षित हो जाएंगे तो ज़ाहिर सी बात है जागरूक हो जाएंगे और जब सब जागरूक हो जाएंगे, तो फिर राजनेता धर्म और जाति के नाम पर, हमें आपस में लड़ा कर कैसे राज करेंगे?

गरीब को गरीब और अशिक्षित रखना ही राज करने की सबसे बड़ी नीति है। शिक्षा एक व्यक्ति का संपूर्ण विकास करती है तो वह हमेशा से नेताओं के लिए खतरा रही। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खुद बिहार सरकार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था है।

कहां है प्रधानाध्यापक?

विद्यालय की बुनियादी सुविधाओं में सबसे अहम है कि विद्यालय में प्रधानाध्यापक के लिए एक अलग कक्ष हो लेकिन बिहार की शिक्षा व्यवस्था के गले से यह बात नीचे नहीं उतरती है। बिहार सरकार के यू-डायस 2015-16 के आंकड़ों के मुताबिक 69.8 फीसदी विद्यालय में प्रधानाध्यापक के लिए अलग कक्ष उपलब्ध नहीं है।

यही नहीं, यू-डायस 2015-16 के आंकड़ें बताते हैं कि 20,647 ऐसे प्राथमिक विद्यालय हैं जहां प्रधानाध्यापकों की आवश्यकता है, किंतु इनमें से 19,765 विद्यालयों में प्रधानाध्यापक नहीं हैं। यानि 96% प्राथमिक विद्यालय बिना प्रधानाध्यापक के संचालित किए जा रहे हैं।

2014-15 में यह आंकड़ा 80% के आसपास था।  यानि एक साल में 16% हेडमास्टर और गायब हो गए हैं। हालांकि, बिहार शिक्षा परियोजना में बिहार स्टेट रिसोर्स पर्सन के पद पर कार्यरत नूतन बताती हैं,

बिहार में कक्षा 1-5 यानि प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक के पद ही नहीं है।

तो वहीं इस मसले पर बिहार शिक्षा परियोजना समिति के स्टेट प्रोग्रामिंग ऑफिसर रवि शंकर सिंह पहले तो किसी भी तरह की टिप्पणी करने से साफ इंकार कर देते हैं और फिर भी झिझकते हुए कहते हैं,

मेरा काम सिर्फ डेटा कलेक्ट कर संग्रहित डेटा तैयार करना है। अब उस पर सरकार कितना अमल करती है यह सरकार पर डिपेंड करता है।

वह आगे बताते है,

आज़ादी से लेकर अब तक बिहार के प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापकों का कोई पद नहीं बना है। ऐसी कोई गवर्नमेंट की पॉलिसी नहीं हैं जिससे प्रधानाध्यापकों की सीधे तौर पर प्राथमिक विद्यालय में नियुक्ति की जा सके। प्रधानाध्यापक सारे असिस्टेंट टीचर से बनते हैं।

स्कूलों में मैदानों के ना होने की वजह बताते हुए वह कहते हैं,

स्कूल के पास अब खेल का मैदान बचा नहीं हैं। जो स्कूल की ज़मीन थी उसमें भवन बन गए। पहले ज़मींदार ज़मीन डोनेट करते थे। अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। ज़मीन का रेट आसमान छू गया है। कहां से स्कूल के पास खेल का मैदान आए?

विद्यालय में टीचर और विषय-वार टीचर ना होने पर गोलमटोल जवाब देते हुए कहते हैं,

देखिए, अभी बहाली निकली है ना? तो वेकेंसी निकलती ही रहती हैं। मैं विषयवार शिक्षकों के बारें में कुछ कह नहीं सकता। हां, सरकार और शिक्षा विभाग के भीतर इसको लेकर कुछ बातें चल रही हैं। म्यूज़िक टीचर को लेकर जहां तक सवाल है तो मैं स्कूलों में म्यूज़िक टीचर के होने के पक्ष में हूं, होना चाहिए लेकिन क्यों नहीं है, इस सवाल पर सरकार को मंथन ज़रूर करना चाहिए।

अब सवाल यह उठता है कि सरकार अपनी रिपोर्ट में प्राथमिक विद्यालयों में प्रधानाध्यापक के रिक्त पदों का साफ-साफ उल्लेख क्यों नहीं करती हैं? यह हाल तो प्राथमिक विद्यालयों का है लेकिन यह स्थिति सिर्फ प्राथमिक विद्यालयों की ही नहीं है।

24,740 उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय है जहां सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रधानाध्यापक की आवश्यकता है किंतु इनमें से 21,747 विद्यालयों में प्रधानाध्यापक नहीं है।

यानि, बिहार के 88% प्रारंभिक उच्च शिक्षण संस्थान बिना प्रधानाध्यापक के भरोसे ही संचालित हो रहे हैं। इन व्यवस्थाओं के बीच बिहार के बच्चें पढ़ने को मजबूर हैं। फिर ये बिहार की किस बेहतर शिक्षा प्रणाली पर इतराए, इन्हें खुद नहीं पता?

मिड-डे मील योजना है लेकिन रसोई कक्ष नहीं

राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन योजना की शुरूआत 1995 में की गई थी ताकि बच्चों में कुपोषण की समस्या को कम किया जा सके तथा उन्हें पौष्टिक आहार मिल सके। इसके साथ-साथ यह योजना बच्चों के नामांकन को बढ़ाने की एक तरकीब भी थी। एक भारी भरकम बजट के साथ इस योजना की शुरुआत हुई लेकिन बिहार के तकरीबन 31% विद्यालयों के पास रसोई कक्ष ही नहीं हैं।

2013 में सारण ज़िले में 23 बच्चों की मौत मिड-डे मील भोजन खाने के बाद फूड प्वाईज़निंग की वजह से हो जाती है। फिर भी सरकारी अमला चैन की नींद सोता रहता है और बाद में खुद में सुधार करने की बजाए योजना को ही बंद करने की मांग की जाती है।

पिछले साल खुद नीतीश कुमार ने इस योजना को बंद करने की बात कही थी। उनका कहना था कि स्कूल का ध्यान सिर्फ खाना बनाने और खिलाने में ही रह गया है, जिसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर पड़ रहा है। हालांकि अब बिहार सरकार ने इस साल मध्याह्न भोजन के लिए  2,374 करोड़ रूपए देने का प्रावधान किया है।

बिहार में शिक्षा की बदहाल व्यवस्था की अगली कड़ी में बात करूंगा खुद बिहार के शिक्षा मंत्री और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ज़िले की शिक्षा की।

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