“माँ के लाड से बेटा बिगड़ता है और जनता के लाड से सत्ता”

स्वतंत्रता और आज़ादी में उतना ही अंतर है, जितना एक भारतीय घर में एक माँ और बेटे के स्थान में है।

माँ स्वतंत्र हैं पर आज़ाद नहीं और बेटा आज़ाद है पर स्वतंत्र नहीं।

– विद्रोही 

हालांकि स्वतंत्रता दिवस को गुज़रे काफी दिन हो चुके हैं लेकिन स्वतंत्रता महज़ एक दिन का दिवस नहीं है। हर साल की तरह पूरा देश आज़ादी का जश्न मना रहा था मगर मेरे मन में यह सवाल चल रहा था कि 15 अगस्त को तो भारत स्वतंत्र हुआ तो हम आज़ादी का जश्न क्यों मनाते हैं? आज़ाद कौन हुआ इस दिन? “हम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाते हैं मगर आज़ादी दिवस क्यों नहीं मनाते?” दरअसल मेरे लिए स्वतंत्रता और आज़ादी के मायने अलग-अलग हैं।

क्या हम वाकई आज़ादी मांगते?

सोचने की बात है कि मैं आज़ादी की बात क्यों कर रहा हूं? सब कहते तो यही हैं कि हम 1947 में आज़ाद हो गए थे, जब जे.एन.यू में आज़ादी के नारे लगे तब भी यह सवाल उठा था। गौर करिए, अगर अंग्रेज़ हमें अपनी बात कहने देते, हमारी आवाज़ संसद में सुनते, हमें अपने बराबर समझते और हमारे देश की संपदा की लूट ना करते, तो क्या हम उनसे आज़ादी मांगते? 

यह कैसी आज़ादी?

सच कहूं तो मेरे लिए तो ऐसा सोचना भी मुश्किल हो रहा है। यह सब नहीं मिलने पर ही हमारे पूर्वजों ने आज़ादी के लिए संघर्ष किया लेकिन अगर सत्तर साल बाद भी हमारे संघर्ष वही रहे, तो काहे की आज़ादी। सत्ताधारियों ने बस उस रंग के भेद को आज़ादी का नाम दे दिया लेकिन उन मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष अब भी जारी है। 

इस उल्लेख में इस विषय पर अपना सादृश्य यानी Analogy पेश करने वाला हूं। मेरे दृष्टिकोण में सत्ता और जनता के बीच में वही रिश्ता है, जो अपने देश में एक एक माँ और बेटे के बीच होता है लेकिन सवाल उठता है, कैसे?

सत्ता जनता की ही सन्तान है क्योंकि सत्ताधारियों का जन्म हमारे बीच में से ही होता है और भारत में हम इन सत्ताधारियों को पिछले सत्तर सालों से पालते आ रहे हैं। हालांकि इन सत्ताधारियों को कई बार विरोध भी झेलना पड़ा है लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह काफी रहा है। 

इन संतानों को हमने कुछ ज़्यादा ही लाड-दुलार दिया है। शुरुआत में ऐसा करना तो फिर भी थोड़ा जायज़ था क्योंकि देश के नेता वह लोग बने जो देश के लिए लड़े भी थे लेकिन शायद उनके सामने समर्पण करना भूल थी। 

जनता और बिगड़ती सत्ता

जनता, जिसे एक शिक्षक की भूमिका निभानी चाहिए थी वह एक ऐसी माँ कि भूमिका निभाने लगी जो अपने पुत्र-मोह में मग्न है। परिणामस्वरूप, हमारी संतान यानी हमारी सत्ता बिगड़ती चली गई। इस मोह से सबसे ज़्यादा नुकसान हमें ही हुआ है। लाड में बेटा कितना बिगड़ सकता है, वह सबने सन 1975 में देखा ही था जब इमरजेंसी लगी थी। 

इस रिश्ते के असली मायने स्वतंत्रता के कई साल बाद स्पष्ट हुए। अब वापस एक बार विद्रोही की पंक्तियों पर गौर करते हैं। पंक्तियां एक आम भारतीय घर के शासन-गति का वर्णन कर रहीं हैं। अगर आपका घर ऐसा नहीं है तो बहुत भाग्यशाली हैं आप।

जब विद्रोही कह रहे हैं कि माँ स्वतंत्र हैं मगर आज़ाद नहीं तब वह बता रहे हैं, जनता का हाल। अंग्रेज़ों ने आज़ादी और तंत्र छीन तो लिए मगर वापस सिर्फ तंत्र करके गए। जनता को एक तंत्र तो मिल गया और उसे हम अपना भी कहने लगे क्योंकि उस तंत्र में जो लोग हैं, वह हमारे जैसे हैं। 

जनता स्थापित करती अपनी व्यवस्था 

घर में माँ स्वतंत्र होती है इसलिए वह अपने और घर के सारे काम खुद करती है। घर चलता भी माँ के हिसाब और सूझ-बूझ से ही है। अगर वह बीमार होती है, तब भी पूरी कोशिश करती है कि घर पर फर्क कम से कम पड़े। किसी को कुछ भी हो जाए माँ किसी भी हालात में घर चला ही लेती है। 

सामान्य रूप से जनता भी है, उनका कोई ख्याल करे या ना करे। जनता खुद का ख्याल रख ही लेती है। अपनी समझ से जितना हो सके उतनी व्यवस्था स्थापित कर लेती है। 

आज़ादी को दोहरा खतरा

जनतंत्र भी इसी तरह स्थापित हुआ था मगर जनता की आज़ादी को दो तरफ से खतरा होता है। पहला बाहरी या विदेशी और दूसरा सत्ता पक्ष से। इसी तरह माँ भी दो ओर से कष्ट झेलती है, एक अपने ही घर में परिवार या पति से और बाहरी दुनिया से, जहां सामाजिक व्यवस्था का शासन है। 

आज़ादी ऐसी चीज़ है, जो माँ और जनता दोनों के अधिकार के परे है। आज़ादी की परिभाषा घर में मर्दों द्वारा गढ़ी जाती है और जनता के लिए सत्ता द्वारा। इस परिभाषा के विरुद्ध जाने पर घर में माँ जो एक महिला है, उसे चरित्रहीन और जनता को देशद्रोही घोषित कर दिया जाता है। 

बेटा यानी सत्ता स्वतंत्र नहीं है क्योंकि जनता के बिना उसका कोई तंत्र नहीं है। आज़ाद वह इसलिए है क्योंकि सत्ता से जो ताकत मिलती है, उसका वह मन मर्ज़ी प्रयोग कर रहा है। 

सत्ता प्रेम में विलीन ना रहें सवाल करें

ऐसा नहीं है कि इस ताकत का प्रयोग केवल गलत काम के लिए हुआ है। इसका अच्छा प्रयोग भी हुआ है, वरना इस गणतंत्र का सत्तर साल चलना नामुमकिन होता। हम गलती दोहराएंगे अगर हम अब भी सत्ता के प्रेम में विलीन रहें इसलिए सवाल पूछिए, जवाब मांगिए क्योंकि हमारे टीवी के पत्रकारों ने तो पूछना छोड़ दिया है।

अगर अगली बार कोई सत्ताधारी “भारत माता की जय” कहने को कहे और राष्ट्रवाद का सर्टिफिकेट बांटने आए तो जवाब में कहें “बैठ जाओ बेटा, अभी तो बहुत कुछ सीखना है ज़िंदगी में।”

आखिर में बताना चाहता हूं कि शुरुआत में जो विद्रोही है, वह मैं ही हूं, रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ नहीं। क्षमा प्रार्थी हूं। 

 जय हिंद। 

 

 

 

 

 

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