“गाँधी की बुनियादी शिक्षा पद्धति से कोई भी बेरोज़गारी से ग्रसित नहीं हो सकता”

सबसे पहले नई तालीम को हिंदुस्तानी तालीमी संघ के नाम से जाना जाता था उसके बाद जैसे-जैसे स्वरूप बदलता गया वैसे-वैसे नाम भी बदला। 1937 में जब वर्धा में हुए कांग्रेस सम्मेलन में बुनियादी शिक्षा की संकल्पना उभरी, तो देश के लोगों ने इस संकल्पना का खुलकर स्वागत किया था।

इस अधिवेशन में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद,आचार्य विनोबा भावे, आशा देवी, आर्यनायकम, काका साहेब कालेलकर,आचार्य जे.बी. कृपलानी, डॉ. जाकिर हुसैन, डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह,जयराम दास दौलतराम आदि स्वनामधन्य लोग उपस्थित हुए थे।

नई तालीम सेवाग्राम, फोटो क्रेडिट – YouTube

बुनियादी विद्यालय और गाँधी

गांधी जी ने अधिवेशन का कार्य संपादित किया और बुनियादी विद्यालयों की नींव भी रखी। जहां  छात्रों को सूत कताई, कपड़ा बुनाई, लोहारगिरी, बढ़ईगिरी, कृषि कार्य, बागवानी और झाड़ू-टोकरी बनाने में कुशल बनाया जाता था। यह सब लेकर 1939 में जब गांधी जी बिहार के वृंदावन गए , तो बुनियादी विद्यालय के साथ-साथ रचनात्मक कार्यक्रम (लघु उद्योग) की शुरुआत हुई। जिससे आसपास के गाँवों की महिलाओं को रोज़गार प्राप्त हुआ।

यहां पर तेल पेराई, गुड़ निर्माण, साबुन बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता था। यहां का बना हुआ रेशमी कपड़ा पूरे भारत में सप्लाई की जाती थी। यहां से रेशम के कपड़े का एक बंडल भेजते थे, तो बदले में खादी के कपड़े का दस बंडल बाहर से यहां आता था।

यह विद्यालय ज्ञान, कर्म और श्रम का सामंजस्य बिठाने के लिए खोले जा रहे थे। बुनियादी विद्यालय एक ऐसा विद्यालय है जो ज्ञान, कर्म और श्रम के बीच भेद मिटाता है। ऐसा स्कूल जहां बच्चों को किताबी शिक्षा के साथ-साथ बढ़ईगिरी, किसानी, सब्ज़ी उगाना तथा डेयरी आदि विषयों का प्रशिक्षण मिल सके। जिसमें बुनियादी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे अपना हुनर विकसित कर सकें। इन कामों से जो भी कमाई हो उससे वे लोग अपने लिए पेंसिल,स्लेट ,कॉपी खरीद सकें।

संस्था का इतिहास

संस्थान नई तालीम का इतिहास बहुत ही पुराना और व्यापक है। इसके इतिहास को समझने के लिए हमें भारतीय इतिहास को भी समझना पड़ेगा। समझना पड़ेगा कि जब गाँधी अफ्रीका से भारत वापस आए तो उन्हें भारत किस रूप में दिखा? फिर गांधी ने क्या सोचा, क्या समझा और क्यों बात की बुनियादी शिक्षा की।

यह सब जानने से पहले यह भी जानना ज़रूरी है कि इन परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार कौन है? लॉर्ड मैकाले या भारतीय व्यवस्था। नई तालीम की संकल्पना गांधी जी के दिमाग में उपजी और हिन्दुस्तानी तालीमी संघ की स्थापना हुई इस समय भारत गुलाम था।

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भारतीय शिक्षा पद्धति और लॉर्ड मैकाले

अगर उसके पहले देखा जाए तो भारतीय शिक्षा पद्धति बुनियादी शिक्षा के रूप में चल रही थी। ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड मैकाले को भारत में अध्ययन के लिए भेजा। सन 1834 ई. से 1838 ई. तक वह भारत के सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहा। भारतीय दंड विधान से सम्बन्धित प्रसिद्ध ग्रंथ ‘दी इंडियन पीनल कोड’ की लगभग सभी पांडुलिपि इसी ने  तैयार की थी।

अंग्रेज़ी भाषा को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में इसका बड़ा हाथ रहा। 1823 ई. में मैकाले बैरिस्टर बना परन्तु उसने बैरिस्टरी करने की अपेक्षा सार्वजनिक जीवन पसन्द किया। वह 1830 ई. में ब्रिटिश पार्लियामेन्ट का सदस्य चुना गया और 1834 ई. में गवर्नर जनरल की एक्जीक्यूटिव काउंसिल का पहला कानून सदस्य नियुक्त होकर भारत आया।

भारत का प्रशासन उस समय तक जातीय द्वेष तथा भेदभाव पर आधारित तथा दमनकारी था। उसने ठोस उदार सिद्धान्तों पर प्रशासन चलाने की कोशिश की। उसने भारत में समाचार पत्रों की स्वाधीनता का आन्दोलन किया, कानून के समक्ष यूरोपियों और भारतीयों की समानता का समर्थन किया।

अंग्रेज़ी के माध्यम से पश्चिमी ढंग की उदार शिक्षा-पद्धति आरम्भ की और दंड विधान का मसौदा तैयार किया जो कि बाद में ‘भारतीय दंड संहिता’का आधार बना। मैकाले ने कहा था,

मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा कि इसमें पढ़कर निकलने वाला व्यक्ति सिर्फ शक्ल से भारतीय होगा और अक्ल से पूरा अंग्रेज़।

23 अक्तूबर 1937 को ‘नई तालीम’ की योजना बनाई गई। जिसे राष्ट्रव्यापी व्यावहारिक रूप दिया जाना था। उनके शैक्षिक विचार शिक्षाशास्त्रियों के तत्कालीन विचारों से मेल नहीं खा रहे थे इसलिये प्रारम्भ में उनके विचारों का विरोध हुआ।

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गरीब बच्चों के लिए यह संस्था वरदान

पूर्व में यह संस्था बुनियादी शिक्षा देने वाले शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का काम करता थी। वर्तमान में यह संस्था राज्य सरकार के साथ मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही है। खास बात यह है कि गरीब बच्चों के लिए यह संस्था अब वरदान साबित हो रही है और बच्चों के भविष्य को संवार रही है।

संस्था की अधार संरचना ग्राम्य जीवन को दर्शाती है। चूंकि यह भवन गांधी जी के रहते हुए बने थे और गांधी जी चाहते थे की जो भी भवन बने उसमें 10 किलोमीटर के अंदर से ही सामान लगा होना चाहिए। संस्था के भवन मिट्टी से बने हैं।भवनों की छत खप्पर से बनी हुई है।

संस्था द्वारा प्रत्येक माह बालसभा का आयोजन होता है जिसका संचालन बच्चे ही करते हैं। अगर कोई त्यौहार आता है जैसे रक्षाबंधन, होली, ईद या दिवाली तो इन सभी त्यौहारों पर बच्चों के माता-पिता को विद्यालय बुलाया जाता है। ये सभी पर्व धर्म को परे रखकर मनाए जाते हैं।

संस्था शैक्षणिक इकाई के रूप में कार्य करती है। संस्था व्यवहारिक शिक्षा  के साथ -साथ प्रयौगिक शिक्षा देने का भी कार्य करती है।

प्रवेश प्रक्रिया और व्यावसायिक शिक्षा

नई तालीम में प्रवेश प्रक्रिया, राज्य सरकार के नियम अनुसार होते हैं। संस्थान में प्रवेष के लिए राज्य सरकार की शर्तों का पालन किया जाता है क्योंकि यह विद्यालय राज्य सरकार से सबंधित दर्ज़ा रखता है इसलिए राज्य सरकार के समक्ष ही अपनी  प्रवेश प्रक्रियाओं को अपनाता है।

संस्था औपचारिक शिक्षा के रूप में राज्य सरकार के पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा का प्रसार कर रही है। यह संस्था महाराष्ट्र राज्य के अंतर्गत शैक्षणिक कार्यों को पूरा कर उनके मूल्यों को पूरा कर शिक्षा के कार्यों को पूरा करती है।

व्यावसायिक शिक्षा के आधार पर इस विद्यालय में पाठ्यक्रम के साथ-साथ  प्रायौगिक शिक्षा भी कराई जाती है। सुबह 9 बजे से दोपहर में भोजन करने के समय तक पाठ्यक्रम की शिक्षा दी जाती है। उसके बाद दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक प्रयौगिक शिक्षा के रूप में खेती,बढ़ईगिरी, सुताई, कढ़ाई, सिलाई, झाड़ू बनाना, टोकरी बनाना आदि कार्यों के रूप में व्यावसायिक शिक्षा दी जाती है।

इस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद बच्चा कहीं भी बेरोज़गारी से ग्रसित नहीं हो सकता। वह समाज में मान-सम्मान के साथ जीविका पार्जन कर सकता है और स्वावलंबी भी हो सकता है।

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विद्यार्थियों को बना रहा है स्वावलंबी

नई तालीम संस्था, शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही है। वर्तमान में बहुत सी सामाजिक, मनोसामाजिक आदि ऐसी समस्याएं हैं जिनसे लगभग हर तीसरा व्यक्ति ग्रसित है लेकिन यह विद्यालय जिस तरह से शिक्षा व्यवस्था को अपनाकर कार्य कर रहा है वह कार्य आज के समय में कहीं से आसान नहीं है।

यहां से पढ़ा हुआ बच्चा समाज में कहीं भी अपना जीविकापार्जन कर सकता है। उसे रोज़गार नहीं भी मिला तो भी वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकता है।

संस्था में उपलब्ध संसाधनों को देखा जाए तो इनका छोटा सा ग्रंथालय है, जिसमें बच्चे अध्ययन करते हैं। मिड डे मील के तहत खाना मिलता है। चूंकि यह गांधी जी द्वारा संचालित विद्यालय है तो इसमें आज भी नीचे बैठकर पढ़ाई कराई जाती है।

संस्था के वित्तीय स्त्रोत

बजाज ट्रस्ट, मानदेय ट्रस्ट व व्यक्तिगत फंडिंग के तहत संस्था के वित्तीय कोष को पूरा किया जाता है। जो बच्चे फीस देने में सक्षम हैं उनसे फीस भी वित्तीय स्त्रोत में ही सम्मिलित की जाती है।

संस्था के अन्य संस्थाओं के साथ संबंध है लेकिन बड़े स्तर पर नहीं है। एक तो राज्य सरकार से विद्यालय को मान्यता मिली हुई है और मानदेय ट्रस्ट, बजाज ट्रस्ट इन संस्थाओं के साथ संबंध है।

संस्था की भविष्य की योजनाएँ : संस्था की डायरेक्टर सुषमा शर्मा कहती हैं,

संस्था का उदेश्य गाँधी विचार से जुड़े हुए लोगों को प्रेरित करना है। हमारा लक्ष्य है कि नई तालीम की तरह ही शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं का उन्मूलन करें और भविष्य में इस विद्यालय को एक विश्वविद्यालय के रूप में देखें क्योंकि गाँधी भी यही चाहते थे कि ये जो भी बुनियादी विद्यालय हैं, ये सभी विश्वविद्यालय के रूप कार्य करें।

वह गाँधी के स्वप्न के बारे में आगे बताती हैं,

आज़ादी के बाद जैसे-जैसे सरकारें बदलती गई वैसे-वैसे बुनियादी विद्यालयों की नींव को भी खत्म करने का प्रयास किया जाता रहा है लेकिन 2004 से एक बार फिर से सरकार और गाँधी जी के सपनों को साकार करने की बात करने वालों के कान में जूं रेंगा है और फिर से बुनियादी विद्यालयों में शिक्षा देने का कार्य प्रारम्भ किया गया है।

जिस तरह से व्यक्ति की समस्या होती है ठीक उसी तरह से संस्था की भी कोई न कोई समस्या होती है। जैसे-

  • पहली समस्या ज़मीन की समस्या है जो की संस्था को आगे बढ़ने से रोकती है।
  • दूसरी समस्या मेंटीनेंस की समस्या है चूंकि यह नेशनल हेरिटेज में भी आता है इसलिए इसे संभाल कर रखना विद्यालय का फर्ज़ है।

मेंटीनेंस का खर्चा इसलिए भी ज़्यादा आता है क्योंकि जो भी भवन हैं वे सभी मिट्टी से बने हैं। बारिश के दिनों में बहुत ध्यान रखना पड़ता है। बारिश में कभी-कभी बंदर भी आ जाते हैं जिससे वे छत को तहस नहस कर देते हैं जिससे खर्च बहुत बढ़ जाता है।

  • तीसरी समस्या आर्थिक समस्या है। इसके कारण लगभग सारे कार्य रुक जाते हैं। कभी-कभी संसाधनों में भी कटौती करनी पड़ती है जिससे बच्चों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है।

ये तीनों समस्याएं संस्था के लिए बड़ी समस्या है जिनसे निपटने के लिए सरकार से मदद चाहिए होगी लेकिन सरकार ने अभी तक कोई सुध नहीं ली है। वह कुंभकरण की नींद सोई हुई है और यह साफ दिखाता है कि सरकार को संस्थाओं से कोई मतलब नहीं है।

नई तालीम सेवाग्राम, फोटो क्रेडिट – YouTube

संस्था की उपलब्धियां

नई तालीम संस्था की उपलब्धि को बताया जाए तो सबसे पहले

  • जब 2004 में यह संस्था अपना अस्तित्व खोने के बाद पुनः वापस कार्य के लिए आई, तो केवल 12 बच्चों ने पढ़ने के लिए प्रवेश लिया था लेकिन अपनी गुणवत्ता के दम पर धीरे-धीरे आज इसमें बच्चों की संख्या लगभग 250 के पार पहुंच गई है। यह संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
  • दूसरी उपलब्धि है कि पिछले 2 साल में 100% परीक्षा परिणाम रहा है जिसमें से उच्चतम 92% परिणाम आया है। जबकि इस विद्यालय में पाठ्यक्रम के अलावा बच्चों को कार्य भी करने पड़ते है जैसे साफ-सफाई, खाना बनाना, खेती करना, खेती से उत्पादित फसलें बाज़ार में बेचने जाना और यह सब पाठ्यक्रम का हिस्सा माना जाता है।

नई तालीम संस्था महाराष्ट्र राज्य सरकार के साथ शैक्षणिक संबंध रखती है क्योंकि शैक्षणिक क्षेत्र में काम करने वाली किसी भी संस्था को राज्य या केंद्र सरकार से संबंध रखना होता है इसलिए नई तालीम भी महाराष्ट्र सरकार से संबंध रखती है। अन्य दो संस्थाएं और भी हैं जिनसे संपर्क रखती है वह है बजाज ट्रस्ट और मानदेय ट्रस्ट। इनसे ज़रूरत पड़ने पर मदद भी ली जाती है।

गाँधी का पाठ्यक्रम और विनोबा का भूदान

1937 में हिन्दुस्तानी तालीमी संघ ने उत्तम बुनियादी तालीम की परिकल्पना पर गंभीरता से विचार-विमर्श शुरू कर  दिया था। इस शिक्षा का मकसद यह था कि ग्रामीण भारत की ज़रूरतों और समस्याओं पर एक ऐसा शोध और चिन्‍तन किया जाए जो किसी ग्रामीण विश्वविद्यालय में किया जा सकता है।

आखिरकार 1955 में यह ‘विश्‍व विद्यालय’ सेवाग्राम में शुरू कर दिया गया जिसमें पोस्ट-बेसिक चरण तक शिक्षा प्राप्त कर चुके कुछ स्नातकों को लिया गया था। इसकी ज़िम्मेदारी आर्यनयाकम, आशा देवी और डॉ ज़ाकिर हुसैन को दी गई और कहा गया की आप लोग बुनियादी शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करें।

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तीनों लोगों ने मिलकर 8 साल का पाठ्यक्रम तैयार कर लिया और गाँधी जी को सौंपा। गाँधी जी जब यह पाठयक्रम लागू करने की बात करने लगे तो बहुत विरोध हुआ और कुछ लोगों ने सपोर्ट भी किया। यह सब चल ही रहा था कि विनोबा भावे के आह्वान पर भूदान आन्‍दोलन में सहयोग करने का युवाओं ने फैसला लिया।

वे उन गाँवों को विकसित करने के लिए विशेष रूप से उत्सुक थे, जो ग्राम दान के लिए तैयार हो चुके थे। ग्राम दान की परिकल्पना में साझा हित के लिए गाँव की ज़मीन का सामूहिक उपयोग करते हुए एक सहकारी ग्राम समुदाय के रूप में जीने की कला सीखना सबसे महत्वपूर्ण था।

जनवरी 1957 में तालीमी संघ ने भी इस पहल का समर्थन किया। संघ ने कहा

विनोबा जी का भूदान आन्‍दोलन अब ग्रामदान का रूप ले चुका है। अब वक्त आ गया है कि इस कार्यक्रम के माध्यम से एक अहिंसक सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया जाए। अहिंसक सामाजिक क्रांति शिक्षा के माध्यम से ही सम्‍भव है। क्योंकि गांधी जी भी कहते थे की शिक्षा ही वह हथियार है जो बहुत दूरदर्शी है।

गाँधी जी ने भारत को एक बहुमूल्य चीज़ सौंपी है जो की बुनियादी शिक्षा के रूप में नज़र आती है। बुनियादी शिक्षा बहुमूल्य और महत्वपूर्ण है इसको देश और दुनिया के लोग बुनियादी शिक्षा और नई तालीम के नाम से जानते हैं।

गाँधी जी ने 23 अक्टूबर 1937 को ‘नई तालीम’ की योजना बनाई जिसे राष्ट्रव्यापी व्यावहारिक और प्रयौगिक  रूप दिया जाना था। ये सब गाँधी जी के स्वयं के विचार थे। कुछ विद्वानों से उनके विचार मेल नहीं खाते थे इसलिए उनके विचारों का शुरू में विरोध भी हुआ, तो कुछ लोग पक्ष में भी नज़र आए। अंत में जो विरोधी थे गाँधी जी ने उन्हें ही बुनियादी शिक्षा का पाठयक्रम बनाने को सौंप दिया। उन लोगों ने भी मन लगाकर कार्य किया।

गाँधी जी ने कहा था,

नई तालीम भारत के लिए उनका अंतिम और सर्वश्रेष्ठ योगदान है।

गांधी जी चाहते थे कि भारत के लोग स्वावलंबी बने और यह काम बुनियादी शिक्षा ही कर सकती थी। वर्तमान में देखें तो मैकाले की शिक्षा का बोझ आज हर भारतीय ढो रहा है। इसलिए यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि गांधी जी की कल्पना के अनुसार बुनियादी विद्यालय में उत्पादक व्यवसायों को आरंभ कर देने से बुनियादी शिक्षा का खर्च बड़ी मात्रा में कम नहीं किया जा सकता। अगर बुनियादी शिक्षा को  देश भर में प्रारंभिक शिक्षा की सार्वभौम पद्धति बनाना हो तो इसके लिए बड़ी मात्रा में बढ़ाई गई अर्थव्यवस्था ज़रूरी है।

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बुनियादी शिक्षा की संकल्पना और आज़ाद भारत की सरकार

एक सामाजिक कार्यकर्ता के आधार पर जो हमने महसूस किया और देखा उसे अपने शब्दों में ही लिखने का प्रयास किया है। महात्मा गाँधी ने बुनियादी शिक्षा की संकल्पना की उपज कर एक रत्न  का रूप देने की कोशिश की थी। इस धरोहर को आज़ाद भारत की सरकारें सही तरीके से संरक्षित तक नहीं कर पाई और उसे गटर तक पहुंचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

जब बुनियादी शिक्षा की संकल्पना उभरी थी तो देश के लोगों ने खुले दिल से स्वागत किया था। खासकर बिहार के लोगों ने तो खुलकर स्वागत किया था। इसलिए शायद जब बिहार के वृंदावन में पहला बुनियादी विद्यालय खुला तो बिहार के लोग और खुश हुए।

बुनियादी शिक्षा निरंतर प्रगति करती रही है क्योंकि बेसिक स्कूलों की संख्या बराबर बढ़ती रही है। किंतु साधारण प्रारंभिक और मिडिल स्कूलों की अपेक्षा बुनियादी विद्यालयों की संख्या की वृद्धि की गति में कमी रही है।

बुनियादी विद्यालयों में प्रवेश का जहां तक संबंध है तो स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। लक्ष्य तो यह था कि बुनियादी  शिक्षा में 6 से 14वर्ष के वर्ग वाले सभी लड़कों एवं लड़कियों के लिये बुनियादी शिक्षा का प्रबंध किया जाए। किंतु प्रथम दो योजनाओं में कोई महत्वपूर्ण प्रगति इस शिक्षा में नहीं हुई।

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इस काल में बुनियादी शिक्षा के प्रसार की प्रगति उतनी भी नहीं हुई जितनी साधारण प्रारंभिक शिक्षा के प्रसार की। यद्यपि साधारण प्रारंभिक शिक्षा की प्रगति भी संतोषजनक नहीं है। वर्तमान में पूरे देश में लगभग 80 हजार बुनियादी विद्यालय कागज पर राज्य सरकारों के अधीन दब कर रह गए हैं।

सेवाग्राम नई तालीम जैसे ही कुछ मॉडल विद्यालय की तरह कार्य कर रहे हैं। इस विद्यालय में बच्चों के लिए रचनात्मक कार्यक्रम भी कराए जाते हैं जिससे बच्चों में कुछ रचनात्मकता की उपज बढ़ती है। गाँधी जी के अनुसार यह सब होने के बाद ही कोई बच्चा स्वावलंबी बन सकेगा।

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नोट: लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से एम एस डब्ल्यू कर रहें हैं।

 

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