दुनिया को बचाने के लिए हमारे पास सिर्फ 12 साल हैं

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अगर आप अपने बच्चों से या होने वाले बच्चों से प्यार करते हैं, तो दस मिनट के लिए मेरी बात सुन लीजिए। क्लाइमेट चेंज इस वक्त हमारी ज़िंदगी का सबसे रेलिवेंट मुद्दा है।

इसके असर सारी मौजूदा मानव जाति और आने वाले वंशों पर पड़ रहे हैं और आगे भी पड़ेंगे। क्लाइमेट चेंज को मानवता के सामने आई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि हमारी पीढ़ियों के लिए दुनिया बचाए रखने के लिए बस 12 साल हैं।

क्या है क्लाईमेट चेंज?

क्लाइमेट चेंज एक प्रक्रिया है जिसमें धरती का तापमान अनियंत्रित रूप से बढ़ रहा है और इस बढ़त से हमारे मौसम और प्राकृतिक संसाधनों में असहनीय बदलाव आ रहे हैं। तापमान में बढ़त, सूरज से आने वाली गर्मी के पूरी तरह से वापस ना जाने की वजह से हो रही है।

सूरज से आने वाली गर्मी, आसमान में बढ़ती CO2 गैस की वजह से वापस नहीं जा पा रही है। आसमान में CO2 गैस का छोड़ा जाना, हमारी ज़िंदगी की सबसे बेसिक एक्टिविटी की वजह से होता है। जैसे कोयले से बिजली बनाना, गाड़ियों, ट्रकों, बसों का चलना ओर किसी भी बिल्डिंग में लगने वाले सीमेंट बनाने के लिए चूना जलाना।

फोटो साभार- Pixabay

दूसरे शब्दों में, इंसानों द्वारा ही CO2 गैस आसमान में छोड़ी जाती है। कुछ एक्टीविटीज़ जिसमें निर्माण कार्य आदि हैं उनके द्वारा CO2 छोड़े जाने वाला जीवन, हम बस पिछले डेढ़ सौ साल से ही जी रहे हैं।

इस दौरान छोड़ी गई सारी CO2 अभी भी ऊपर आसमान में है। यह CO2, सूरज से आने वाली गर्मी को एक खास विशेषता की वजह से धरती तक आने तो देती है मगर पूरी तरह वापस नहीं जाने देती। लगातार बच जाने वाली इस गर्मी से हम इंसानों ने सारी धरती का तापमान औसत एक डिग्री बढ़ा दिया है।

CO2 के आसमान में रहने तक तापमान में यह बढ़त लगातार जारी रहेगी लेकिन हम फिर भी आसमान में और CO2 छोड़ते जा रहे हैं।

तापमान में बढ़ा केवल एक डिग्री भला हमारा क्या बिगाड़ सकता है?

तापमान में बढ़ा केवल एक डिग्री भला हमारा क्या बिगाड़ सकता है? जवाब है, लगभग सब कुछ। दुनिया में सब जगह होने वाले मौसम और उनकी सालाना साईकल, एक काफी लचीले संतुलन में बंधे हुए हैं।

यह संतुलन तापमान में 0.1 डिग्री बदलाव से भी बहुत बिगड़ जाता है। बिगड़ी हुई मौसमी साईकल से मॉनसून में अनियमितता आएगी जिससे फसलों की पैदावार में नुकसान बढ़ेगा। पिछले दस सालों से गर्मी के मौसम में सबसे ज़्यादा टेंपरेचर लगातार हर साल रिकॉर्ड तोड़ रहा है और यह पैटर्न जारी रहने वाला है।

समुद्र से आने वाले तूफान बढ़े तापमान से ज़्यादा बड़े और विनाशकारी हो जाएंगे। गंगा, यमुना, सतलुज जैसी नदियों के ग्लेशियर बढ़ती रफ्तार से पिघल रहे हैं, जिससे भारत-पाकिस्तान के 100 करोड़ लोगों के पानी की सप्लाई में अनिश्चितता और अनियमितता आएगी।

फोटो साभार- Pixabay

मधुमक्खियां, जो 100 में से 95 फसलों के पॉलिनेशन की ज़िम्मेदार होती हैं, उनकी एक तिहाई प्रजातियां इस बढ़े तापमान को ना सह पाने की वजह से विलुप्त हो चुकी हैं। धरती के ध्रुवों के ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, जिससे तटों पर रहने वाले अकेले भारत के ही 3 करोड़ लोग बेघर हो जाएंगे।

सूखा, ट्रोपिकल सायक्लोन्स, जंगली आग, अनियमित बारिशें जैसी प्राकृतिक विपदाओं की प्रबलता वक्त के साथ बढ़ती जाएगी और इनकी frequency भी। इनकी वजह से भुखमरी, बीमारियां और शरणार्थी संकट आएंगे तथा भारी आर्थिक नुकसान होंगे। समझ लीजिए की प्रलय एक बार नहीं आएगा बल्कि आता जाएगा।

तापमान में बढ़त की वजह से पिघलते हुए ग्लेशियर्स, फोटो साभार- Pixabay

हालांकि यह ज़रूरी नहीं है कि यह सारे नुकसान और अनचाहे बदलाव आपके जीते जी ही हो जाएं, पर यह सब आपके बच्चों को सहने पड़ेंगे, इसकी पूरी साइंटिफिक गारंटी है।

क्या होगा दुनिया का

दुनिया हर दिन बद से बदतर होगी। कितनी होगी, यह हमारे हाथ में है। क्या हालात तबाही की सीमा तक पहुंचेंगे या हम उससे पहले ही इसपर काबू पा लेंगे? यह आज तो हमारे हाथ में है, पर वक्त निकलता जा रहा है क्योंकि वैज्ञानिकों ने पिछले साल यह गणना की है,

अगर तापमान में औसत 1.5 डिग्री से अधिक बढ़त होती है तो पर्यावरण को होने वाली क्षति से वापस आना मानव नियंत्रण के पार होगा।वापस हमें दुनिया को उस रूप में देखना असंभव हो जाएगा जिसके हम आदी हैं।

मौजूदा CO2 उत्सर्जन का दर 11 हज़ार टन प्रति सेकंड है। इसे डेढ़ डिग्री तक सीमित रखने के लिए 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन को सन 2010 के दर से 45% कम और 2050 तक कुल उत्सर्जन ‘ज़ीरो’ तक, घटाना होगा।

फोटो साभार – Pixabay

उस काम में सबसे बड़ा हिस्सा, अपनी ऊर्जा की ज़रूरतों को ईंधन जलाने से हटाकर अन्य स्रोतों द्वारा पूरा करने से आएगा। वैज्ञानिकों के दिए गए इस कार्बन के बजट में ही हमें अपना गुज़ारा करना सीखना होगा।

हालांकि सरकारें ‘पर्यावरण’ बचाने के लिए लॉन्ग टर्म में अन्य ऊर्जा स्रोतों पर शिफ्ट होने की योजनाएं लाती रहीं हैं, मगर अब उस लॉन्ग टर्म की एक 12 साल की मियाद बन गई है और दांव पर ‘सारी धरती’ है।

जान बचानी है तो बदलावों को स्वीकार करें

हमारी गुज़र बसर की सारी गतिविधिओं के लिए ऊर्जा, ईंधन जला कर ही मिलती है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए हमें अपने परिवहन, अपने ऊर्जा, भूमि उपयोग और निर्माण के इंफ्रास्ट्रक्चर और अपने औद्योगिक सिस्टमों में अभूतपूर्व बदलाव लाने होंगे।

इसका मतलब है अपनी मौजूदा कोयले की खपत में एक तिहाई घटाना होगा। विशाल स्तर पर वनरोपण करने होंगे और यह सब अगले 12 साल की अवधि में, जबकि हमारा आवेग हमें उलट दिशा में ले जाता जाएगा।

एक और डेढ़ डिग्री के बीच का आधा डिग्री भले ही नन्हा लगे मगर उसके लिए लगने वाले प्रयास और उनके परिणाम दैत्याकार हैं क्योंकि वायुमंडल में देशों के बीच कोई सरहदें नहीं बचती। किसी भी देश के उत्सर्जन बाकी सारे देशों के लोगों को प्रभावित करते हैं, इसलिए बदलाव भी हर देश को लाने होंगे।

फोटो क्रेडिट – नवदीप सैनी

इस आपदा को रोकने के लिए कठोर नियमों और पॉलिसी में बदलाव होंगे जिनसे लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कई तकलीफें आएंगी। व्यवसाय में लागत बढ़ेगी जिसका हम सब पुरज़ोर विरोध करेंगे।

इसलिए सारी आबादी को पूरी बात से अवगत और आने वाले बदलावों के लिए जागरूक करना होगा। लोगों, धंधों और सरकारों, तीनों को ही आपस में मदद करके बदलाव लाने होंगे।

सारी धरती को आधी डिग्री और गर्म होने में असाधारण ऊर्जा लगेगी और उतनी ही असाधारण लगेंगे उसे रोकने के लिए प्रयास भी।

सबको मिलकर उठाने होंगे कदम

बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचानी है, जल्दी से जल्दी। बात इसी बारे में है की अनजान इंसान के मुंह से सुनकर एकदम से यकीन भी नहीं आएगा मगर है कोरा सत्य और बेहद ज़रूरी वाला।

ऐसी बात को सबसे ज़्यादा और सबसे जल्दी पहुंच मीडिया ही दिला सकते हैं और आम आदमी के लिए उनसे ज़्यादा भरोसेमंद कोई ज़रिया भी नहीं क्योंकि पूरे मुद्दे में कॉम्पलेक्स साइंटिफिक कॉन्सेप्ट्स और भविष्य की घटनाओं की लंबी शृंखलाबद्ध कड़ियां हैं।

एक पत्रकार ही केवल सरलता से और आम बोलचाल की भाषा में यह बात बता सकता है। इसलिए मीडिया संस्थानों का इस मुहिम में भाग लेना ज़रूरी है और इसी से चौथे स्तंभ के ऊपर एक और बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है।

सबसे ज़्यादा जागरूक बच्चे और टीनएजर्स

बच्चों और टीनएजर्स को जब से मुद्दे की खबर हुई है और इस का अहसास हुआ है कि यहां सबसे ज़्यादा दांव उन्हीं के भविष्य का है तब से उन्होंने दुनिया भर में मुहिमें और हड़तालें शुरू कर दी हैं।

बच्चों द्वारा क्लाईमेट चेंज के लिए स्ट्राइक, फोटो साभार- School Strike 4 Climate का फेसबुक अकाउंट

भारत के बच्चे इस साल एक मार्च से जुड़ गए हैं। मुहिम की महत्वकांक्षा को बढ़ावा देने और क्लाइमेट चेंज पर हुए पेरिस एग्रीमेंट को लागू करने के लिए, लिए जाने वाले कदमों को गति देने के लिए, UN सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटरेस 23 सितम्बर को क्लाइमेट एक्शन सम्मिट 2019 की मेज़बानी करेंगे।

इसी के साथ 20-27 सितम्बर के दौरान विश्व भर में विशाल स्तर पर पर्यावरण हड़तालें की जाएंगी, जहां लोग और उनका नेतृत्व करते हुए बच्चे, आगामी संकट के बारे में सूचना फैलाने के लिए आवाज़ उठाएंगे और एक क्लाइमेट एमरजेंसी घोषित करने की मांग करेंगे।

अगर देश की सभी मीडिया इन हड़तालों का प्रचुर कवरेज करें, तो बच्चों की इन मांगों की आवाज़ जन-जन के दिल में गूंज जाएगी।

हॉन्गकॉन्ग के बच्चों द्वारा क्लाईमेट चेंज के लिए स्ट्राइक, फोटो साभार- School Strike 4 Climate का फेसबुक अकाउंट

भविष्य में, जिन लोगों तक यह बात अभी नहीं पहुंचाई गई वे यह ना कहें कि अगर किसी को भी इस बारे में पहले पता चल गया था तो उसने हल्ला क्यों नहीं मचाया? उसने चिल्ला-चिल्ला कर तभी हर इंसान को इस बारे में क्यों नहीं बताया?

यही हमारा मौका है? अपनी और सबकी आंखें खोलने का। खुद के पास यह हक रखने का कि हम पुश्तों से आंखों से आंखें मिला पाए।

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