“भारत में वामपंथ क्यों हो रहा है असफल?”

आज जब देश गंभीर राजनीतिक अस्थिरता की तरफ बढ़ चुका है, विपक्ष के नाम पर एक खौफनाक सन्नाटा पसरा हुआ है और लोकतांत्रिक संस्थाएं सत्ता के चंगुल में जकड़ी हुई हैं, ऐसे दौर में वामपंथी राजनीति और आंदोलनों की असफलता हमें परेशान करती है।

निःसंदेह वामपंथ विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं क्रांतिकारी विचारधारा है। सदियों से यह बुद्धिजीवियों, लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों एवं विचारकों का प्रतिनिधित्व करती रही है लेकिन ऐसे हालात में वामपंथ का सूर्यास्त देखना बेहद निराश करता है।

अब वक्त आ गया है कि मानवीय इतिहास की सर्वाधिक प्रभावशाली विचारधारा के भारतीय राजनीति में लगातार असफल होने की वजहों का विश्लेषण किया जाए।

वामपंथी नेताओं में लूट-खसोट की इच्छा ना होना

बात थोड़ी अटपटी लग सकती है लेकिन थोड़ी गंभीरता से इस बात का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि वामपंथी नेताओं में लूट-खसोट की इच्छा ही नहीं है, जिस कारण उनमें सत्ता पाने की भूख पैदा ही नहीं हो रही है।

दूसरी तरफ अन्य दलों और नेताओं में सत्ता की भूख इस हद तक प्रबल है कि वे कुकर्म तक कर रहे हैं। नेताओं के अंदर लालच और सत्ता में पहुंचकर सरकारी खज़ाने को लूटने की इच्छा ही उन्हें सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए मजबूर करती है।

राजनीतिक सुचिता एवं ईमानदारी

अगर हम भारतीय राजनीति के इतिहास में वाम राजनीति के सफलता के हिस्सों को देखें, तो एक बात निकलकर सामने आती है कि जब तक उनमें राजनीतिक सुचिता कायम थी, तब तक उन्हें अच्छी सफलता मिलती रही।

देश की आज़ादी के बाद देश में जो भी प्रमुख राजनेता थे, चाहे वे किसी भी पार्टी या विचारधारा से हो, उनके अंदर राजनीतिक सुचिता, ईमानदारी और कुछ कर गुज़रने की सोच थी।

ऐसे वक्त में काँग्रेस की मज़बूत पकड़ के बावजूद विचारधारा, राजनीतिक सुचिता और ईमानदारी के पैमानों पर वामपंथी नेता अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज़ कराते रहे। वामपंथी नेता आज भी इन पैमानों पर अच्छे हैं लेकिन दुर्भाग्य से आज हमारी राजनीति के पैमाने ही बदल चुके हैं।

आज की राजनीति में सफल होने के लिए राजनीतिक सुचिता की नहीं, बल्कि झूठ, फरेब, पाखंड और बेईमानी की आवश्यकता है। हमें अपराधी और दबंग किस्म के नेता पसंद हैं। चुटकी में पाला बदल लेने वाले राजनेता, राजनीतिक सुचिता और विचारधारा के नए ब्रांड हैं। इन सब पैमानों पर वाम नेता कहीं नहीं टिकते हैं, जिसके फलस्वरूप वे असफल हैं।

राजनीति का फिल्मी स्वरूप

एक समय था जब हम टीवी सिर्फ फिल्म और धारावाहिकों के लिए देखते थे लेकिन अब हम टीवी नेताओं के लिए भी देखते हैं। नित्य बनते चैनलों के दौर में नेताओं ने अभिनेताओं की अपेक्षा कहीं ज़्यादा स्क्रीन कवर कर लिया है। आज के नेता शानदार एवं मनोरंजक डायलॉग, व्यंग्य और जुमला बोलने में अभिनेताओं से कड़ा मुकाबला कर रहे हैं। दुर्भाग्य से इस मुकाबले में कम्युनिस्ट पार्टियों का कोई भी बड़ा नेता नहीं दिख रहा है।

फोटो साभार- Twitter

आज के दौर में आम जनता भी नेताओं को अभिनेताओं के रूप में स्वीकार करने लगी है। मंच से उछलते जुमलों, व्यंग्यों और लच्छेदार भाषणों पर सीटियां बजाना एवं हंगामे वाली प्रतिक्रिया देना, उनकी राजनीतिक समझ के प्रमाण हैं। इसके विपरीत कई वाम नेता वही पुराने घिसे-पिटे स्टाइल के खादी कुर्ता-पजामा और बढ़ी हुई बेतरतीब दाढ़ी में नज़र आते हैं। मतलब कहीं से कोई आकर्षण ही नहीं है। ऊपर से ऐसे-ऐसे शब्दावली वाले बोरिंग भाषण देते हैं, जिनमें किसी प्रकार का मनोरंजन ढूंढना मुश्किल है।

जाति और धर्म आधारित राजनीति से दूरी

हम सभी जाति और धर्म आधारित राजनीति को लेकर कितना भी ज्ञान दें लेकिन हकीकत यही है कि इस देश की राजनीति में जाति-धर्म सर्वाधिक प्रभावी विषय है। दलीय आधार पर कौन कहां खड़ा है? किस जाति और धर्म की गोलबंदी कर अपनी ज़मीन बना रहा है? यह सर्वविदित है। नेता कितना भी नालायक क्यों ना हो, उसे अपनी जाति के लोगों के वोट मिल ही जाते हैं।

ऐसे माहौल में अपनी ज़मीन बचाए रखने में कम्युनिस्ट पार्टियां लगातार असफल हो रही हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति कभी भी जाति एवं धर्म पर आधारित नहीं रही है। वे हमेशा समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हुए समान मानवीय अधिकारों की बात करती रही हैं। वे गरीब एवं शोषितों के न्याय की लड़ाई लड़ती रही हैं। जैसे-जैसे हमारा समाज जाति और धर्म के आधार पर टूटता चला गया, संपूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली वामपंथी राजनीति भी टूटती चली गई।

पूंजीपतियों की खिलाफत

वामपंथ शुरू से ही पूंजीवाद और पूंजीवादी व्यवस्था की वजह से पैदा हुए शोषण, अन्याय एवं अत्याचारों के खिलाफ संघर्ष करता रहा है। भारत में भी कम्युनिस्ट पार्टियां ट्रेड यूनियन के माध्यम से उद्योगपतियों एवं फैक्ट्री मालिकों द्वारा कामगारों के शोषण के खिलाफ बगावती तेवर दिखाती रही हैं।

अब हालात बदल चुके हैं। एक तरफ ट्रेड यूनियन संघर्ष दम तोड़ चुका है, तो दूसरी तरफ पूंजीवादी शक्तियां देश में एक सुपर पावर बनकर उभरी हैं।

आज हालात यह है कि देश के बड़े पूंजीपति ही अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता को संचालित कर रहे हैं। उनके द्वारा दिए गए करोड़ों के चंदे पार्टियों को सत्ता में पहुंचाने का ईंधन है। पूंजीपतियों और नेताओं के लिए चुनावों में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाना एक व्यावसायिक निवेश है, जिसे भविष्य में वे अरबों में भुनाते हैं।

दूसरी तरफ सत्ता में पहुंचने का यह ईंधन, वाम-दलों को प्राप्त नहीं है। आज भी वामपंथी पार्टियां अपने खर्चों के लिए आम जनता पर आश्रित हैं। मजबूरन हवाई राजनीति के दौर में आज भी वे ज़मीनी राजनीति में धूल फांक रहे हैं। राजनीति के हरीशचंद्र बने वामपंथी नेता आज भी अपने विचारों के दम पर क्रांति पैदा करने का भ्रम पाले हुए हैं।

सामंती ताकतों की खिलाफत

पूंजीपतियों की तरह ही वामपंथ की विचारधारा शुरू से ही सामंती विचारधारा के खिलाफ आंदोलित रही है। हमारे समाज का एक खास वर्ग जो इतिहास के हर दौर में सत्ता से चिपककर समाज के कमज़ोर लोगों का शोषण करता रहा है, वामपंथ हमेशा इस शोषक वर्ग के खिलाफ और इनके शोषण का शिकार हुए लोगों के समर्थन में अपनी आवाज़ बुलंद करता रहा है।

एक सच यह भी है कि हमेशा सत्ता के इर्द-गिर्द रहने की वजह से सत्ता की एक कुंजी इनके हाथों में होती है। आज भी सामंती ताकतें जिन दलों के साथ खड़ी हैं, वे राजनीति के चमकते सितारे बने हुए हैं।

जनता के मुद्दों की बात करना

आज अगर हम उन दलों की राजनीति का अध्ययन करें, जो सफल हैं तो एक बात स्पष्ट है कि आज जनता के वास्तविक मसलों की जगह प्रोपगेंडा, सुनहरे सपने और झूठे वादों का बोलबाला ज़्यादा है। जिनकी थाली में दो वक्त की रोटी भी नहीं है, उन्हें छप्पन भोग का ख्वाब दिखाया जाता है। जिनकी क्षमता दिल्ली घूमने की भी नहीं है, उन्हें चांद घूमाने का वादा किया जाता है।

चुनावी सभा
चुनावी रैली। फोटो साभार- Twitter

जनता को, विशेषकर नई पीढ़ी को सिनेमा बहुत पसंद है। वह नेताओं की बातों को भी कोई खूबसूरत पटकथा मानकर मुग्ध हो जाती है फिर सो जाती है। फिल्मों की तरह ही इनका आकर्षण, रोचकता, रोमांचकता और हंगामा इतना ज़्यादा है कि वामपंथियों की बातें पुराने ज़माने के नानी-दादी की कहानियों जैसी फीकी पड़ जाती हैं।

वामपंथी नेता आज भी वही पुराने पूंजीवाद, सामंतवाद, अंधविश्वास, शोषण, असमानता, अत्याचार, अन्याय, किसानों-मज़दूरों की समस्याएं, गरीबी-भुखमरी और शिक्षा व्यवस्था जैसे मसलों पर कान-पकाऊ और उबाऊ भाषण झाड़ते हैं। ये भाषण कितने भी वास्तविक हो लेकिन नई पीढ़ी को आकर्षित नहीं करते हैं।

वामपंथ का वास्तविक चरित्र

इस देश के अन्य राजनीतिक दल विशुद्ध राजनीतिक कार्यों में लीन हैं। उनका उद्देश्य, उनके कार्यक्रम, उनकी सभी गतिविधियां सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए होती हैं। इसके ठीक विपरीत वामपंथ एक समग्र विचारधारा है, एक मानवीय चिंतन है और एक जीवनशैली है।

राजनीति से कहीं ज़्यादा यह सामाजिक आंदोलनों, संघर्षों और सामाजिक क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए पहचानी जाती रही है। यही वजह है कि भले ही कोई मतदाता इस विचारधारा से जुड़े या ना जुड़े लेकिन मानवीय, सामाजिक, शैक्षणिक सोच रखने वाले देश के लाखों लेखक, साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, शिक्षाविद एवं बुद्धिजीवी, वामपंथ के विचारों के साथ खुद को खड़ा करते हैं।

चुनावी सभा में मौजूद लोग
चुनावी सभा में मौजूद लोग। फोटो साभार- Twitter

वामपंथ के एजेंडों में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने और उसूलों को ताक पर रखकर राजनीति करने की सोच कभी शामिल नहीं रही है। वह हमेशा समाज के दबे-कुचलों, पीड़ित, शोषित, वंचित, गरीब किसान और मज़दूरों के संघर्षों का नेतृत्व करता रहा है। उनके साथ मिलकर नमक-रोटी और सत्तू खाकर, उनके दुःख-दर्द को समझते हुए समाज के दबंगों, सामंती ताकतों के खिलाफ ना सिर्फ लड़ाईयां लड़ी हैं, बल्कि सैकड़ों कुर्बानियां भी वामपंथी नेताओं ने दी हैं।

आज हमारे समाज के दबे-कुचले और शोषित वर्गों के लोग अगर कुछ बोल पा रहे हैं, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा पा रहे हैं, आंखों में आंखें डाल बेईमानी का सामना कर पा रहे हैं, तो निश्चय ही इन संघर्षों का सफल परिणाम दिखता है।

सच यह भी है कि वामपंथी संगठन विभिन्न स्तरों पर जब गैर-राजनीतिक संघर्षों का सफलतापूर्वक नेतृत्व कर रहे थे, ठीक उसी दौरान इस देश में कई नए-नए राजनीतिक दल लोगों को सतरंगी सपने दिखाकर वोटों को ठगने का काम करते रहे। अगर हम यह कहें कि जनता के वोटों को ठगने में वामपंथी दल पिछड़ गए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

इस प्रकार से देखें तो वामपंथ की असफलता की कई वजह निकलकर सामने आई हैं। इनमें से कई ऐसी वजहें भी हैं, जो शायद ना होती तो सत्ता हासिल कर ली जाती लेकिन समाज के बुद्धिजीवी तबके का समर्थन खत्म हो जाता।

खैर जो भी हो, हम इसी प्रकार वामपंथ की असफलता के किस्सों को कई कड़ियों में आपके सामने लाएंगे। हमारी कोशिश तथ्यों को स्पष्ट रखने मात्र की है। अगली कड़ी और भी रोचक होगी, क्योंकि हम जानेंगे कुछ ऐसी कड़वी सच्चाइयों के बारे में, जो वामपंथी नेताओं को भी मुश्किल से हजम होती है।

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