“धार्मिक राज्य की परिकल्पना हमेशा एक नस्ल के विनाश पर आधारित होती है”

विगत दो दिनों से रामचंद्र गुहा की किताब “भारत गॉंधी के बाद” पढ़ रहा हूं। एक बेहद दिलचस्प संदर्भ का अवलोकन इसके पाठ विभाजन के तर्क में मिलता है। हालांकि जिस संदर्भ की मैं बात कर रहा हूं, उसका कोई तुलनात्मक अध्ययन मौजूदा समय की सियासात के साथ इस किताब में नहीं किया गया है।

अगर आप इस दौरान सियासतदानों के बयानों पर कान धर के बैठे नहीं हैं, तो इस बात को सहज जान सकते हैं। पहले मैं पाठ के उस अंश का उल्लेख नीचे कर रहा हूं।

भारत गॉंधी के बाद किताब का कवर पेज

“1946 की शुरुआत में प्रांतीय विधानसभाओं के लिए चुनाव करवाए गएं। सन् 1946 के चुनाव में कॉंग्रेस ने उम्मीद के आधार पर चुनाव लड़ा। इसकी योजनाओं में सकारात्मक मुद्दों की कमी नहीं थी। पार्टी ने भूमि सुधार, श्रमिकों के अधिकार और अन्य दूसरी बातों पर ज़ोर दिया। जबकि मुस्लिम लीग ने दूसरी तरफ भय की भावना का प्रचार किया।

उसने मुसलमानों से कहा कि अगर उन्हें अपना अलग मुल्क नहीं मिला तो वे एक संयुक्त हिंदुस्तान में हिंदुओं के वर्चस्व तले कुचल दिए जाएंगे। दरअसल, लीग उस चुनाव के माध्यम से एक जनमत संग्रह करवा रही थी। जिन्ना ने एक चुनावी सभा में कहा,

यह चुनाव, अंत की शुरुआत है। अगर इस चुनाव में मुसलमान पाकिस्तान के पक्ष में खड़े होते हैं, तो हम आधी लड़ाई अभी जीत जाएंगे। अगर हम लड़ाई के पहले ही चरण में नाकामयाब हो गए, तो हम बर्बाद हो जाएंगे।

जिन्ना का यह संदेश उनके कैडरों द्वारा ज़ोर-शोर से आम मुसलमानों में फैलाया गया। बिहार में मुस्लिम लीग की प्रांतीय शाखा ने अपने समर्थकों से कहा कि उन्हें वोट डालने से पहले यह देखना चाहिए कि उनके वोट से राम-राज्य के किले का निर्माण होगा या इससे एक आज़ाद मुस्लिम राष्ट्र या इस्लामी राज्य का गठन होगा।

पंजाब में लीग के एक चुनावी पोस्टर ने कुछ अर्थपूर्ण शब्दों का जोड़कर पेश किया, जिनके मायने एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग थे। इस पोस्टर ने लोगों से कहा ‘दीन बनाम दुनिया, ज़मीर बनाम जागीर या हक कोशी बनाम सफेदपोशी?

इसमें से हरेक समूह में पहला शब्द मुसलमानों से पाकिस्तान का समर्थन करने का आह्वान कर रहा था, जबकि दूसरा शब्द हिंदुस्तान को इंगित कर रहा था। लीग के प्रोपेगेंडा ने लोगों से जाति और कुनबे से ऊपर उठकर सोचने की अपील की। एक पोस्टर ने आह्वान किया, इस्लाम के नाम पर ‘संगठित हो जाओ, एक होओ।’ मुसलमानों से सिर्फ कौम के नाम पर वोट देने और काम करने को कहा गया।”

क्या है वर्तमान स्थिति

बिहार में “रामजादे बनाम हरामजादे”, “बीजेपी हारी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे”, उत्तर प्रदेश में “श्मशान और कब्रिस्तान”, जैसे नारे लग रहे हैं। यहां तक कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में सदियों से शोषित तबका, जिनका मुसलसल दोहन आज भी बदस्तूर जारी है, उनसे धर्म के आधार पर गोलबंद होकर जाति से उठकर एक हिंदुओं की पार्टी को वोट देने की अपील की जा रही है। यह अलग बात है यह जाति उत्थान कार्यक्रम की समय सीमा महज़ चुनावों के दरमियान महदूद रहती है।

फोटो प्रतीकात्मक है।

धार्मिक आधार पर गठित पार्टियों में अगर धर्म और उनके प्रतीकों को ढक दिया जाए तो एक पार्टी दूसरे की बिल्कुल मिरर इमेज दिखाई देगी। कभी इस्लाम खतरे में पड़ जाता है, तो कहीं 80 प्रतिशत वाले बहुसंख्यक हिंदुओं पर इस्लाम का खतरा मंडराता है। चुनावों के दौरान यह खतरा अपनी सीमा रेखा अकसर लांघ भी जाता है। जो फिर मज़हब के आधार पर लामबंद होकर चुनाव परिणामों में अपनी निर्णायक भूमिका निभाता है।

इस खतरे का निश्चित उपाय अधिकांश मुल्क में यही सुझाया जाता है कि धार्मिक बहुसंख्यकों पर संभावित खतरे की संभावना टालने की संजीवनी यही है कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के वर्चस्व को स्वीकारना होगा। इस कड़ी में उनका धर्म परिवर्तन सबसे उपयुक्त जान पड़ता है।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक के तौर पर मुल्क में रहने को तैयार रहना चाहिए, ऐसा मैं अपने पास से नहीं कह रहा हूं आरएसएस के द्वितीय सर संघचालक गुरु गोलवरकर ने स्वयं इस संदर्भ में अपने विचार को अपनी किताब “वी ऑवर नेशनहुड़ डिफाइन” में व्यक्त किया है।

जिन दो उपरोक्त दलों का मैं जिक्र कर रहा हूं, (तिहत्तर सालों के एक लंबे अंतराल के बाद उनमें व्याप्त समानता की पुल जो उन्हें एक दूसरे से परस्पर जोड़ती नज़र आती है) वे हैं धर्मान्धता, फिरकापरस्ती, धार्मिक असहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता के बनिस्पद धार्मिक राज्य की परिकल्पना और मूलतः वर्चस्ववादी गुट का राज्य पर निरंकुश नियंत्रण।

इस्लामिक राज्य, हिन्दू राज्य या यहूदियों के जियोनिस्ट आंदोलन, इनके दरमियान बाल भर भी फर्क मौजूद नहीं है। इनकी संरचना हिटलर के आखिरी उपाय के पागलपन जैसी ही है, जिनमें नस्लीय शुद्धता और स्वेत वर्चस्ववाद कायम करने के लिए एक नस्ल के विनाश को अवश्यम्भावी समझा जाता था।

जब लोग लोकतंत्र में किसी एक खास मज़हबी पार्टी के जीत को आधार बनाकर इसे जनता की सहमति कहते हैं, तब उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं होता कि धार्मिक, जातीय और राष्ट्रीय अस्मिता के आधार पर सहमति का निर्माण एक बुर्जवा जनवादी राज्य में करना कितना आसान होता है। यहां तमाम संचार-तंत्र महज़ चंद सरमाएदारों के गुलाम बन जाते हैं।

इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है कि देश की मौजूदा नाज़ुक आर्थिक हालात को ढांपने के लिए आपके प्रिय समाचार चैनल आपके समक्ष किन-किन धर्मिक शगूफे का सहारा ले रहे हैं, आप उसकी तस्दीक स्वयं कर सकते हैं। इसके बाद भी अगर आप अपार जनमत की जीत की बात करते हैं तो यह बेहूदा मज़ाक है।

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