“मैं तुम्हारा छोड़ा हुआ शहर पूर्णिया हूं”

सुनो, मैं पूर्णिया हूं,

आज मेरा अंतर्मन बोल रहा है।

सही सुना तुमने,

जी हां मैं पूर्णिया हूँ।

 

वही पूर्णिया जिसका दिल कहे जाने वाले भट्टा बाज़ार में,

पूजा की शॉपिंग करने आते थे,

आज उसकी जगह तुम्हारे मोबाइल ने ले ली।

हां मैं वही पूर्णिया हूं।

 

मैं वही पूर्णिया हूं,

जहां के  ग्राउंड और रणभूमि मैदान में

तुम खेलने आया करते थे।

आज उसकी जगह फेसबुक,व्हाट्सएप्प और पब्जी ने ले ली।

हाँ वही पूर्णिया हूँ।

 

मैं वही पूर्णिया हूं,

जहां की गलियों में तुम

साईकिल से घूमा करते थे,

आज ज़यादातर घर मे बंद और स्क्रीन्स से चिपके रहते हो।

शायद उस समय तुम्हे

साईकिल चलाना अच्छा लगता था,

लेकिन मुझे तो बस तुम्हारा

रोज़ आना अच्छा लगता था।

 

सुनो मैं पूर्णिया हूं,

हां मैं वही पूर्णिया हूँ।

जहां के वातावरण में

कभी तुम्हारी हंसी की खुशी फैली थी।

 

आज सब शांत है,

ना तुम्हारी हंसी रही,ना मेरी खुशी रही।

जी हां, मैं पूर्णिया हूं,

मैं वही पूर्णिया हूँ।

 

जहां कभी एक साथ

तुम सभी घुमा करते थे,

आज ना जाने क्या हुआ,

फेसबुक के चक्कर मे आपस मे लड़ा करते हो।

 

सोचते होंगे तुम सब कि हमारा शहर बदल गया है।

वैसे परिवर्तन तो संसार का नियम है

लेकिन ध्यान से देखो मेरे बच्चों,

मुझसे ज़्यादा तुम बदल गए।

 

सुनो मैं पूर्णिया हूं।

वही पूर्णिया जहां तुमने जन्म लिया,

जहां तुम्हारा सृजन हुआ।

आज मुझे क्यों भूल गए,

दूसरे क्षेत्रों को बड़ा समझने पर क्यों तूल गए।

 

जब तुमने जन्म लिया था,

तुम्हारी पहली सांस में मेरी हवाएं थी।

याद करो,

पिता का हाथ पकड़ कर

मेरी ही मिट्टी पर तुमने चलना सीखा था।

गिरे तो ज़रूर होंगे इस मिट्टी पर,

लेकिन गिरकर ही संभलना भी यहीं सीखा था।

क्या तुम्हें ये सब भी याद नहीं।

 

सुनो मैं पूर्णिया हूं,

मैं अभागी नहीं मेरे बच्चों,

मैंने तो तुम्हे सृजित किया है,

शायद तुम सब भ्रमित हो गए।

दुसरों के बारे में जानकारी रखते हो तुम,

क्या मेरे बारे में कुछ याद है

या सब भूल गए?

 

शायद मेरे बच्चों तुम

इंटरनेट की आभासी दुनिया में खोए हो,

तुमने इससे बाहर निकलकर

कभी मुझे जानने की कोशिश नहीं की।

तुमने कभी खुद को पहचानने की कोशिश नहीं की।

 

मुझे तुम गूगल पर ढूंढते हो,

कभी मुझे अपने आस पास ढूंढने की कोशिश करो,

सब कुछ बिल्कुल अलग पाओगे,

अपने गूगल पर भी यकीन ना कर पाओगे।

अपनी आंखों से देखी इस सुंदरता को,

मेरे बच्चों तुम चाह के भी ना झुठला पाओगे।

 

हां बच्चों, मैं पूर्णिया हूं।

हां मैं पूर्णिया हूँ।

सुनो मेरी अंतरात्मा की चीत्कार,

मेरे बच्चों सुनों मेरी पुकार।

 

अभी भी समय शेष है,

अभी अगर लौट के ना आओगे तो,

बाद में बहुत पछताओगे।

खोए रहे उस आभासी दुनिया में,

जो कभी किसी का हुआ ही नहीं।

 

सोचो यह बात

अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसे बतलाओगे,

बचपन में तुम्हें नानी-दादी कहानियां सुनाती थी,

वह सुनकर तुम खुश हो जाया करते थे,

तुम्हें बहुत अच्छा लगता था।

 

अभी भी ना संभले मेरे बच्चों तो,

अपने नाती-पोतों को कैसे कहानी सुना पाओगे,

मेरे बच्चों सुनो मेरे दिल की पुकार,

हां मैं पूर्णिया हूं।

 

अब भी नही संभले तो

एकदिन बहुत पछताओगे,

मेरी हवाओं का,

मेरी मिट्टी का कर्ज़ कैसे चुकाओगे?

कर्ज़ चुकाए बिना,

तुम भी अशांत से रह जाओगे।

 

मेरे बच्चों,

सुनो मेरे अंतरात्मा की चीत्कार,

सुनो मेरे मन की पुकार,

मैं पूर्णिया हूं,

हां मैं पूर्णिया हूं।

 

“यह कविता मैंने अपने शहर पूर्णिया के लिए लिखी है लेकिन पूरे बिहार की यही स्थिति है। इस कविता में मैंने बताया है कि हमारी जन्मभूमि पूर्णिया, हम युवाओं से क्या कहना चाहती है।”

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