जाति, वंशवाद और राष्ट्रवाद के बीच क्या विकास का मुद्दा हरियाणा के चुनाव से गायब था?

हरियाणवी भाषा में यूं तो ‘लाल’ बेटे को कहा जाता है लेकिन हरियाणा की राजनीति जिन तीन ‘लाल’ के इर्द-गिर्द घूमती रही वे देवीलाल, भजनलाल और बंशीलाल हैं।

लेकिन जबसे हरियाणा की राजनीति में चौथे लाल यानि मनोहर लाल ने कमान संभाली है, तब से यहां की राजनीति ने एक अजीब सी करवट ले ली है। हालांकि हरियाणा की राजनीति के प्रमुख नाम रहे पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल और भजनलाल तो अब दुनिया में नहीं रहें लेकिन उनके वारिस तीनों घरानों की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि उन्हें अपने वजूद को बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

फोटो प्रतीकात्मक है। फोटो सोर्स- Getty

आखिर क्यों हरियाणा राजनीति के तीनों लाल के वारिसों को करना पड़ रहा है संघर्ष

आखिर ऐसा क्या हुआ, जो आज हरियाणा की राजनीति के तीनों लाल के वारिस एक-एक सीट के लिए संघर्ष करते नज़र आ रहे हैं। भले ही लोग कहे कि यह भाजपा द्वारा परोसा गया राष्ट्रवाद है, जिसे मतदाता चख रहे हैं या फिर मनोहर लाल ने कोई ऐसा विकास का विशेष कार्य हरियाणा में करा दिया, जिसे लेकर मतदाता उत्सुक हैं। कोई कुछ भी कहे लेकिन हरियाणा की इस ताज़ा राजनीति के तहखाने में काफी कुछ छिपा है।

यह सत्य है कि ताऊ देवीलाल की राजनीतिक विरासत संभाल रहा चौटाला परिवार आज दो हिस्सों में बंट चुका है।

  • ओम प्रकाश चौटाला के बड़े बेटे अजय चौटाला ने इनेलो से अलग होकर जननायक जनता पार्टी बना ली है।
  • जबकि इनेलो की कमान ओम प्रकाश चौटाला और उनके छोटे बेटे अभय चौटाला के हाथों में है।
  • अजय चौटाला के जेल में होने पर उनकी विरासत दोनों बेटे दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला संभाल रहे हैं।

हरियाणा का निर्माता कहे जाने वाले चौधरी बंसीलाल, कॉंग्रेस के कद्दावर नेता रहे हैं लेकिन उनके बेटे सुरेन्द्र चौधरी की दुर्घटना में मौत के बाद इस परिवार का राजनीतिक भविष्य भी दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। हालांकि अपने पति और ससुर की विरासत को संभालने के लिए किरण चौधरी ने राजनीति में कदम रखा। वह तीन बार विधायक भी चुनी गईं लेकिन वह बंसीलाल नहीं बन पाईं।

इसके बाद आते हैं भजनलाल पर। तीन बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहें, भजनलाल किसानों के कद्दावर नेता माने जाते थे। हरियाणा की सियासत में पहले गैर जाट नेता थे, जिनकी तूती बोलती थी। वह अपने राजनीतिक जीवन में कभी चुनाव नहीं हारे। वह 9 बार विधायक चुने गएं। हालांकि 2007 में उन्होंने कॉंग्रेस से नाता तोड़कर हरियाणा जनहित कॉंग्रेस नाम से अलग पार्टी बनाई।

हरियाणा में चौधर की लड़ाई

हरियाणा में सत्ता को चौधर कहा जाता है, यानी कुर्सी की लड़ाई। शुरू से देखा जाए तो यह चौधर चंद राजनीतिक परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ये राजनीतिक घराने अपने-अपने समय में पूरा दबदबा रखते थे लेकिन अब महज़ दो परिवारों को छोड़कर लगभग सभी चौधर के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसमें चाहे भजनलाल, देवीलाल, बंसीलाल या हुड्डा परिवार हो।

यह परिस्थिति क्यों बनी इसके लिए ज़्यादा पुराने इतिहास में जाने की ज़रूरत नहीं है, बस इसे बीते तीन चार सालों से समझा जा सकता है। साल 2016 जाट आंदोलन से ही शुरू करें, तो यह आंदोलन भाजपा के लिए मलाई साबित हुआ। चूंकि आन्दोलन में 30 हज़ार से अधिक करोड़ की संपत्ति स्वाहा होने की बात आई थी लेकिन हरियाणा में लोग यह भी कहते दिख जाते हैं कि यह 30 हज़ार करोड़ भाजपा के लिए एक प्रकार का राजनीतिक निवेश साबित हुआ। अपने बयानों से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने नफरत की जो राजनीति जाट और नॉन-जाट के बीच शुरू की थी, उसी का नतीजा था यह आंदोलनआन्दोलन।

आंदोलन की कमान संभालने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से यशपाल मालिक पहुंचते हैं, वह यशपाल मालिक जो 2014 तक भाजपा के समर्थन में कूदे रहे, फिर अचानक हरियाणा में गए। जाट आरक्षण संघर्ष समिति के बैनर तले आरक्षण की आग सुलगा दी। यशपाल का मोदी से अचानक मोहभंग क्यों हुआ यह सवाल भी हरियाणा की राजनीति में खड़ा दिखाई देता है? हालांकि मलिक पर जाट समाज द्वारा दिए गए चन्दे के दुरूपयोग के भी आरोप लगे, जो लोगों ने आंदोलन के दौरान जेल में युवाओं की पैरवी के लिए दिया था।

आंदोलन में भड़काऊ भाषण देने और संघर्ष की और जाटों को धकेलने वाले यशपाल मालिक और राजकुमार सैनी पर मुकदमा दर्ज होने की बजाय गरीब परिवारों को जेल में ठूस दिया गया। जो कुछ भी हुआ इससे सत्ताधारी दल को लाभ मिला, क्योंकि हरियाणा का आपसी भाईचारा जातिवाद में बिखर गया।

खैर, हरियाणा अभी शांत ही हुआ था कि राम रहीम का मामला राजनीति और मीडिया में छा गया। डेरा सच्चा सौदा सिरसा के मठाधीश राम रहीम ने साल 2009 के चुनावों में कॉंग्रेस पार्टी को अपना समर्थन दिया था, जिसके बाद प्रदेश में कॉंग्रेस की सरकार बनी थी। इसके बाद उसने 2014 में बीजेपी समर्थन किया था और सूबे की सत्ता में बीजेपी काबिज़ हुई थी।

लेकिन इसके बाद जब राम रहीम की राजनीति में आने और अपनी पार्टी बनाने की बात चली, तो अचानक उस पर भी गाज गिर जाती है और एक बार फिर एक खुनी संघर्ष हरियाणा की सड़कों पर देखा गया था।

यह भी जैसे-तैसे शांत हुआ, अचानक से फिर कथित संत रामपाल का मामला हरियाणा की राजनीति में गूंज उठा। रामपाल खुद को कबीर पंथी कहता है और पिछड़ी दलित जाति के लोग उससे जुड़े हैं, आर्य समाज के साथ उसका 36 का आंकड़ा चल रहा था। हरियाणा की राजनीति में रामपाल के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है लेकिन वह आज जेल में हैं। उनके जेल जाने से आर्य समाज के कार्यकर्ता खुश थे, इस खुशी में चार चाँद लगाने के लिए कुरुक्षेत्र के गुरुकुल में प्रधानाचार्य आचार्य देवव्रत को पहले हिमाचल फिर गुजरात का राज्यपाल सौंप दिया जाता है।

अब हरियाणा में “पैंतीस बनाम एक” नारा गूंज रहा है। शिक्षा, स्वास्थ, सड़क व अन्य मूलभूत मुद्दों को दफन कर इस नारे को मज़बूत किया जा रहा है, यानि पैंतीस बड़ी अन्य जातियों से कहा जा रहा है कि जाटों के खिलाफ वोट करो।

किस पार्टी को करो, यह सब भलीभांति जानते हैं, क्योंकि जेजेपी की रैली में 50 हज़ार से अधिक संख्या में भीड़ जुटने के बावजूद भी मीडिया को मोदी दिखाई दे रहा है। मेन स्ट्रीम मीडिया भी सिर्फ गुरुग्राम और फरीदाबाद को ही हरियाणा समझती है। शायद तभी लोग कह रहे हैं कि हिल्ला देख यहां मोदी और राष्ट्रवाद की नहीं, हरियाणा के विकास की बात करो। नेताओं ने पिछले पांच साल में सत्ता के लिए जिस भाईचारे में आग लगाई उसकी बात करो।

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