रैंप ना होने के कारण घंटों तक वोट नहीं दे सके दो पैरा-एथलीट

महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों पर आज मतदान जारी है। इस बार सभी विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में मतदान कराए जा रहे हैं। इस बीच घाटकोपर ईस्ट विधानसभा की बूथ संख्या 170 (बीएसटी स्टाफ कॉलोनी) पर वोट डालने आए शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा।

खबर आ रही है कि वहां शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के लिए व्हील चेयर और रैंप की व्यवस्था नहीं है। गौरतलब है कि घाटकोपर ईस्ट से भाजपा के प्रत्याशी हैं पराग साह, तो वहीं काँग्रेस से मनीषा सुर्यवंशी चुनावी मैदान में हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि घाटकोपर ईस्ट विधानसभा की बूथ संख्या 170 (बीएसटी स्टाफ कॉलोनी) पर वोट डालने आए दो पूर्व पैरा एथलीट राजाराम घाग और सत्य प्रकाश तिवारी करीब दोपहर तीन बजे तक व्हील चेयर और रैंप की व्यवस्था नहीं होने के कारण मतदान नहीं डाल पाए थे। राजाराम और सत्य प्रकाश द्वारा लगातार आवाज़ उठाए जाने के बाद वहां तैनात अधिकारियों ने किसी तरह लकड़ियों को आपस में जोड़कर व्हील चेयर चढ़ाने के लिए रैंप बना दिया।

गौरतलब है कि एशियन पैरा गेम्स 2010 में सत्यप्रकाश तिवारी के नाम ब्रॉन्ज मेडल दर्ज है। उन्होंने पैरा बैडमिंटन में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। वहीं, राजाराम घाग 2006 के पेसिफिक गेम्स में मेडलिस्ट रहे हैं। मौजूदा वक्त में वह पैरा एथलीट को तैयार करते हैं। इसके अलावा वह भारतीय रेलवे में बतौर सुप्रीटेंडेंट कार्यरत हैं।

इससे पहले नायब तहसीलदार ने कहा कि वोट डालने आए शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों की जो भी परेशानियां हैं, उन्हें जल्द से जल्द अभी दूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस दिशा में हम काम कर रहे हैं। जबकि सत्यप्रकाश तिवारी के साथी राजाराम घाग का कहना है कि सुबह से लगातार इन लोगों को अपनी समस्याओं से अवगत कराया गया मगर उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंंने कहा कि इस पोलिंग बूथ पर हम लोगों के लिए कोई सुविधा नहीं है, जिस कारण और भी शारीरिक तौर पर अक्षम लोग वोट देने के लिए नहीं आते हैं।

राजाराम घाघ और सत्य प्रकाश
राजाराम घाघ और सत्य प्रकाश।

इस विषय पर सत्यप्रकाश तिवारी कहते हैं, “पिछले काफी वर्षों से घाटकोपर ईस्ट के बीएसटी स्टाफ कॉलोनी वाले पोलिंग बूथ का यही हाल है। हर बार चुनाव के दिन हमें आवाज़ उठानी पड़ती है मगर शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के लिए ना तो व्हील चेयर की व्यवस्था होती है और ना ही बेहतर रैंप की व्यवस्था। आज से बीस साल पहले दो लोग मिलकर हमें पकड़ते थे और हम वोट डालकर आते थे। जैसे-जैसे समय बदला, वैसे-वैसे बेहतर सुविधाएं देने की बात की गई मगर क्या फायदा उन सुविधाओं का जिसका लाभ ही हमलोग ना ले पाएं? फिर कहा जाता है कि वोटिंग प्रतिशत क्यों कम हो रहा है।”

सत्यप्रकाश सन् 1985 से लगातार वोट डालते हैं और उनका कहना है कि स्थितियां अब भी वैसी ही हैं। सत्यप्रकाश ने लगातार अपनी आवाज़ बुलंद की है मगर चीज़ें सिर्फ खानापूर्ति तक ही सीमित रह गई हैं।

सत्यप्रकाश कहते हैं, “जो रैंप बनाया गया है, वह व्यर्थ है। आज बीस साल बाद भी हमारे व्हील चेयर उस पर से जा ही नहीं सकते हैं। हमने देखा है कि यहां शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के लिए कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। होना यह चाहिए था कि जब इन्होंने व्हील चेयर चढ़ाने के लिए रैंप बनाया था, तब कुछ शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को व्हील चेयर पर बैठाकर देखना चाहिए था कि वे आसानी से जा पा रहे हैं या नहीं? अब मतदान के रोज़ इस पर मंथन हो रहा है, जो वाकई शर्मनाक है।”

राजाराम ने महिलाओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि हम पुरुष तो घर से निकलकर मतदान करने आ भी जाते हैं मगर महिलाओं को पता होता है कि कोई सुविधाएं नहीं होंगी और वहां लोगों से मदद लेनी होगी।

खुले समुद्र में तैरने का विश्व रिकॉर्ड बनाने वाले भारतीय पैरा एथलीट शम्स आलम ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि जब मैं मुंबई में रहता था तब मुझे भी एक्सेसिबिटीली को लेकर दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। कई मीडिया वालों ने इस मुद्दे को उठाया था मगर आज भी स्थिति वैसी ही है। हमारे जैसे कई लोग हैं जो मीडिया तक नहीं पहुंच पाते या खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते हैं, सोचिए उनके साथ क्या होता होगा।

इस दौरान बीएसटी स्टाफ कॉलोनी में वोट डालने आए एक सीनियर सिटीज़न मुकेश चौबे से हमारी बात हुई। मुकेश इंडियन नेवी में कार्यरत हैं, जो पिछले 20 सालों से शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को वोट के दौरान आने वाली परेशानियों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम आवाज़ तो उठाते हैं मगर हमारी कोई नहीं सुनता है।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि वोट प्रतिशत बढ़ाने के तमाम दावों के बीच शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों की ये परेशानियां सरकारी दावों की पोल खोलती हैं।

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