सरकारी प्रतिनिधियों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने से गुरेज़ क्यों?

वर्तमान में देखा जाए तो आज प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चे की बेहतर से बेहतर शिक्षा हासिल करने की दौड़ में जूझ रहा है। हिमाचल प्रदेश की बात की जाए तो अन्य राज्यों की तुलना में यहां पर भी सरकारी विद्यालय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सोचने वाली बात है कि ऐसे हालात ही क्यों पैदा हुए, जिससे आज अधिकतर अभिभावक सरकारी विद्यालयों की तरफ अपना रूख ही नहीं करना चाहते। ऐसे में आखिर जवाबदेही किसकी बनती है?

सरकारी विद्यालयों से निजी विद्यालयों की तरफ पलायन

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि हिमाचल में पिछले चार सालों में सरकारी विद्यालयों से लगभग 1,16,124 विद्यार्थी कम हो चुके हैं।

सरकारी विद्यालयों में आठवीं कक्षा तक फेल ना करने की नीति, शिक्षकों की कमी, बच्चों की शैक्षिक व गैर शैक्षिक गतिविधियों में भागीदारी तय नहीं होना, शिक्षकों के तबादले जैसे कई मसले हैं जिनसे अभिभावक खफा हैं। इसी का नतीजा है कि सरकारी विद्यालयों से निजी विद्यालयों की तरफ पलायन बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है।

बच्चों के शैक्षणिक स्तर की बात की जाए तो उसमें भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। एनसीईआरटी के ताज़ा सर्वेक्षण के अनुसार हिंदी, गणित व पर्यावरण विज्ञान विषयों में राज्य के नौनिहाल पिछड़े हैं। हिमाचल प्रदेश तीसरी कक्षा में देशभर में 17वें स्थान पर है जबकि पांचवीं कक्षा में प्रदेश का 15वां तथा आठवीं कक्षा में 16वां स्थान है।

इस सबसे समझ में आता है कि समस्या केवल छात्रों की संख्या कम होने की नहीं है अपितु जो छात्र इन विद्यालयों में नामांकित भी हैं, उनके शिक्षण स्तर में भी काफी कमी है।

सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का नतीजा

एक समय था जब सरकारी विद्यालयों की शिक्षा को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था लेकिन वर्तमान में इनके प्रति लोगों का नज़रिया ही बिलकुल विपरीत होता जा रहा है।

अब तो लोग यह तक कह देने में भी गुरेज नहीं कर रहे कि ऐसी क्या माली हालत हो गयी है, जिसकी वजह से आपको अपने बच्चे का दाखिला सरकारी विद्यालय में करना पड़ रहा है।

राज्य सरकार अब पहली कक्षा से 12वीं कक्षा तक के छात्रों को स्मार्ट यूनिफॉर्म देने की तैयारी में है। पहल तो अच्छी है लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल स्मार्ट वर्दी देने से इन विद्यालयों की मौजूदा स्थिति भी स्मार्ट हो पाएगी?

राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2018-19 में शिक्षा विभाग के लिए  7,044 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया है जो पिछली बार से 840 करोड़ रुपये अधिक है लेकिन बस संशय इस बात का है कि क्या शिक्षा बजट में निरंतर बढ़ोत्तरी के बावजूद अभिभावकों की मानसिकता में भी इन विद्यालयों के प्रति कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा?

 अभियान “हमारा पैसा हमारा स्कूल”

“हमारा पैसा हमारा स्कूल” अभियान के तहत हमने ज़मीनी स्तर पर विद्यालयों, स्कूल प्रबंधन समितियों एवं अभिभावकों के साथ चर्चाएं आयोजित की थी। जिसका मकसद यह था कि अभिभावक एवं अन्य लोग भी यह जान पाएं कि प्रति वर्ष सरकार द्वारा इन विद्यालयों पर कितना अधिक खर्चा किया जाता है।

इस अभियान के दौरान हमने पाया कि अभिभावक अन्य चीज़ों के अलावा इस बात से भी बेहद नाराज़ हैं कि जब शिक्षक एवं अन्य अधिकारी ही अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में नहीं भेजते, तो इसका अर्थ यही है कि उन्हें सरकार एवं स्वयं की कार्यप्रणाली पर ही विश्वास नहीं है।

एक सच यह भी है कि वर्तमान में सरकारी विद्यालयों में अब अधिकतर उन्हीं परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं, जो निजी विद्यालयों का खर्च उठाने में असमर्थ हैं या जहां निजी विद्यालय ही उपलब्ध नहीं हैं।

अजीब विडंबना है कि एक तरफ हर कोई चाहता है कि उसे सरकारी नौकरी हासिल हो लेकिन जहां बात अपने बच्चों की शिक्षा की हो तो वहां केवल निजी विद्यालयों को ही तरजीह दी जा रही है।

लोग बहुमत देकर अपने प्रतिनिधियों का चयन इस विश्वास के साथ करते हैं ताकि वे उनकी समस्याओं का समाधान कर पाएं। इसलिए अब समय आ गया है कि हमारे प्रतिनिधियों को स्वयं आगे आकर अपने बच्चों को भी इन विद्यालयों में नामांकित करके एक आदर्श रूप प्रस्तुत करना चाहिए।

यानी इसके लिए अब इन्हें स्वयं आगे आकर सरकारी विद्यालयों को इनकी वास्तविक पहचान दिलाने का बीड़ा उठाना चाहिए और अपने अधिकारियों एवं जनता से भी इसमें सहयोग करने का आह्वाहन करना चाहिए। जहां पर इन्होने स्वयं आगे आकर पहल की है वहां पर सकारात्मक बदलाव देखने को भी मिले हैं।

आप कल्पना कर सकते हो कि जिस दिन किसी सरकारी विद्यालय में मंत्री, विधायक या किसी कलेक्टर का बच्चा और मजदूर का बच्चा एक साथ पढ़ेंगे, उस विद्यालय की कायाकल्प होना निश्चित है।

शायद इसके लिए वर्ष 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जैसे आदेशों की भी आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, जिसके अनुसार सरकार से जुड़े सभी प्रतिनिधियों, अधिकारियों एवं न्यायपालिका के जजों को अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में नामांकित करना अनिवार्य कर दिया गया।

जल्द से जल्द उठाने होंगे कदम

जिस तरह के मौजूदा हालात हैं, उसके अनुसार तो यही लगता है कि यदि समय रहते यथासंभव कदम नहीं उठाये गए तो हालात ऐसे हो जायेंगे कि इन विद्यालयों में भौतिक सुविधायें तो हो जाएंगी, अगर नहीं होंगे तो बस पढ़ने वाले बच्चे।

पूरे प्रदेश में पंचायत स्तर पर ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाता है, जहां पर सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जनता की मौजूदगी में चर्चाएं होती हैं। अतः पहल के तौर पर सरकार को एक ऐसा सिस्टम तैयार करना चाहिए, जहां इन सभाओं में बच्चों की शिक्षा के बारे में भी चर्चा की जानी चाहिए।

यह एक ऐसा भागीदारी मंच बने जहां शिक्षक एवं उनके उच्च अधिकारियों के अलावा पंचायत प्रतिनिधि तथा अभिभावक बच्चों के शैक्षणिक स्तर के साथ-साथ विद्यालय के अन्य मुद्दों पर भी गंभीरतापूर्वक बात करें। सिस्टम ऐसा हो कि जो भी समस्याएं इन चर्चाओं से निकलकर सामने आएं, उन पर त्वरित कार्रवाई हो।

इससे जवाबदेही और भागीदारी का एक ऐसा बेहतर माहौल बन पायेगा, जहां हर कोई एक दुसरे के साथ मिलकर इन विद्यालयों को इनके असल मुकाम तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभा सकेगा।______________________________________________________________________________
यह ब्लॉग पहले यहां प्रकाशित हुआ था।

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