“क्या असंवैधानिक तरीके से बनी है महाराष्ट्र में BJP की सरकार?”

लोकतंत्र में लोग कहां हैं? यह सवाल आज जब मैं 26 नवंबर यानी कि संविधान दिवस पर आप सबसे पूछ रहा हूं, तो इसके बहुत सारे कारण हैं। उनमें से सबसे अहम है हमारे यहां होने वाले चुनाव, उस चुनाव से जुड़े राजनीतिक दल और नेता।

चुनाव लोकतंत्र में सबसे अहम है और चुनाव से ही लोगों के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। जो चुने हुए विधायक या सांसद हैं, उन्हें भारत के संविधान के तहत लोगों के हित में काम करना चाहिए। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों और संस्थाओं की यह ज़िम्मेदारी है कि उन पदों की गरिमा बनी रहे और संविधान से देश चले।

अब यहां हम डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान के बारे जो कहा था, उसे समझते हैं। उन्होंने कहा था,

मैं महसूस करता हूं कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों ना हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा। दूसरी ओर, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों ना हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, अच्छे हों तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा।

हमारा संविधान इतना अच्छा है कि आज़ादी के बाद बहुत सारे हमलों और उतार-चढ़ाव के बावजूद ना सिर्फ हमारे लोकतंत्र को कायम रखा, बल्कि देश में भी एकजुटता की मिसाल पेश की। इसी संविधान के कारण आज हम प्रगति कर पाए हैं और आगे भी करते रहेंगे।

अब सबसे पहले इंदिरा के उस युग की बात करते हैं जब संवैधानिक पद पर बैठे लोगों ने संविधान के तहत ही देश में आपातकाल लगाया था। तब के महामहिम राष्ट्रपति जी ने अपनी पूरी ज़िम्मेदारी ना निभाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से ना तो सवाल पूछा और ना ही जवाब मांगा। उन्होंने सीधे आपातकाल को मंज़ूरी दे दी।

अंबेडकर
फोटो साभार- Getty Images

यह हमारे संविधान और लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था मगर हमारा संविधान इतना अच्छा था कि हम इससे भी उभरकर बाहर आए। इसमें आपातकाल के खिलाफ लोगों ने जो भूमिका निभाई थी, वह बेहद ही महत्वपूर्ण है। जब राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद को रबर स्टाम्प कहा जाता है, तो बहुत दुःख होता है मगर हमें इस पर सोचने की ज़रूरत है।

संविधान को अमल में लाने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति की है और जहां पर भी उन्हें यह लगे कि संविधान के तहत काम नहीं हो रहा है, वहां पर उन्हें खेद जताना चाहिए और सवाल पूछने चाहिए।

हमारे देश में राज्यपाल का संवैधानिक पद भी बेहद महत्वपूर्ण है मगर बहुत सारे राज्यपालों के निर्णय सवालों के घेरे में आए हैं। इसमें सुप्रीम कोर्ट को भी दखल देनी पड़ी है। अभी महाराष्ट्र में जो राज्यपाल ने निर्णय लिया है, वह भी सवालों के घेरे में है।

जिन भी राज्यपालों के ऊपर सवाल उठाए गए हैं, उन्होंने संविधान के दायरे में रहकर किसी राजनीतिक दल के हित में फैसले लिए हैं। (जबकि उन्हें लोगों के हित में फैसले लेने चाहिए।) ऐसे पद पर रहने वाले लोगों को सुप्रीम कोर्ट में भी चैलेंज नहीं किया जाता है और इसी का फायदा उठाते हुए ये लोग नियमों में रहकर असंवैधानिक काम करते हैं। भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस पद पर अपने लोगों को रखकर पद का दुरुपयोग किया है।

चुनाव और निर्वाचन आयोग

चुनावी रैली के दौरान लोग
चुनावी रैली के दौरान लोग। फोटो साभार- सोशल मीडिया

सबसे पहले तो यह समझना ज़रूरी है कि चुनाव लड़ने के लिए जितने पैसे की ज़रूरत होती है, क्या आम आदमी उतने पैसे खर्च कर सकता है? चुनाव लड़ने के लिए जो एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया है, उसमे सबसे पहली चीज़ यह है कि आपके पास पर्याप्त पैसा चाहिए।

यदि आपके पास पैसा है तो आप प्रभावी ढंग से चुनाव प्रचार करने में सफल होंगे। यदि आपके पास पैसा नहीं है तो लोगों को अपने साथ जोड़ नहीं पाएंगे।

आपके पास पैसे के साथ-साथ किसी भी तरह की शक्ति होनी चाहिए। राजनेताओं के बेटे या बेटियों के लिए तो चुनाव लड़ना बहुत आसान है। इन परिस्थितियों के बीच जिन आम लोगों ने चुनाव लड़कर जीत हासिल की है, मैं उन्हें सलाम करता हूं क्योंकि वे तारीफ के पात्र हैं।

चुनावों में चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार जितना पैसा खर्च होना चाहिए उससे बहुत अधिक पैसा खर्च होता है। इस बात को चुनाव आयोग के अलावा हमारे देश का बच्चा-बच्चा जानता है। आज ज़रूरत है चुनाव आयोग को कड़े कदम लेने की मगर इस दिशा में कुछ ठोस कदम नहीं लिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर आप देखिए टीएन शेषन के देहांत के बाद लोगों ने कैसी प्रतिक्रियाएं दीं। उनके काम की हर तरफ सराहना हुई।

लोकतंत्र में लोग कहां है?

राजनीतिक दल कैंडिडेट चुनकर उन्हें अपने दल का टिकट देते हैं। लोगों की अहमियत सिर्फ चुनाव तक ही होती है, उसके बाद राजनीतिक दलों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसके बाद राजनीतिक दल जो भी फैसले लेते हैं, वे लोगों के लिए नहीं बल्कि उनके खुद के लिए होते हैं।

देवेन्द्र फडणवीस
देवेन्द्र फडणवीस। मुख्यमंत्री महाराष्ट्र, फोटो साभार- फेसबुक

आज महाराष्ट्र की राजनीति में नैतिकता किसी भी दल में नहीं दिख रही है, जो भी हो रहा है वह सत्ता के लिए हो रहा है। सत्ता के लिए ये राजनीतिक दल और उसके नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता अगर इन्हें आरोपी व्यक्ति के साथ भी गठबंधन करने की ज़रूरत हो।

ये वे लोग हैं जो झूठ को राजनीति का नाम देते हैं। हम लोग इसे देखकर भी कुछ कह नहीं पाते हैं, इसका मतलब यह है कि लोकतंत्र की ताकद हम नहीं समझते हैं। जिस लोकतंत्र में लोग सवाल नहीं पूछते, वहां लोगों की अहमियत बस एक वोट देने तक ही होती है।

महाराष्ट्र में रातो रात संवैधानिक तरीके से राष्ट्रपति शासन हटाया गया और महाराष्ट्र के राज्यपाल ने सुबह-सुबह मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को शपथ दिलाई। दूरदर्शन को भी पता नहीं था, लोगों को भी पता नहीं चला कि उनके मुख्यमंत्री ने शपथ ले ली है। यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि यह पूरी प्रक्रिया असंवैधानिक है।

अब तो महाराष्ट्र में विधायकों के तोड़-फोड़ की बात खुलेआम की जा रही है, जिनकी मदद से सरकार बनाई गई उन विधायकों को पता ही नहीं चला कि उनके सपोर्ट से सरकार बनी है। अब इसमें क्या सही और क्या गलत! असंवैधानिक चीज़ों को भी संवैधानिक तरीके से किया गया। इसमें सत्ता के लिए लड़ने वाले लोग दिखेंगे, ब्रेकिंग न्यूज़ दिखाने वाले न्यूज़ चैनल्स दिखेंगे मगर सवाल बना रहेगा कि लोकतंत्र में लोग कहां हैं?

तो जो डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा हो मगर जिन्हें इसे अमल में लाने का काम सौंपा गया है, यदि वे खराब निकले तो संविधान खराब सिद्ध होगा मगर मैं कहना चाहता हूं कि हमारा अच्छा संविधान कभी खराब नहीं होगा। वह इतना काबिल है कि हमें हर हालात और चुनौतियों से लड़ना सिखाता है, राह दिखाता है और हमारे देश की सुरक्षा करता है। हमें केवल ज़रूरत है संविधान को समझने की।

आज संविधान दिवस पर हमें संविधान की उद्देशिका को पढ़ना चाहिए और इसके ऊपर अमल करने की कोशिश करनी चाहिए। मैं यह कहना चाहता हूं कि बहुत सारी चुनौतियों के बावजूद आज हम यहां तक पहुंचने में सफल हुए हैं और यह हमारा संविधान हमारे देश को और आगे ले जाएगा बस उस पर सही तरीके से अमल करने की ज़रूरत है।

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