विधानसभा चुनाव के इतने वक्त बाद भी क्यों उलझी है महाराष्ट्र में सियासत की गुत्थी?

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लग गया है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश की थी, जिसकी राष्ट्रपति ने मंज़ूरी दे दी है।

विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद भी सरकार बनाने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। भाजपा और शिवसेना गठबंधन को बहुमत मिलने के बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद की स्थिति बनी हुई है और 24 अक्टूबर से लेकर आज तक महाराष्ट्र में कोई भी सरकार नहीं बन पाई है।

जो शिवसेना चुनावों में राष्ट्रवादी काँग्रेस (एनसीपी) और इंडियन नैशनल काँग्रेस के खिलाफ लड़ी, अब उनके साथ मिलकर सरकार बनाने की कोशिश कर रही है।

गौरतलब है कि राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए और समय देने से इनकार कर दिया है। शिवसेना के 24 घंटे पूरे होने के बाद राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रण भेजा था, जिसमें पार्टी  विफल रही।

इसे एक रिऐलिटी शो कहते हुए मुझे बेहद दुख हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ महाराष्ट्र के किसान बहुत सारी समस्याओं से जूझ रहे हैं और दूसरी ओर वहां के राजनीतिक दल केवल राजनीति कर रहे हैं।

लोकतंत्र में लोगों की अहमियत बस वोट देने तक ही है

उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस। फोटो साभार- ANI Twitter
उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस। फोटो साभार- ANI Twitter

चुनाव से पहले 15-20 दिनों तक लोगों की समस्याओं की बात होती है। राजनेता लोगों के आगे झुककर उन्हें सलाम करते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि चुनाव के बाद आने वाले पांच साल यही जनता उनको सलाम करती रहेगी।

इन्हें कुछ दिनों तक लोगों की अहमियत रहती है और एक बार चुनाव खत्म होने और नतीजे आने के बाद इन्हें आम लोगों से कोई मतलब नहीं रहता है। राजनीतिक दल सत्ता, पद और प्रतिष्ठा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह चीज़ अब महाराष्ट्र की जनता महसूस कर रही होगी।

महाराष्ट्र में बिन मौसम बारिश के कारण किसानों का बहुत नुकसान हुआ है और आज उन्हें सरकार से मदद चाहिए मगर महाराष्ट्र में चुनावों के इतने दिन बाद भी सरकार नहीं बन पा रही है।

राज्य सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक महाराष्ट्र में पिछले चार सालों में 12021 किसानों ने आत्महत्या की है। आज सत्ता और पदों के लिए एक-दूसरे से राजनेताओं को लड़ते देख ऐसा नहीं लगता कि किसानों की आत्महत्या से इन्हें कोई फर्क पड़ता है।

“क्यों मैं इसे ‘रिऐलिटी शो’ कह रहा हूं”

देवेन्द्र फडनवीस और अमित शाह
देवेन्द्र फडणवीस और अमित शाह। फोटो साभार- ANI Twitter

चुनावी नतीजों के बाद जिस तरह का ड्रामा और सस्पेंस महाराष्ट्र में चल रहा है, वह किसी भी टीवी के रिऐलिटी शो से कम नहीं है। यह सब न्यूज़ चैनलों पर आता है जिससे टीआरपी में काफी उछाल देखने को मिलता है।

तमाम एक्टर्स और राजनेता इस रिऐलिटी शो में काम करने वाले पात्र हैं। इसके निर्देशक एनसीपी के शरद पवार हैं और प्रोड्यूसर हैं शिवसेना और बीजेपी। इस रिऐलिटी शो में राष्ट्रपति शासन तो लग गया मगर महाराष्ट्र की जनता और लोकतंत्र की हार के तौर पर इस चुनाव को देखा जाएगा।

इससे पहले आपने ऐसा शो कर्नाटक और बिहार में देखा होगा। गौरतलब है कि बिहार में पहले गठबंधन आरजेडी और जेडीयू का था मगर आज सरकार बीजेपी और जेडीयू की है। गोवा और अन्य राज्यों में भी ऐसी चीज़ें देखने को मिली हैं।

“क्यों मै एनसीपी चीफ शरद पवार को इस रिऐलिटी शो का निर्देशक कह रहा हूं”

जब चुनाव के नतीजे आए तभी शरद पवार को यह एहसास हुआ कि इस स्थिति में शिवसेना मुख्यमंत्री पद के लिए अड़ी रहेगी। ऐसे में शरद पवार ने ऐसा माहौल तैयार किया जिससे शिवसेना को लगने लगा कि उनके सामने बीजेपी के आलावा और भी पर्याय हैं।

शरद पवार
एनसीपी चीफ शरद पवार। फोटो साभार- Getty Images

शिवसेना के नेता संजय राउत शरद पवार से मिलते रहे मगर शरद पवार ने शिवसेना को हां भी नहीं कहा और ना भी नहीं कहा। शरद पवार ने यह जान लिया था कि यहां मौका बन रहा है और उन्होंने इसका पूरा फायदा उठाया।

शिवसेना को राज्यपाल ने जो समय दिया था, उस तय समय में शिवसेना बहुमत साबित ना करे इसका पूरा ख्याल रखा गया। शरद पवार यह जानते थे कि पहले राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए बुलाया मगर उनके इंकार के बाद शिवसेना को बुलाया और शिवसेना को पर्याप्त समय में बहुमत साबित ना करने के कारण अब तीसरी बड़ी पार्टी एनसीपी को बुलाया जाएगा।

इसी कारण काँग्रेस को आगे करके उन्होंने ऐसी स्थिति तैयार की जिसमें अब पूरी तरह से सत्ता का मुख्य केंद्र बन गए हैं शरद पवार।

ऐसे में एनसीपी ने बीजेपी को भी हराया, शिवसेना को अब भी समझ में नहीं आया कि उन्हें जीत मिली या हार और काँग्रेस तो शरद पवार के लिए प्यादा ही हैं, जिसे जब चाहे इस्तेमाल करो।

सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों की कोई विचारधारा होती है या सत्ता के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं? आज महाराष्ट्र में बीजेपी ने सरकार बनाने से इंकार किया और बताया कि चुनाव से पहले जिसके साथ गठबंधन हुआ था, उस शिवसेना ने लोगों के जनादेश का अपमान किया है।

ऐसा बीजेपी ने कहा ज़रूर मगर यही बात बिहार में उनकी समझ में क्यों नहीं आई? जिस आरजेडी-जेडीयू गठबंधन को वहां जनादेश मिला था, जिसके खिलाफ चुनाव हारने के बाद भी बीजेपी ने जेडीयू के साथ सरकार बनाई। उस वक्त जनादेश का अपमान नहीं हुआ क्या? कर्नाटक और गोवा में  बीजेपी ने किस तरह से सरकार बनाई वह सभी को पता है।

देवेन्द्र फडणवीस
देवेन्द्र फडणवीस। फोटो साभार- देवेन्द्र फडणवीस फेसबुक पेज

शिवसेना भले ही काँग्रेस और एनसीपी के खिलाफ चुनाव लड़ी मगर आज मुख्यमंत्री पद के लिए उनके साथ जाने की कोशिश कर रही है। शिवसेना जिस तरीके से कह रही है कि बीजेपी ने हमारे साथ धोखा किया और झूठ बोला, यह गलत है। एनसीपी और काँग्रेस की विचारधारा एक-दूसरे के खिलाफ होने के बावजूद भी दोनों साथ आने के लिए तैयार हैं।

यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इसमें से किसी ने भी लोगों से जुड़े मुद्दों (आरोग्य, शिक्षा, सड़क, किसान, महिला सुरक्षा और बेरोज़गारी) को लेकर सरकार बनाने की बात नहीं की है। जो भी चर्चा हो रही है, वह सत्ता और पदों के लिए है।

मैं यह मानता हूं कि लोगों ने जिन मुद्दों के आधार पर इन दलों को वोट दिया है, वे उन चीज़ों का ध्यान रखें। विचारधारा और वैल्यूज़ को किनारा करते हुए दल बदलने वाले नेता सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। राजनीतिक दल, इनको सही सवाल ना पूछने वाला मीडिया और चुपचाप सहने वाली जनता आज के लोकतंत्र की हालत के लिए ज़िम्मेदार हैं।

जिस लोकतंत्र में लोग सवाल नहीं पूछते वह खोखली हो जाती है। जब लोकतंत्र एक रिऐलिटी शो बनकर लोगों का मनोरंजन करने लगे तब यह समझना ज़रूरी है कि लोग आने वाले भविष्य को अंधेरे में धकेल रहे हैं।

अगर लोगों को लगता है कि ऐसा ना हो तो सड़कों पर उतरकर उन्हें इन राजनीतिक दलों से सवाल पूछने चाहिए। इनको सबक सिखाने की ज़रूरत है कि लोकतंत्र अभी ज़िंदा है।

अब महाराष्ट्र में जिसकी भी सरकार बने, यह ज़रूरी है कि लोगों की समस्याओं को ध्यान में रखकर बेहतरी की दिशा में काम हो। लोगों के धीरज का बांध ना टूटे इसका खयाल रखना होगा, नहीं तो जनता इनका लिहाज़ नहीं करेगी और आने वाले समय में ज़रूर सबक सिखाएगी।

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