फिरोज़ खान से पहले भी कई मुसलमान हुए हैं संस्कृत के विद्वान

खानाबदोश सी ज़िंदगी के कुछ पिछले दिन मेरे लिए जेठ की दोपहरी जैसे सुर्ख रहे। पिछले कुछ वक्त से हर जगह बस JNU में स्टूडेंट्स की बढ़ी हुई शुल्क, पुलिस और अधिवक्ताओं में संघर्ष, BHU के संस्कृत संकाय में एक सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति का पुरज़ोर बहिष्कार एवं स्टूडेंट्स का विरोध सुर्खियों में रहा।

आश्चर्य की बात यह है कि मैं खुद BHU का स्टूडेंट रहा हूं। वह विश्वविद्यालय जो समूचे देश में अपनी अनूठी पहचान के लिए मशहूर है, जो बनारस शहर में गंगा मैया के पावन तट पर स्थित है और जिसका ध्येय वाक्य यह है, “पतित पावन अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी।” इसलिए मैं इस लेख में BHU का भूतपूर्व स्टूडेंट होने एवं बनारस से जुड़ाव रखने के नाते इस मुद्दे पर आम जनमानस के समक्ष अपनी आवाज़ रखूंगा।

पिछले दिनों BHU में संस्कृत संकाय के सहायक प्रोफेसर पद के लिए एक मुस्लिम अभ्यर्थी का चयन किया गया। जैसे ही विश्वविद्यालय के इस आदेश की प्रति को संकाय के नोटिस बोर्ड पर चस्पा किया गया, वैसे ही स्टूडेंट्स ने इस नियुक्ति का विरोध करना शुरू कर दिया।

देखते ही देखते स्टूडेंट्स का हुजूम लग गया और उन्होंने संकाय का अनिश्चितकालीन बहिष्कार करने एवं मुस्लिम अभ्यर्थी की नियुक्ति का विरोध करने के लिए धरना शुरू कर दिया। भाषाएं एक सम्पूर्ण भूभाग के जीवन की सांस्कृतिक चेतना एवं आबोहवा की संवाहक होती हैं।

फिरोज़ खान के चयन पर संकीर्णता की भावना कहां से आई?

फिरोज़ खान
फिरोज़ खान। फोटो साभार- फेसबुक

बेशक अलग-अलग धर्म की उपासना करने वाले लोगों के धर्मग्रन्थ अलग-अलग भाषाओं में हैं मगर इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विशेष तरीके से उपासना करने वाले परिवार में जन्मा व्यक्ति अन्य धर्मों की भाषा, उसका अध्ययन-अध्यापन और उसकी उपासना नहीं कर सकता है। भारतीय संस्कृति और चिंतन तो विश्वव्यापी है जिसका उदाहरण सम्पूर्ण विश्व में नहीं है। सदियों पहले हमारे वाङ्मय ने कह दिया था,

अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम। (महोपनिषद अध्याय ४ श्लोक ७१)

इसका अर्थ है कि यह अपना बंधु है और यह अपना बंधु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार लोगों के लिए तो संपूर्ण धरती ही उनका परिवार है।

यह वाक्य भारतीय संसद भवन के मुख्य प्रवेश कक्ष पर भी अंकित है। यह हमारी भारतीय संस्कृति की विश्वव्यापी पहचान है। तो प्रश्न यह उठता है कि उसी भाषा के सहायक प्रोफेसर फिरोज़ खान नामक अभ्यर्थी का चयन होने पर संकीर्णता की भावना कहां से आई? इस नियुक्ति का विरोध करने वाले लोग यह बात कैसे भूल गए कि भाषाएं कभी भी ऐसी संकीर्णता को स्वीकार नहीं करती हैं, क्योंकि भाषाएं नदियों की तरह स्वछंद प्रवाहित होती हैं।

जब ऐसी संकीर्णता भाषा को प्रभावित करती है तो उनकी बहाव की प्रांजलता पर प्रभाव पड़ता है। हमारी भारतीय संस्कृति समन्वयवादी यानी साझी संस्कृति है, जो वसुधैव कुटुम्बकम् आदर्श के प्रति आस्थावान है। व्यक्ति चाहे किसी भी मज़हब का क्यों ना हो, उसके व्यक्तित्व की विवेचना करने में भेदभाव बरतना जायज़ नहीं कहा जा सकता है।

ज़रा देखिए कालीभक्त, मानवता के पुजारी बांग्लादेश कवि काजी नज़रुल इस्लाम काली माँ की उपासना करते हुए कहते हैं, “एकटि वृन्ते दू टि कुसुम। हिन्दू मुसलमान, मुस्लिम तार नयनमणि हिन्दू ताहार प्राण।”

तो जाहिर है कि यह भारत की आत्मा बोल रही है। काली माँ की ऐसी वंदना संस्कृत में भी नहीं मिलती है।

मुसलमानों ने भी पेश की है भारतीय संस्कृति की मिसाल

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

ऐसे अनगिनत मुसलमान और हुए हैं जिन्होंने हिन्दू देवी-देवताओं का वैभवगान और हिंदुस्तानी संस्कृति की आबोहवा अदब ओ मौसिकी को प्रशस्त किया है, जिनमें से एक पूर्व राष्ट्राध्यक्ष अब्दुल कलाम भी हैं जो नित्य गीता पाठ पढ़ते हैं, वीणा बजाते हैं और कर्णाटक संगीत की बंदिशे भी रचते हैं।

अंग्रेज़ वैसे भारत के दुश्मन रहे लेकिन वे भी भारतीय संस्कृति के कायल रहे हैं। अंग्रेज़ों ने भारतीय संस्कृति में व्यापत सामजिक कुरीतियों जैसे सती प्रथा और बाल विवाह आदि को दूर करने एवं शिक्षा पर भी नए आयाम स्थापित करने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। हम चाहकर भी उनके योगदान को नकार नहीं सकते हैं।

मुसलमानों ने भी भारतीय संस्कृति एवं देश को बहुत कुछ दिया और वे यहां की आबोहवा में मिट्टी पानी की तरह रच बस गए। संगीत के क्षेत्र में भी मुसलमानों का अमूल्य योगदान है। संगीत से सरोकार रखने वाले लोग जाति, धर्म, समुदाय और मज़हब के तंग सीखचे से बाहर ही रहे। ऐसा ही एक मुसलमान शंहशाह औरंगज़ेब भी था, जिसने भारतीय संगीत की विशुद्धरूपेण परंपरा वीणा एवं ध्रुपद को गतिशील रखा।

वह एक कुशल बीनकार एवं ध्रुपद का बंदिशकार था। ऐसे मुसलमान जिनके सत्प्रयासों से भारतीय संगीत का फलक व्यापक हुआ। कृष्ण के प्रेम में ‘मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।” जैसे मनोहर छंद  लिखने वाले रसखान के कृष्ण काव्य के बिना क्या कृष्ण की चर्चा संभव है?

ठीक इसी तरह अब्दुर्र रहीम खानखाना और कबीर और खुसरो के बारे में भी जाना जाता है कि वे संस्कृत के महान ज्ञाता थे। इन मुसलमानों ने भारतीय संस्कृति एवं आबोहवा को इतना वैभवशाली और समृद्ध किया कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को लिखना पड़ा था, “इन मुसलमान हरि जनन पर तो कोटिन हिन्दू वारिये।”

अर्थात भगवान के ऐसे मुस्लिम भक्तों पर करोड़ों हिन्दू न्योछावर किए जा सकते हैं। इसी कड़ी में कबीर कहते हैं, “काशी धाम वासी वामन नाम मेरा धर धीना, एक बार हरिनाम विसारा, पवरि जोलाहा कीना भाई मेरे कौन बिनेगो ताना।”

मुसलमानों खासकर मुगलों द्वारा हस्तलेखन की एक नई कला विकसित की गई, जिसे हम खुशनवीसी (Caligraphy) कहते हैं। संगीत एवं साहित्य की विचारधारा में गंगा जमुनी तहजीब सामने उभरकर आई जिसे सामासिक संस्कृति कहना उचित होगा, जिसका केवल एक ही लक्ष्य था कि सम्पूर्ण मानव जाति का सर्वांगीण विकास हो।

जिस संस्कृति का ताना बाना विश्व की तमाम संस्कृतियों का निचोड़ हो, जो सर्वधर्म सदभाव एवं वसुधैव कुटुंबकम के आदर्शो पर टिकी हो, उसके अलावा कोई और संस्कृति मानवता के हित के लिए हो ही नहीं सकती है।

संस्कृत सिर्फ एक भाषा ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की प्राणवायु है। अंग्रेज़ों ने इस तथ्य को बहुत अच्छी तरह महसूस कर लिया था कि भारत पर शासन करना है तो उन्हें यहां के सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक सरंचनाओं को अच्छी तरह से पढ़ना और समझना होगा। ऐसा कर पाना संस्कृत को जाने बिना मुश्किल होगा।

इसके लिए उस वक्त के बहुत से अंग्रेज़ अधिकारियों ने संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन किया। उनमें बिलियम जोन्स, आगस्त विल्हेम, मैक्समूलर और हावर जैसे पाश्चात्य विद्वानअदि के नाम उल्लेखनीय हैं। हेनरिथ राय ने तो स्वयं आगरा आकर संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन किया और पश्चिमी देशों को भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कृति से परिचय कराया।

सामजिक रूढ़ियों को तोड़ने की ज़रूरत

फोटो साभार- Flickr
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

संस्कृत की वैश्विक लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वर्तमान परिदृश्य में आज विदेशों से विद्यार्थी भारत आकर संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं।  वर्तमान में BHU में भी अनेक देशों के विद्यार्थी संस्कृत अध्ययन करने के अलावा अनेक संकायों में अन्य विषयों का भी अध्ययन कर रहे हैं।

महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िले के पंडित गुलाम दस्तगीर से आप मिलेंगे तो आप हैरान हो जाएंगे कि उन्हें कुरान और संस्कृत ग्रंथों वेद, उपनिषद, गीता और रामायण आदि का बहुत ज्ञान है। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की है। वह स्वयं को संस्कृत का गुलाम समझते हैं। मुस्लिम मतावलम्बी होने के बावजूद वह लोगों को संस्कृत के अध्ययन और अध्यापन के लिए प्रेरित करते हैं।

उन्होंने अपने घर पर संस्कृत एवं मुस्लिम भाषाओं के अध्ययन के लिए हज़ारों पुस्तकों को एकत्रित करके एक पुस्तकालय बनाया है, जो कि हमारी गौरवशाली परंपरा वसुधैव कुटुम्बकम् को परिभाषित करता है। वाराणसी की ही नाहिद आबिदी को उनकी संस्कृत साहित्य सेवा के लिए 2014 में पद्मश्री से विभूषित किया गया। यह सब उन सामजिक रूढ़ियों के बने हुए तंग सींखचे से मुक्त मानवता के संदेश को आम जनमानस में प्रसारित कर रहे हैं।

वहीं, दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अभी भी सामजिक रूढ़ियों के तंग सींखचे में कैद हैं। वे समझते हैं कि कैसे एक-दूसरे धर्म, भाषा का अनुयाई हमारी संस्कृत भाषा को पढ़ा सकता है? क्योंकि वह मुस्लिम है, मुस्लिम संप्रदाय से ताल्लुक रखता है। उसके अध्ययन और अध्यापन से हमारी संस्कृति की अस्मिता धर्म संकट में आ जाएगी।

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि फिरोज़ खान भी उन्हीं लोगों में से हैं, जो सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों के सींखचों से बाहर हैं। वह मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। उनके पिता स्वयं  एक गौ कथावाचक हैं, जो भारतीय संस्कृति की मिट्टी-पानी में रचे बसे हैं फिर भी उनके साथ अमानवीय व्यवहार शर्मनाक है।

उनके धर्म को लेकर उन्हें यह महसूस कराना कि वह एक मुस्लिम हैं जिस वजह से वह हमें नहीं पढ़ा सकते हैं, यह हमारी संकीर्णता से परिपूर्ण मानसिकता को दर्शाता है।

चरम पर है राष्ट्रवाद

हिन्दुत्व
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

मैं तमाम विद्वानों से भी एक प्रश्न पूछना चाहता हूं कि जो इस नियुक्ति एवं अध्यापन के विरोध में हैं, क्या उन्होंने देश का संविधान नहीं पढ़ा है? वे अपने देश की पवित्र पुस्तक को नहीं मानते? क्या वे समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्रात्मक शब्दों का अर्थ नहीं जानते? क्या वह सब विद्वान समाजवाद, पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्रात्मक होने की परिभाषा नहीं जानते?

ज़रा सोचिए कि यदि आप संविधान के इन आदर्शों को नहीं मानते हैं, तो आपकी दशा अराजकता वाले दौर की होगी। यदि वह सब यह जानते हुए भी भेदभाव एवं घृणित मानसिकता को ही स्वयं के समाजवाद, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक होने की परिभाषा में रखते हैं, तो मैं पुरज़ोर तरीके से ऐसी अभिव्यक्ति की परिभाषा का बहिष्कार करता हूं।

अभी हाल में ही यूजीसी ने देश के तमाम विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि सभी विश्वविद्यालय 26 नवंबर को संविधान में आमजनमानस के प्रति निष्ठा के लिए अपने-अपने परिसरों में संविधान दिवस का आयोजन करें। यहां यह प्रश्न वाजिब है कि जब एक ओर यूजीसी आमजनमानस की संविधान में निष्ठा के लिए यह आयोजन करवा रहा है, वहीं दूसरी ओर BHU में तमाम स्टूडेंट्स एक सहायक प्रोफेसर का उसके धर्म और जाति के आधार पर विरोध कर रहे हैं।

यह सब तब हो रहा है, जब समूचे राष्ट्रवाद की भावना चरम पर है। ना जाने देश कौन-कौन से राष्ट्रवाद के पथ पर उन्मुख हो गया है। देश की आज़ादी के 73 सालों में हमने संविधान के आदर्शों को अपने जीवन में कितना आत्मसात किया? यह हम सबके लिए प्रश्न रहेगा जो गूंजेगा हमारे अंतर्मन में एक आवाज़ बनकर।

हमारे स्वयं के समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्रात्मक होने के साथ हमारा स्वयं का दृष्टिकोण भी ऐतिहासिक होना चाहिए। ठीक वैसा ही दृष्टिकोण जैसा कि मुस्लिम समुदाय एवं जनमानस ने अयोध्या बाबरी मस्जिद के मामले पर उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर दिखाया है। भाषा तो अपने साधकों की निष्ठा के सानिध्य में संवरती  है, जिसका जातीय या धार्मिक पूर्वाग्रह से क्या सरोकार ?

मैं आखिर में अपनी लेखनी को हबीब जालिब की पक्तियों के साथ समाप्त करता हूं-

दीप जिस महल्लात में जले

चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले,

वो जो साये में हर मस्लहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्ह -ऐ बे -नूर,

मैं नहीं जानता, मैं नहीं मानता।

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