“आज़ादी से पहले हुई भारत के राष्ट्रवाद पर इंपोर्टेड नफरत की शुरुआत”

लेख के पहले भाग में राष्ट्रवाद और जिन्गोइज़्म पर चर्चा की गई। अब दूसरा भाग मुख्यतः आज़ादी से पहले के राष्ट्रवाद की व्याख्या करता है और आज़ादी के बाद राष्ट्रवाद के नाम पर किस तरह से जिन्गोइस्ट भावनाओं को उभारा गया, इसपर चर्चा करता है।

सनद रहे कि राज्य और राष्ट्र दो अलग अलग संकल्पनाएं हैं,

  • राज्य एक संस्था है जो किसी निश्चित भू-भाग पर बसी हुई संप्रभु जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।
  • जो लिखित या अलिखित संविधान से चलता है।
  • जो अपने नागरिकों को कुछ अधिकार, स्वतंत्रता देता है और
  • समानता एवं न्याय की स्थापना के लिए प्रतिबद्ध होता है।
  • राज्य में विभिन्न संस्थाएं होती हैं, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका, विधान सभा, विधान परिषद, ग्राम सभा, यहां तक कि एक पोस्ट ऑफिस भी राज्य में संस्था माना जाता है। ये सभी संस्थाएं जनता के लिए बने होते हैं।

वहीं राष्ट्र एक राजनैतिक-मनोवैज्ञानिक संकल्पना है।

प्रतीकात्मक फोटो, फोटो साभार- Pixabay

जहां राज्य एक सच्चाई है वहीं दूसरी ओर राष्ट्र सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई इत्यादि के आधार पर सजातीय (homogeneous) व्यक्तियों का समूह माना जाता है।

राष्ट्रवाद का विश्व के कई राज्यों में विकृत स्वरुप

ऐसे व्यक्तियों के मध्य समान इतिहास, समान संस्कृति, समान भाषा, समान परम्परा का पाया जाना एक आम बात है और सामान्यतः इसी “एक जैसा” या “समान विरासत” के कारण राष्ट्रवाद विश्व के कई राज्यों में अपने विकृत स्वरूप में देखा गया। जहां “दूसरे” (अपने से अलग) व्यक्तियों को उनके अलग धर्म, भाषा, इतिहास, परम्परा इत्यादि के नाम पर कमतर आंका गया या उनका कई बार पूर्ण तिरस्कार किया गया।

इस तरह का राष्ट्रवाद यूरोप (प्रमुखतया जर्मनी और इटली में देखा जा चुका है), जो युद्धोन्मादी था, जो अपने से अलग किसी सम्प्रदाय के मानने वाले राज्य/राज्यों को अपना प्राक्रतिक दुश्मन मानता था एवं अपनी मुख्य जनसंख्या से अलग “दूसरी” अथवा अल्पसंख्यक जनसंख्या के विरुद्ध था, उनसे नफरत का भाव रखता था या उन्हें ही देश में व्याप्त लगभग हर समस्या की जड़ मानता था।

साथ ही इस अलग जनसंख्या की भाषा, संस्कृति, धार्मिक रीति-रिवाज़, धार्मिक कानून, इतिहास इत्यादि को अपने से कमतर या बिल्कुल अलग निम्न श्रेणी का मानता था और स्वयं को श्रेष्ठ। वर्तमान समय में इसे राष्ट्रवाद नहीं कहा जाना चाहिए, ये सिर्फ जिन्गोइज़्म है, क्योंकि राष्ट्रवाद के असली स्वरुप में नफरत के लिए कोई जगह नहीं होती, राष्ट्रवाद का असली मतलब सिर्फ आपसी भाई-चारा, सभी का सम्मान, सभी को समाहित करना होता है, नफरत नहीं।

आपने भी कभी किसी की मदद की होगी, किसी के सुख दुःख में साथ खड़े रहे होंगे, बिना ये देखे या सोचे के सामने वाले व्यक्ति या परिवार का धर्म, जाति, भाषा, इत्यादि क्या है? यहीं से असली राष्ट्रवाद की नींव पड़ती है, यहीं से हम समाज में सभी का सम्मान करना सीखते हैं।

आज़ादी से पूर्व भारत में राष्ट्रवाद

जब यूरोपियन उपनिवेशवाद (मुख्यतः ब्रिटिश) भारत आता है तब वे भारतीयों से कुछ सवाल पूछते हैं,

आप भारतीय कैसे एक राष्ट्र बन सकते हैं? ना आपके पास एक भाषा है, ना एक धर्म है, ना एक संस्कृति है, ना एक तरह का खान-पान है इत्यादि तो भारत को एक राष्ट्र कैसे माना जाए? हमें (ब्रिटिश) देखिये, हमारे पास एक धर्म है, एक भाषा है, एक संस्कृति है, इसलिए हम एक राष्ट्र हैं, और क्योंकि आपके पास एक जैसा कुछ नहीं है, आप राष्ट्र नहीं हो सकते। अब क्योंकि आप एक राष्ट्र नहीं है तो राष्ट्रवाद कैसे आएगा और आप आज़ादी की मांग कैसे कर सकते हैं? (इस सवाल ने 1857 की क्रांति के बाद जोर पकड़ा)।

भारतीयों द्वारा इस सवाल के दो तरह से जवाब दिए गये। पहला वर्ग (नरमपंथी राष्ट्रवादी और कुछ सांस्कृतिक विचारक जो एक धर्म विशेष से प्रभावित थे) ने जवाब दिया,

हां हम एक राष्ट्र हैं। हमारे पास एक प्रमुख भाषा है (हिंदी), एक प्रमुख धर्म है (हिन्दू) और एक प्रमुख संस्कृति है। हमारे पास भी बाइबिल की तरह वेद हैं, हम भारतीय भी बिलकुल आपकी (ब्रिटिश) की तरह एक है, इसलिए हम भी एक राष्ट्र हैं। ये सबसे पहला रेस्पोंसे था जिसमे भारत ने यूरोपियन शैली की तरह देश में एकरूपता दिखाने का प्रयास किया, ताकि ये सिद्ध किया जा सके के भारत भी एक राष्ट्र है।

ब्रिटिश राष्ट्रवाद के सामने जो यह राष्ट्रवाद खड़ा करने का प्रयास किया गया इसने भारत को ब्रिटिश राष्ट्र की तरह दिखाने का प्रयास किया, ताकि एक राष्ट्रवादी संकल्पना को खड़ा किया जा सके। इस तरह के राष्ट्र का सृजन ब्रिटिशर्स द्वारा खड़े किये गये सवाल पर सिर्फ एक प्रतिक्रिया मात्र थी।

भारत में ब्रिटिश शासन, फोटो साभार- सोशल मीडिया

यह घबराहट में की गई प्रतिक्रिया थी। यह एक डर से उपजी प्रतिक्रिया थी। जिसमें भारतीय विचारकों ने ब्रिटिश राष्ट्र की तर्ज पर ये सिद्ध करने का प्रयास किया के भारत में भी ब्रिटेन के सामान एकता है, एक प्रमुख धर्म, संस्कृति और भाषा है। भारत ने ब्रिटिश की तरह एकरूपता प्रदर्शित करने का प्रयास किया।

ये शुरूआती प्रयास था, जिसमे ये भावना प्रबल थी के हम भारतीय भी ब्रिटिश के समान एक राष्ट्र हैं, कुल मिलाकर ब्रिटिश राष्ट्र जैसा दिखने की चाहत, क्योंकि

  • ब्रिटिश ने अपने राष्ट्र के प्रश्न के ज़रिये ये सिद्ध करने का प्रयास किया था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है और
  • बिना राष्ट्र के भारत में राष्ट्रवाद नहीं आ सकता।
  • भारतीय आजादी की मांग नहीं कर सकते

ये जो पहला जवाब दिया गया वो इसीलिए था ताकि भारत को एक राष्ट्र सिद्ध किया जा सके और ब्रिटिश से आज़ादी के लिए संघर्ष किया जा सके।

यहां ये सनद रहे कि मध्यकालीन एवं आधुनिक समय में जो राष्ट्रवाद यूरोप में पला वही राष्ट्रवाद आज भारत में RSS, BJP या संघ परिवार के रूप में मौजूद है, (जिसे जिन्गोइस्म कहना ज़्यादा उचित होगा), जहां आजादी से पहले के शुरूआती राष्ट्रवाद ब्रिटिशर्स के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी।

आज के संघ परिवार का राष्ट्रवाद अपने ही देश के अल्पसंख्यकों, दलित-बहुजन के विरुद्ध प्रतिक्रिया दे रहा है, जिसमें हिंदी, हिन्दू, हिन्दुस्तान का नारा लगता है, मानों देश (हिंदुस्तान) में कोई और धर्म, भाषा है ही नहीं। ये नारा उपनिवेश काल की ‘भारतीय प्रतिक्रिया’ से प्रभावित है।

संघ परिवार ने यहां दो विचारों को जोड़ा, फ़्रांस का नाजीवादी राष्ट्रवाद और आजादी के पहले भारतीय विचारकों द्वारा दी गई ब्रिटिश शासन के विरुद्ध दी गई प्रतिक्रिया, इन्हीं के मिश्रण से आज का राष्ट्रवाद परोसा जा रहा है, हालांकि आज़ादी से पहले के शुरूआती राष्ट्रवाद सिर्फ ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी और उस दौर का राष्ट्रवाद कहीं भी किसी अन्य धर्म, भाषा, सम्प्रदाय इत्यादि के विरुद्ध नहीं था, लेकिन संघ परिवार ने इस विचार को जर्मनी के राष्ट्रवाद से जोड़कर एक ऐसे राष्ट्र की संकल्पना प्रस्तुत करि जिसमें बहुसंख्यक जनता का वर्चस्व हो,जो ब्राह्मणवाद के सिद्धांत पर आधारित हो, (ब्राह्मण एक जाति और ब्राह्मणवाद में अंतर है) और बाकि अन्य को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जाए।

ये सिद्धांत एकाकी है और बहुसंस्कृतिवाद के विरुद्ध है, ये सिद्धांत “समाहित” करने के सिद्धांत के विरुद्ध जाता है, इसीलिए संघ परिवार को भारत की विभिन्नता, धर्मनिरपेक्षता, आरक्षण का प्रावधान, अल्पसंख्यक को दिए गए कुछ विशिष्ट अधिकार, धारा 370 इत्यादि से दिक्कत होती है, क्योंकि ये सभी सिद्धांत भारत की विभिन्न जनसँख्या को समाहित करते हैं, अनेकता में एकता के सिद्धांत को बल देते हैं।

नरमपंथ और गरमपंथ के राष्ट्रवाद की विचारधारा

ध्यान रहे भारत एक बहुसंस्कृति राष्ट्र है और यहां एक भाषा, एक संस्कृति या एक धर्म की मान्यताओं को किसी अन्य भाषाई समूह, सांस्कृतिक समूह और धार्मिक समूह पर थोपा नहीं जा सकता। हालांकि नरमपंथी जो यूरोपियन शैली से बहुत प्रभावित थे और ब्रिटिश शासन को भारत के लिए अच्छा मानते थे, राष्ट्रवाद की इस विचारधारा से अलग थे। नरमपंथियों ने कभी इस एकाकी राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया और ना ही उन्होंने कभी भारत की विविधता को चुनौती दी।

कुछ समय बाद एक दूसरा वर्ग आया (गरमपंथी राष्ट्रवादी, गांधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह इत्यादि), इस दूसरे वर्ग ने ब्रिटिशर्स से ही सवाल कर दिया। उन्होंन पूछा,

कहां लिखा है कि एक राष्ट्र बनने के लिए भारत को आपके राज्य जैसा होना पड़ेगा? जो परिभाषा आपने दी है उस परिभाषा को हम भारतीय सार्वभौमिक सत्य क्यों मानें? हम एक राष्ट्र हैं और आपके राष्ट्र से बिलकुल अलग हैं। हमें राष्ट्र बनने के लिए आप जैसा बनने की ज़रूरत नहीं है।हम आपसे बिल्कुल अलग एक अनोखे और अद्वितीय राष्ट्र हैं। हम एक जैसे नहीं हैं, ना ही हम एक जैसा बनना चाहते हैं।

धर्म और भाषा के विषय पर राष्ट्र की परिभाषा देते हुए वे कहते हैं,

आपके देश जैसा हमारे यहां एक धर्म की प्रधानता नहीं है, हम एक धर्म की प्रधानता को स्वीकार भी नहीं करना चाहते। हमारे यहां कई भाषाएं हैं। हम आपके जैसे एक भाषा वाले राष्ट्र बनना भी नहीं चाहते और हम एक जैसी संस्कृति वाले राष्ट्र नहीं हैं। हमे एक जैसी संस्कृति वाला राष्ट्र बनना भी नहीं है। हमारा राष्ट्र विविधता के सिद्धांत पर आधारित है और ये विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करता है।

ब्रिटिश शासन और राष्ट्रवाद

औपनिवेशिक काल में शुरुआत के राष्ट्रवादी (नरमपंथी) अंग्रेज़ों के शासन को वरदान मानते थे। किसी मुद्दे पर अंग्रेज़ों से प्रार्थना किया करते थे एवं उनका विरोध नहीं करते थे। नरमपंथी ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए सर्वोत्तम मानते थे क्योंकि उनका यह विश्वास था कि ब्रिटिश भारत को अपने जैसा एक सभ्य देश बनाने आये हैं।

वे ब्रिटिश शासन को वरदान मानते थे, ये हमें पता है लेकिन क्यों मानते थे ये कम लोग जानते हैं। इसका जवाब Orientalism में है। Orientalism को हिंदी में प्राच्यवाद कहतें हैं। प्राच्यवाद विश्व को दो गुटों में बांटता है। एक ओरिएंट और दूसरा ओक्सिडेंट।

भारत में ब्रिटिश शासन, फोटो साभार- सोशल मीडिया

Orientalist या प्राच्यवादी विचारकों ने पूर्वी राज्यों को ओरिएंट कहा, जो पिछड़े हैं, जिनमे तार्किकता का अभाव है, आधुनिकता से कोसों दूर हैं, परम्परावादी हैं, धर्मांध हैं इत्यादि। वहीं दूसरी और इन्हीं विचारकों ने पश्चिमी और यूरोपियन राज्यों को ओक्सिडेंट कहा, जो विकसित हैं, तार्किक हैं, आधुनिक हैं, विवेकशील हैं, धर्मांध नहीं हैं इत्यादि।

साथ ही प्राच्यवादी विचारकों ने ये घोषणा की कि ओक्सिडेंट का दयित्व है कि वो ओरिएंट को अपने जैसा सभ्य बनाएं। इन नरमपंथियों पर इसी Orientalist या प्राच्यवादी विचारों का गहरा असर था और इसीलिए ये सभी ब्रिटिश शासन को भारत पर एक वरदान माना करते थे क्योंकि ये मानते थे के ब्रिटेन भारत को भी एक सभ्य, तार्किक, विवेकशील, धर्मान्धता से मुक्त एक आदर्श विकसित राज्य बनाएगा।

प्राच्यवाद और भारत

जब ब्रिटिश भारत आए तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या थी कि इस विभिन्नताओं वाले देश पर शासन कैसे किया जाए? युद्ध या तलवार के दम पर ब्रिटिश बहुत समय तक राज नहीं कर कर सकते थे और ना व्यापार (लूट)। तब कुछ प्राच्यवादी विचारक भारत आए जिन्होंने संस्कृत, उर्दू, फारसी, पाली इत्यादि भाषाओं का गहन अध्ययन किया और वेद, पुराण, स्मृतियां, कुरान इत्यादि धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन किया।

प्राच्यवादी विचारकों में विलियम जोन्स एवं जे एस मिल इत्यादि प्रमुख विचारक थे। जिन्होंने भारत का अध्ययन किया और भारतीयों को अपने लेखों के ज़रिये यह अहसास कराया कि वे वाकई में पिछड़े हैं। इनमें जे एस मिल का भारतीय इतिहास का तीन भागों में विभाजन आज भी संघ परिवार या मुस्लिम राष्ट्रवादियों (जिन्गोइस्ट) द्वारा प्रयोग किया जाता है।

मिल ने प्राचीन भारत को हिन्दू भारत कहा और उसे भारत का स्वर्ण युग बोला। मध्यकालीन भारत को मुस्लिम भारत और आधुनिक भारत को ब्रिटिश भारत या संक्रमण कालीन भारत कहा।

मजे़दार बात यह कि आधुनिक भारत को क्रिस्चियन भारत नहीं कहा गया। भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में विभाजन को भारत में आज भी कई संकीर्ण विचारधारा के लोग सत्य मानते हैं। जिनमे संघ परिवार प्रमुख है, वे प्राचीन भारत को स्वर्ण युग, मध्यकालीन भारत को अन्धकार युग और आधुनिक भारत को चेतना युग मानते हैं।

जबकि ये विचार एक विदेशी (जे एस मिल) द्वारा दिया गया ताकि भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा सके और इतनी बड़ी, विविधताओं वाली जनसंख्या पर आसानी से शासन किया जा सके।

इस प्राच्यवादी विचार का भी विरोध हुआ और गरमपंथी राष्ट्रवादी, गाँधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह, अम्बेडकर इत्यादि ने सवाल खड़े किये लेकिन तब तक प्राच्यवाद पढ़े लिखे भारतीयों के मध्य अपनी पैठ बना चुका था जिसे धीरे-धीरे गाँधी, नेहरु, भगत सिंह इत्यादि स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने तरीके से हटाने की कोशिश की।

प्राच्यावादियों द्वारा सम्पादित इतिहास से प्रभावित

गाँधी का स्वदेशी अभियान, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन इत्यादि ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरुद्ध और आज़ादी प्राप्त करने के लिए एक संघर्ष तो था ही, कहीं ना कहीं इन आंदोलनों ने प्राच्यवादी विचारधारा पर हमला भी किया और देश के लोगों में देश से प्यार और भाईचारे की भावना को बढ़ाया।

इसी आधार पर जनता को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों को लामबंद भी किया लेकिन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवादी प्राच्यावादियों द्वारा सम्पादित इतिहास के वर्गीकरण से हमेशा प्रभावित रहे।

दंगे, फोटो साभार- Getty images

आज भी हिन्दू राष्ट्रवाद इसी वर्गीकरण से प्रभावित हैं। कुल मिलाकर आज का हिन्दू राष्ट्रवाद यूरोपियन विचारों, उनके राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर दिए विचारों से ज़्यादा प्रभावित है। जहां एक ओर ये नाज़ी जर्मनी से राष्ट्रवाद सीखने की वकालत करता है (पहला भाग पढ़िए) वहीं दूसरी ओर ये ब्रिटिश/यूरोपियन प्राच्यवादियों के इतिहास विभाजन को पूरी तरह से आत्मसात करता है।

तभी प्राचीन काल की उन्नत वैज्ञानिक तकनीक, पुष्पक विमान, मिसाइल तकनीक, टेस्ट ट्यूब बेबी, ब्रह्मास्त्र को आज का परमाणु बम मानना इत्यादि इनके विचार में शामिल हैं जो वास्तविक रूप में इन ब्रिटिश प्राच्यवादी लेखकों द्वारा सम्पादित और प्रचारित किये गये और जिसको हिन्दू राष्ट्रवादियों ने थोडा बहुत फेर बदल करके आत्मसात कर लिया। (विलियम जोन्स की 1824 में लिखित पुस्तक Discourses delivered before the Asiatic Society: and miscellaneous papers, on the religion, poetry, literature, etc., of the nations of India और जे एस मिल की The History of British India पुस्तके पढ़े)।

संस्कृत को महान और सबसे प्राचीन भाषा का तमगा दिलाने वाले भी विलयम जोन्स ही थे। जोन्स और मिल ने ये कार्य ब्रिटिश सरकार की मदद करने के लिए किया और हिन्दू–मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जोन्स और मिल का सहारा लिया जो अनवरत आज तक चला आ रहा है लेकिन आज़ादी से पहले गाँधी, नेहरु, टेगोर, भगत सिंह इत्यादि के विचार ही फैले और हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्रवाद अपनी जगह नहीं बना पाया।

उस दौर का राष्ट्रवाद

उस दौर के राष्ट्रवाद की खूबसूरती इसी बात में थी कि जो भी ब्रिटिश विरोधी आन्दोलन चलाया गया या आज़ादी के लिए जो संघर्ष किया गया वो सिद्धांतों पर आधारित था। अफ्रीकन राष्ट्रवाद की तरह भारत ने कभी यह नहीं कहा कि ब्रिटिश की और हमारी स्किन का रंग अलग है। इसलिए ब्रिटिश के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, उनको देश से भगाना चाहिए। बल्कि इंडियन नेशनल काँग्रेस, बोस, भगत सिंह, टेगोर इत्यादि ने ब्रिटिश शासन को सम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी मानते हुए इसका इसका विरोध किया।

उन्होंने ब्रिटिश शासन का इस आधार पर विरोध किया कि एक इन्सान किसी दूसरे इन्सान को अपना गुलाम नहीं बना सकता। इस आधार पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी कि एक देश किसी दूसरे देश को अपना गुलाम नहीं बना सकता।

भारत की आज़ादी की लड़ाई स्वतंत्रता, समानता, न्याय, विश्व-बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित थी। किसी संकीर्ण विचार पर नहीं। यहीं से भारतीय राष्ट्रवाद की नींव पड़ी। जो ब्रिटिश से नफरत पर आधारित नहीं था बल्कि इनका विरोध ब्रिटिश उपनिवेशवाद और प्राच्यवादी विचारों से था।

अंत में भारतीय राष्ट्रवाद हमेशा से समावेशी प्रवृत्ति का रहा है और यूरोपियन राष्ट्रवाद से अलग भारत में राष्ट्रवाद नफरत के सिद्धांत पर आधारित ना होकर आपसी भाई चारे, प्यार, सम्मान, इत्यादि पर आधारित रहा है। लेख के तीसरे और अंतिम भाग में इसी भारतीय राष्ट्रवाद की विस्तृत चर्चा की जाएगी।

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यह लेख पूर्व में 27 मई 2019 को डॉ अनुराग पांडेय द्वारा “इंडियन डेमोक्रेसी” में  प्रकाशित हुआ है।

लेखक अनुराग पांडेय दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। 

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