फिल्मी दुनिया में परिवारवाद से नहीं अपने अभिनय से दर्शकों का जीतना पड़ता है दिल

चकाचौंध से भरी सतरंगी सिनेमाई दुनिया से समीक्षक और आलोचक भले ही परिवारवाद का जिन्न बोतल से निकालने की बार-बार असफल कोशिश करें मगर दर्शक वर्ग उनको अपने अनुसार सतत सफलता के पैमाने पर तौलते रहते हैं।

समीक्षकों, आलोचकों का ज्ञान एक तरफ और सिनेमाई सरगर्मी पर बाज़ की नज़र रखने वाले दर्शक एक तरफ। लोग भले ही राज कपूर से शुरू कर अभिषेक बच्चन, करण देओल, तुषार कपूर पर खत्म करते हुए बाप-बेटा वाला सिद्धांत साबित करना चाहते हो मगर उनकी रैंकिंग तो अंततः काम अनुसार ही होती है। बेशक उन्हें फिल्मी बैकग्राउंड होने का लाभ मिलता है मगर समय रहते उन्हें दर्शकों का प्यार जीतना होता है, अन्यथा वे रेस में बहुत पीछे छूट जाते हैं।

चलिए शुरुआत करते हैं राज कपूर से

फिल्म मेरा नाम जोकर में राज कपूर।

राज कपूर को फिल्मों में काम पृथ्वीराज कपूर के बेटे होने के कारण मिला, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। जब पहली बार 1947 में केदार शर्मा ने अपनी फिल्म ‘नीलकमल’ में राज कपूर को नायक की भूमिका दी थी, तो यह बात पृथ्वीराज कपूर भी मानते थे, तभी तो उनके साथ रहने वाले और बाद में राज कपूर के सहायक वीरेंद्रनाथ त्रिपाठी कहते हैं,

पापा जी (पृथ्वीराज कपूर) हमेशा कहते थे कि राज पढ़ेगा-लिखेगा नहीं पर फिल्मी दुनिया में शानदार काम करेगा। आज केदार ने पृथ्वीराज कपूर का बेटा होने के कारण उसे काम दिया है लेकिन एक दिन वह भी आएगा जब लोग राज को पृथ्वीराज का बेटा नहीं बल्कि पृथ्वीराज को राज कपूर का बाप होने के कारण जानेंगे।

फिल्मी दुनिया में एंट्री तो मिली मगर स्टार बनने के लिए करना पड़ा संघर्ष

राज कपूर को ‘नीलकमल’ में काम मिल तो गया और वह फिल्म सफल भी रही मगर उसके साथ ‘चित्तौड़ विजय’, ‘दिल की रानी’, ‘अमर प्रेम’ सरीखे शुरुआती फिल्में फ्लॉप रहीं। हालात ये हो गएं कि राज कपूर को कुछ दिनों के लिए भुला दिया गया। मगर एक कलाकार के तौर पर यही सबसे महत्वपूर्ण समय होता है, जब आपको संघर्ष करना होता है।

फिल्मी बैकग्राउंड तो आपको शुरुआती फिल्में दिला दे मगर उसके बाद का सफर आपको खुद तय करना होता है। तभी राज कपूर ने समय को भांपा और अपने शुरुआती जीवन में संघर्ष शुरू किया। इसके बाद की भी फिल्में असफल रहीं, क्योंकि शायद वह जनता की मांग पर खरे नहीं उतर पा रहे थे।

अपनी मेहनत और काम की वजह से जनता का जीता दिल

1949 में वह बरसात लेकर आएं और फिल्म सफल हुई, उसके बाद राज कपूर की गाड़ी चल निकली और फिर छिटपुट फिल्मों को छोड़ दें तो राज कपूर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखें। जनता को उनका संघर्ष और काम पसंद आ चुका था। फिर ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘जागते रहो’, ‘चोरी-चोरी’, ‘मेरा नाम जोकर’ सरीखे फिल्में ना केवल कारोबारी सफल हुईं, बल्कि देश-विदेश से उसकी प्रशंसा भी की गई। ‘जागते रहो’ को तो कार्लोरिवेरी फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित भी किया गया।

फिल्म ‘आवारा’ को लेकर प्रसिद्ध फिल्म समालोचक प्रहलाद अग्रवाल कहते हैं,

आवारा ने ही 27 साल के नौजवान को उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया, जहां तक पहुंचने के लिए बड़े-से-बड़ा कलाकार लालायित हो सकता है। आवारा ने ही उसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्रदान की, यहां तक कि विदेश में पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्तित्व बन गया। सोवियत रूस के देशों में आवारा को सिर्फ प्रशंसा ही नहीं मिली, बल्कि वहां की जनता ने भी बेहद आत्मीयता के साथ इसे अपनाया।

हर किसी को करना पड़ता है संघर्ष

कुछ इसी तरह की स्थिति राज कपूर के अन्य भाइयों के साथ थी। वैसे ही उन्हें शुरुआती काम तो मिले मगर बाद में उन्हें जनता की मांग को देखते हुए संघर्ष का रास्ता अपनाना ही पड़ा।

कपूर अभिनेताओं के समानांतर दिलीप कुमार, देवानंद, मनोज कुमार, राजकुमार सरीखे अभिनेताओं का फिल्मी बैकग्राउंड ना होने के बाद भी फिल्मी जगत में उन्होंने अपना तंबू गाड़ा। इसके पीछे का महत्वपूर्ण कारण दर्शकों का नज़रिया था, जो कलाकारों को उनके कलाकारी के अनुसार माथे पर सजाते हैं ना कि उनके परिवारिक बैकग्राउंड के अनुसार।

कपूर अभिनेता इसके अच्छे उदाहरण हैं, क्योंकि काम तो भले उनको शुरू में मिल गया मगर उनको भी संघर्ष करना पड़ा जैसे कि कोई नॉन फिल्मी बैकग्राउंड का भी अभिनेता करता है, तब जाकर वह जनता की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं।

अब बात करते हैं ऋषि कपूर की

श्री देवी के साथ ऋषि कपूर।

राज कपूर के बाद की पीढ़ी ऋषि कपूर की आती है, जिनको सन् 1973 में ‘बॉबी’ फिल्म से सिर्फ इसलिए लॉन्च किया गया, क्योंकि राज कपूर अपने अंत के कुछ फिल्मों की लागत निकालना चाहते थे। यहां समीक्षकों-आलोचकों का पक्ष मज़बूत है, क्योंकि ऋषि कपूर को सिर्फ और सिर्फ इसलिए लॉन्च किया गया, क्योंकि वह राज कपूर के बेटे थे।

ऋषि कपूर की पहली फिल्म ‘बॉबी’ तो सफल हो गई मगर उसके तुरंत बाद आई ‘ज़हरीला इंसान’, ‘बारूद’ बॉक्स ऑफिस पर पिट गई मगर उनपर फिल्माया गाना ‘ओ हंसिनी’ हिट रहा। इससे पता चलता है कि फिल्मी परिवार होने के नाते आपको लॉन्च तो किया जा सकता है मगर सफलता मिले यह ज़रूरी नहीं है। वक्त- बेवक्त आपको जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है।

ऋषि कपूर एक सफल अभिनेता के तौर पर भले ही दिखाई देते हों मगर उनका फिल्मी रिकॉर्ड उतना अच्छा नहीं है, जैसा पृथ्वीराज कपूर के पोते और राज कपूर के बेटे का होना चाहिए। उनकी तकरीबन 105 फिल्मों का अध्ययन करने से पता चलता है कि 38 फिल्में हिट रहीं तो 67 दिन में फ्लॉप भी रहीं।

कुछ ऐसी फिल्मी हस्तियां जिन्होंने फिल्मी बैकग्राउंड के बावजदू अपनी मज़बूत जगह बनाई

ऋषि कपूर के समानांतर यदि हम जितेंद्र, फिरोज़ खान, विनोद खन्ना, राजेश खन्ना को देखें, तो इनका कोई ठोस फिल्मी बैकग्राउंड नहीं रहा मगर फिर भी उन्होंने सिनेमा जगत में खुद को मज़बूत खंबे के रूप में स्थापित किया। राजेश खन्ना तो इस फेहरिश्त में इतने आगे हैं कि उनको बॉलीवुड का पहला सुपरस्टार कहा जाता है। कुल 165 फिल्मों में से 105 फिल्में उन्होंने हिट दी, जो किसी भी अभिनेता के लिए आसान और छोटा काम नहीं है।

फिल्मी बैकग्राउंड ना होने पर भी अमिताभ बच्चन की सफलता

फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन।

70 के दशक में ऋषि कपूर के रूप में कपूर परिवार की तीसरी पीढ़ी सिनेमाई दुनिया में आ चुकी थी, तो वहीं अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र जैसे कलाकार भी अपने लिया स्थान पक्का करना चाहते थे। अमिताभ पर तो थोड़ी देर के लिए आरोप लगाया जा सकता है कि उनके पिता प्रख्यात लेखक थे, तो उन्हें फिल्मी दुनिया में काम मिला किंतु शुरुआत की उनकी ‘सात हिंदुस्तानी’, ‘आनंद’, ‘परवाना’, ‘रेशमा और शेरा’ सरीखें तमाम फिल्में बुरी तरह असफल रहीं। तब फिर उन्हें संघर्ष का रास्ता अख्तियार करना पड़ा।

‘ज़ंजीर’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘दीवार’ जैसी सफल फिल्में उनके कदम चूमने लगीं। देखते-देखते वह लोगों के दिलों पर इतने छा गएं कि उनकी तुलना महान अभिनेता दिलीप कुमार से होने लगी। मगर इसके ठीक उलट उनके सुपुत्र आज भी बॉलीवुड में पैर जमाने को तरस रहे हैं। उनकी ‘बंटी और बबली’, ‘हां मैंने भी प्यार किया है’ जैसी एक-दो फिल्में ही थोड़ी बहुत सफल हो सकीं मगर उनका करियर ग्राफ आज भी नेगेटिव है।

फिल्मी बैकग्राउंड ने इन कलाकारों को नहीं दिलाई सफलता

फिल्म बंटी और बबली में अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन।

वह महानायक अमिताभ बच्चन के सुपुत्र जरूर हैं मगर एक कलाकार के रूप में उनकी पहचान फीकी है। अमिताभ के सुपुत्र होने के नाते उन्हें शुरुआती दिनों में सहयोग तो मिला मगर आगे वह संघर्ष करके जनता का विश्वास जीतने में असफल रहें। ऋषि कपूर के पुत्र होने के नाते रणबीर कपूर को भले ही उनको सिनेमाई दुनिया में प्रवेश दिला दिया हो मगर उनका रिकॉर्ड अभी भी 50-50 ही है।

हालांकि उन्होंने शुरुआती दिनों में संघर्ष भी किया और अमेरिका में अभिनय सीखने भी गए मगर भारतीय दर्शक उनसे चाहते क्या हैं, वह अभी भी समझ नहीं पाए हैं। अब तक की 17 फिल्मों में उनकी 8 फिल्में फ्लॉप हैं तो 9 हिट रही हैं। अपनी पहली फिल्म ‘सांवरिया’ में उन्होंने काम अच्छा किया मगर फिर शिथिल पड़ गए। फिल्म समीक्षक तरण आदर्श कहते हैं,

रणबीर कपूर अत्यधिक प्रतिभाशाली हैं, इस पर कोई दो राय नहीं है, वे अच्छे लगते हैं पर जो चीज़ हम घर ले जाते हैं वह है प्रदर्शन में ईमानदारी। अगर इनकी पहली फिल्म का प्रदर्शन इतने ऊंचे स्तर का है, तो यह बालक आने वाले वर्षों में कपूर खानदान को गर्वित कर सकता है। इनके पहले प्रदर्शन के लिए उन्हें 10 में से 10 अंक दिए जाते हैं।

देओल परिवार का फिल्मी करियर

70-80 के दशक में धर्मेंद्र भी एक सफल अभिनेता रहें, उनकी चर्चा अधिक इसलिए भी रहेगी कि उनका बैकग्राउंड फिल्मी नहीं था। उन्होंने एक से बढ़कर एक हिट फिल्में दीं, जिनमें ‘आंखें’, ‘फूल और पत्थर’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘शिकार’, ‘आए दिन बहार के’, ‘तहलका’ शामिल हैं। वह ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें हमेशा अंडर रेट किया गया मगर उन्होंने इसके उलट अपने आपको बेहतरीन अभिनेता साबित किया।

किंतु यहीं से धर्मेंद्र परिवार की सिनेमाई दुनिया में एंट्री होती है। 1982 में सनी देओल ‘बेताब’ फिल्म में बतौर अभिनेता पदार्पण करते हैं। धर्मेंद्र फैमिली में सनी देओल तो फिर भी सफल अभिनेता माने जाते हैं, क्योंकि उनके ‘इंसानियत’, ‘अंगरक्षक’, ‘ज़ोर’, ‘सलाखें’ सरीखे कुछ फिल्मों को छोड़ दें, तो उनकी बहुत सारी फिल्में हिट रही हैं, जिनमें ‘घायल’, ‘विश्वात्मा’,’बेताब’, ‘गदर’, ‘घातक’, ‘फर्ज’ आदि शामिल हैं।

मगर देओल परिवार के बॉबी देओल को पचा पाना दर्शक और आलोचकों के लिए अभी भी मुश्किल है। ‘बादल’, ‘बरसात’, ‘गुप्त’ जैसी फिल्में बॉबी देओल की थोड़ी बहुत प्रभावित कर पाईं मगर अभी भी उनका फिल्मी दुनिया में पैर जमाना बाकी है। देओल परिवार से करण देओल की भी पर्दे पर शुरुआत हुई है मगर उनकी समीक्षा अभी जल्दबाजी होगी।

फिल्मी दुनिया में सलमान का सफर

फिल्म टाइटगर ज़िन्दा है में कटरिना कैफ के साथ सलमान खान।

90 का दौर मुख्यतः सलमान खान, शाहरुख खान, अक्षय कुमार, सनी देओल, जैकी श्रॉफ, सुनील शेट्टी,आमिर खान और सैफ अली खान के नाम रहा, जिनमें केवल सलमान खान ही हैं, जिनका परिवार फिल्म से जुड़ा रहा। पिता सलीम खान एक बड़े पटकथा लेखक थे, जिसका फायदा सलमान को मिला भी और 1989 में सूरज बड़जात्या ने सलमान को ‘मैंने प्यार किया’ से बड़े पर्दे पर उतारा।

उन्हें शुरुआती सफलता ‘बागी’, ‘सनम बेवफा’, ‘साजन’ के रूप में ज़रूर मिली मगर कुछ ही दिनों के बाद उनका भौकाल घटने लगा। 90 के दशक के अंत में वह ठंडे पड़ गए, जब ‘वीरगति’, ‘औजार’, ‘हेलो ब्रदर’, ‘कहीं प्यार ना हो जाए’, जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धड़ाम हो गईं।

मगर इसके बाद शायद सलमान खान समझ गए कि फिल्मी परिवार होने के नाते मुझे शुरुआत तो मिल गई मगर आगे का रास्ता तय करने के लिए जनता के दिलों में उतरना बहुत ज़रूरी है। वक्त रहते सलमान इस बात को भांप गए और आज वह बॉलीवुड के ‘दबंग’ एक्टर हैं, जो सफलता का दूसरा नाम है।

फिल्मी दुनिया से कोई वास्ता ना होने के बावजदू आज सफल अभिनेता हैं शाहरुख खान

फिल्मी दुनिया में ऐसे बहुत सारे लोग दिखते हैं, जिनका कोई परिवार फिल्मी दुनिया से नहीं रहा मगर अपने कामों की बदौलत जनता के दिलों पर छाए हुए हैं, जिनमें शाहरुख खान, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, जैकी श्रॉफ जैसे नाम शामिल किए जा सकते हैं। विशेष चर्चा शाहरुख खान की करनी चाहिए, जिन्होंने एक संघर्ष के बाद खुद को सिनेमा जगत में स्थापित किया।

एक ऐसे दौर में जब सलमान, संजय, सुनील, आमिर जैसे अभिनेता पहले से ही बॉलीवुड में जमे पड़े थे, शाहरुख ने अपनी एक अलग पहचान बनाई। कुछ एक फिल्मों को छोड़कर उनका रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा, विशेषकर 90 का दशक तो ‘बाज़ीगर’, ‘डर’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’, ‘दिल तो पागल है’ से उनके ही नाम रहा।

2000 के बाद ‘देवदास’, ‘स्वदेश’, ‘वीर-ज़ारा’, ‘चक दे इंडिया’, ‘ओम शांति ओम’, ‘रब ने बना दी जोड़ी’ फिल्मों ने कारोबार में एक नया मुकाम बनाया। वह इतना आगे निकल गए कि उन्हें ‘बॉलीवुड का बादशाह’, ‘किंग ऑफ रोमांस’ आदि संज्ञा दी जाने लगी।

इतना होने के बावजूद हाल फिलहाल की उनकी कुछ फिल्में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाईं, जिनमें ‘ज़ीरो’, ‘जब हैरी मेट सेजल’, ‘फैन’ ‘डियर ज़िन्दगी’ शामिल हैं। आप भले होंगे बॉलीवुड के बादशाह, भले ही आपको कहा जाता हो किंग ऑफ रोमांस मगर लोग आपको तब तक ही प्यार देते हैं, जब तक आप उनको सही में मायने में मनोरंजित करते हैं।

आमिर खान का फिल्म सफर

आमिर खान का भी कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था मगर उन्हें बॉलीवुड का ‘मिस्टर परफेक्शनिस्ट’ कहा जाता है और उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उनकी फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’, ‘दिल’, ‘कयामत से कयामत तक’, ‘3 इडियट्स’, ‘पीके’, ‘दंगल’ जैसी फिल्में ना केवल बॉक्स ऑफिस पर धाक जमाईं, बल्कि आलोचकों और दर्शकों ने भी इन फिल्मों की खूब तारीफ की।

फिल्मी जगत के कुछ अन्य उदाहरण जो ‘परिवारवाद से सफलता’ के पैमाने को गलत साबित करते हैं

अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी भी महत्वपूर्ण हैं। कोई ठोस फिल्मी बैकग्राउंड ना होने के बाद भी इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। इनके समानांतर एक और अभिनेता का नाम आता है वह हैं संजय दत्त का, जिनके ऊपर भी आरोप लगते हैं कि उनके पिता सुनील दत्त फिल्म जगत से जुड़े रहें, इसलिए उन्हें काम मिला। मगर इसमें भी कोई दो राय नहीं कि आगे चलकर उन्होंने अपने काम की बदौलत जनता के दिलों में अपना स्थान बनाया। उन्होंने ‘कारतूस’, ‘गुनाह’, ‘खलनायक’, ‘वास्तव’, ‘दाग’ जैसी फिल्मों से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।

जैकी श्रॉफ भी 80-90 के दशक के सफल अभिनेताओं में से एक रहे हैं और अब तो उनके सुपुत्र टाइगर श्रॉफ भी फिल्मी दुनिया में आ गए हैं मगर टाइगर श्रॉफ की समीक्षा अभी उचित नहीं है। उन्होंने ‘वॉर’ और ‘बागी’ जैसी फिल्मों से लोगों को प्रभावित किया है मगर उन्हें किसी प्रकार की संज्ञा देना जल्दबाज़ी होगी।

सिनेमाई परिवार से जुड़े होने के नाते भले ही लोगों को शुरुआती रोज़ी-रोटी मिल जाए मगर दर्शक उन्हें तभी पसंद करते हैं, जब वह दर्शकों की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। ऐसा नहीं है कि आप यदि किसी नामी एक्टर के बेटे हैं तो आप सफलता का दूसरा नाम हो जाएंगे। भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर से ही फिल्मी बैकग्राउंड वाले एक्टरों को जल्दी काम मिल गया मगर जिनका परिवार सिनेमा की दुनिया में नहीं था ऐसा नहीं है कि वह कहीं पीछे छूट गएं। वह अपने संघर्ष और कामों के बदले उन अभिनेताओं के बराबर खड़े रहें, जो किसी परिवार से जुड़े थे।

यह बात हर दौर में रही है, राज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक। शुरुआती दौर में जहां कपूर खानदान के अभिनेता थे तो उनके समानांतर देवानंद, मनोज कुमार, राजकुमार, जैसे अभिनेता भी थे। आगे चलकर सलीम खान की विरासत को सलमान खान ने संभाला तो उनके समानांतर शाहरुख खान, अक्षय कुमार भी रहें। परिवार के तौर पर रणबीर कपूर, टाइगर श्रॉफ हैं, तो उनके ठीक समानांतर रणवीर सिंह और राजकुमार राव भी तो हैं। अर्थात जनता को इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता कि आप किसी फिल्मी परिवार से हैं या नहीं, अंततः आपका काम ही महत्वपूर्ण है।

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