मूलवासी भाषाओं पर आधारित था इस साल का नॉर्थ ईस्ट फेस्टिवल 

प्रदूषण भी लोगों को दिल्ली के सबसे बड़े फेस्टिवल, नॉर्थ ईस्ट फेस्टिवल में आने से नहीं रोक पाया। नॉर्थ ईस्ट फेस्टिवल की शुरुआत 2013 में नॉर्थ ईस्ट इंडियंस पर बढ़ते रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (जातीय भेदभाव) की जागरूकता को बढ़ाने और उसे खत्म करने के लिए हुई थी।

7 साल बाद, आज यह दिल्ली का सबसे बड़ा फेस्टिवल बन गया है। इसकी प्रतीक्षा सिर्फ नॉर्थ ईस्ट इंडियंस ही नहीं बल्कि दिल्ली में रहनेवाले संपूर्ण भारत के लोग करते हैं।

मूलवासी भाषाओं पर आधारित

संयुक्त राष्ट्र ने इस साल को मूलवासी भाषाओं का अंतरराष्ट्रीय वर्ष (International Year of Indigenous Languages) घोषित किया है। इस थीम को अमल करते हुए ये फेस्टिवल मूलवासी भाषाओं पर आधारित था।

फेस्टिवल के तीनों दिन- 8,9 और 10 नवंबर को कॉन्फ्रेंस, कला, व्यंजन और गीत-संगीत के स्टॉल्स और कार्यक्रम लगे थे।आखिरी दिन पर भाषाओं की विविधता पर सेमिनार था, जिसने मूलवासी भाषाओं पर खास ज़ोर दिया।

इस साल भाषाओं पर खास ज़ोर दिया गया | फोटो- दीप्ति मिंज

उत्साह और चर्चाओं से सरोबार फेस्टिवल

मैंने फेस्टिवल के तीसरे दिन में भाग लिया। जब मैं इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स (आई. जी. आई. सी. ए.), जनपथ पहुंची, तब फेस्टिवल में भव्य दृश्य था। सुहाने गीत संगीत बज रहे थे, मूलवासी परिधानों में नर्तकियां अपने पारंपरिक नृत्य पेश कर रहे थे, फोटोग्राफी, पेंटिंग्स और क्राफ्ट्स के रंग-बिरंगे स्टॉल्स लगे थे।

लोगों का उत्साह और चहल-पहल देखकर सीधे फूड स्टाल्स की ओर जाने को जी ललचाया लेकिन भाषाओं पर इस महत्पूर्ण सेमिनार को भी मिस नहीं करना चाहती थी।

सेमिनार में तीन बातों पर चर्चा की गई।

  • पहले तो मूलवासी भाषाओं की अहमियत को उजागर किया।
  • दूसरा, इन्हें संरक्षित करने की चुनौतियों को पहचाना और
  • तीसरा, इन चुनौतियों को पार करने के सुझाव पेश किए गए।

फेस्टिवल में “मागी मतंबक्ता”

इस सेमिनार में 2011 के मणिपुरी ट्राइबल फीचर फिल्म, “मागी मतंबक्ता” (उसकी गोद में) दिखायी गयी।

इस फिल्म में एक गरीब लोहार पिता को अपने बेटे को देने के लिए सिर्फ दो दान थे- शिक्षा और संस्कृति। बच्चे ने अपने पारंपरिक बजा-पीना को बजाना सीख कर पूर्वजों के खज़ाने को जिलाया। इसकी बदौलत उसने प्रतियोगिता भी जीत कर जापान जाने का अवसर पाया। फिल्म ने बदलते संदर्भ के साथ ये भी दिखाया कि नए कलाओं को भी सम्मेलित करने की आवश्यकता है। इसलिए परंपरा को भुलाया नहीं, लेकिन नए परिवेश के साथ ढालना ज़रूरी है।

आदिवासियों के वर्तमान भावनाओं को प्रदर्शित करता जितौह के पेंटिंग्स | फ़ोटो- दीप्ति मिंज

भाषाओं की चुनौतियों को जाना

भाषाओं और इसके अध्ययन पर सेमिनार में नॉर्थ ईस्ट के विभिन्न राज्यों के प्रोफेसर, शोधकर्ता, लेखक और कार्यकर्ताओं ने अपनी बात रखी और विचार विमर्श किया।

संरक्षण के चुनौतियों पर बात करते हुए एमिटी यूनिवर्सिटी के डॉ. वालुमिर अमित्युं ने भाषाओं के अनुवाद (ट्रांसलेशन) के दौरान अर्थ के खो जाने पर चर्चा की। उन्होंने नागालैंड के आओ ट्राइब का उदाहरण देते हुए बताया कि आओ भाषा में “धोने” के ५ अलग शब्द हैं। जैसे कपड़े धोने को शितोक, पैर धोने को मेइट, हाथ धोने को मेट्सुक इत्यादि कहेंगे।

यह जानकर मुझे ज्ञान हुआ कि आओ भाषा कितनी विशिष्ट और सटीक है। भाषाओं को संरक्षित करने के लिए ध्यान देना ज़रूरी है कि अनुवाद के समय उनके अर्थ ना खो जाए। अगर, “धोना” यह शब्द का सिर्फ एक शब्द में अनुवाद किया जाए, तो इन ५ शब्दों के साथ साथ, आओ संस्कृति के इतनी विशाल कोश की संस्कृति भी खो जाएगी। इस गर्व को बचाना जरूरी है।

भाषाओं के संरक्षण के लिए बहुत कदम लिए जा रहे हैं। नागालैंड में अखोर संस्था है जो नागालैंड यूनिवर्सिटी में नागालैंड की भाषाओं में बी. ए. और एम. ए. करने का मौक़ा देती है। साथ ही इंडिजेनस ट्राइबल साहित्य सभा ऑफ आसाम और सेंटर फॉर स्ट्डीज ऑफ कार्बी लैंग्वेज जैसी संस्थाओं ने द्वी भाषीय शोब्दकोश और स्कूल में शुरुआती कक्षाओं में ही इन भाषाओं का परिचय करने की सलाह दी है। स्कूल में पढ़ाए जाने से भाषाओं की डॉक्यूमेंटेशन होगी और नए पीढ़ियाँ इन्हें जीवित रखेगी।

मणिपुर की फिल्म मगी मतमबक्ता | फ़ोटो- दीप्ति मिंज

भाषाओं को पुर्नजीवित करने के नए अर्थ पर भी चर्चा हुई। इसपर बात हुई कि पुनर्जीवित का अर्थ सिर्फ पुराने रीतियों को ही बस जिलाना नहीं, पर नए साधनों से नया इतिहास लिखना भी होता है। उदाहरण के रूप में, आज के मॉडर्न वर्ल्ड में भाषाओं को ग्लोबलाइज् करना है।

मूलवासी भाषाओं को स्थानीय या राष्ट्रीय स्तर से और बढ़कर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय बनाने पर बात हुई। इस दिशा में काम करते हुए, बोली को भाषा का तवाजू देने पर विमर्श की गई।

इस सेमिनार ने खतरे में भाषाओं को बचाने के लिए नई उमंग, सोच और योजनाएं दी। सेमिनार इतना मजेदार था कि मैं भूख के बारे में बिल्कुल भूल गई थी। जब सेमिनार खत्म हुआ तो मैं फूड स्टॉल्स की और भागी।

नॉर्थ ईस्ट व्यंजन सिर्फ मोमो नहीं

नॉर्थ ईस्ट व्यंजन के नाम पर हम सिर्फ मोमो के बारे ही जानते हैं। पर यहां 7 राज्यों के अनेकों स्टाल्स में विभिन्न ट्राइब्स के व्यंजन और थालियां लगी थी। बांस के अचार में बना चिकन एक रोचक खोज थी। वैसे ही लाफिंग की बात कुछ और ही थी। पेट भर खाने के बाद, तांबूल पान को कोई कैसे मना कर सकता है? नॉर्थ ईस्ट इंडिया के राज्यों में पाचक क्रिया और ताज़गी के लिए यह पसंदीदा है।

पेट पूजा के बाद, यहां के आर्ट प्रदर्शनी को भेंट दी। मेरी मुलाकात गुवाहाटी की भरगवी बोरूः से हुई। वे बोरूः ट्राइब की हैं और गुवाहाटी से दिल्ली अपने नेल आर्ट को प्रदर्शित करने के लिए आयी थी। (अगर आप उनके आर्ट में रुचि रखते है और उन्हें समर्थन देना चाहते हैं, तो आप उनके आर्ट पीसेज के लिए कॉन्टैक्ट कर सकते हैं।)

धागों को काटियो से जोड़ कर नेल आर्ट्स बनाती भरगवी | फ़ोटो- दीप्ति मिंज

नॉर्थ ईस्ट इंडिया में बिजनेस, उद्योग और पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए भी सेमिनार और मीट्स आयोजित किए गए थे। सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम के फोटो बूथ लगाकर कुछ ऐसे फैलाया मेघालय ने अपने राज्य के पर्यटन को, की मेघालय ने इस साल बेस्ट स्टॉल्स का खिताब भी जीता।

फेस्टिवल के दौरान आप चाहे शॉपिंग कर रहे हों या खा रहे हों, नॉर्थ ईस्ट के टैलेंटेड गायक, गायिकाओं और बेंड्स की मोहक धुन आपको थीरकने के लिए मजबूर कर देगी। मोह मोह के धागे जैसे लोकप्रिय गानों के रचेकर, पापों (अंगराग महानता) ने आसाम के फॉल्क सोंग से लेकर बॉलीवुड के गाने गाए। इसपर क्या नौज़वान, क्या बूढ़े और क्या बच्चे, सब थीरके। इसमें जुबली बोरूः और एच सी हीम्स एंड वॉयड और फ्रिस्की पिंट्स इत्यादि ने परफॉर्म कर लोगों का दिल जीत लिया।

सोशल मीडिया के फोटो बूथ बनाकर किया पर्यटन का प्रचार | फ़ोटो- दीप्ति मिंज

दिल्ली के लोगों ने भी नॉर्थ ईस्ट इंडिया के गाने, खाने और कला का लुफ्त उठाया, उनका सम्मान किया और उनसे विविधता के बारे में जाना। जैसे कि फ़ेस्टिवल के स्थापक ने कहा,

जब नॉर्थ ईस्ट इंडिया के आर्टिस्ट्स हिंदी और अपनी भाषा दोनों में गा सकते हैं, तो ये उनकी विविधता को दर्शाता है। उनके बोल-चाल, रंग-रूप पर टिप्पणियों और हिंसा को खत्म करना होगा।

इसकी मुहिम लोगों ने फेस्टिवल से शुरू की है, और लोगों पर ही खत्म होगी। जैसे नॉर्थ ईस्ट इंडिया के अनेक ट्राइब्स ने भारत को प्यार और समर्थन दिया है, वैसे ही हर एक भारतीय को मूलवासियों को प्यार और समर्थन देना होगा।
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(लेखिका के बारे में: दीप्ती मेरी मिंज (Deepti Mary Minj) ने जेएनयू से डेवलपमेंट एंड लेबर स्टडीज़ में ग्रैजुएशन किया है। आदिवासी, महिला, डेवलपमेंट और राज्य नीतियों जैसे विषयों पर यह शोध और काम रही हैं। अपने खाली समय में यह Apocalypto और Gods Must be Crazy जैसी फिल्मों को देखना पसंद करती हैं। फिलहाल यह जयपाल सिंह मुंडा को पढ़ रही हैं।)

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