एक डरे हुए आम आदमी का लगातार शोषण उसे ‘जोकर’ बना सकता है

हर कलाकार और हर निर्देशक यही चाहता है कि उसकी फिल्म बेहतरीन हो और दर्शकों की उम्मीदों पर खरा उतरे लेकिन दर्शक, जो अपनी एक ही मानसिकता के मालिक हैं, उनकी पसंद पर हमेशा खरा उतरना आसान नहीं होता है, लेकिन फिल्म और उसके दर्शक, अगर दोनों की बात की जाए, तो दोनों ही अपनी-अपनी मानसिकता पर पहरा देते हैं।

कई बार इस तरह भी होता है कि फिल्म के माध्यम से समाज और दर्शक की मानसिकता ही बदल दी जाती है। जैसे कि 1970 के दशक में नायक ओर खलनायक के बीच एक बहुत मज़बूत वैचारिक मतभेद था, जिसकी वजह से नायक ओर खलनायक के किरदार ही बदल जाते थे लेकिन 1990 के दौर में यह मानसिकता बदल गई। जिसका उदाहरण फिल्म बाज़ीगर और डर दोनों है।

खैर, फिल्मों की इस रूपरेखा से मैं बस यही कहने और समझाने का प्रयास कर रहा हूं कि आज के दौर में नायक ओर खलनायक दोनों ही किरदार, फिल्म के पर्दे पर एक ही चरित्र में हो सकते हैं। जहां यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में यह नायक है या खलनायक। कहने का तात्पर्य यह है कि ये विचारधारा गलत है या सही है, जंहा फैसला करना बहुत ही कठिन हो जाता है।

जोकर फिल्म सच में समाज को आईना दिखाती है

अपनी व्यस्त हो रही ज़िंदगी में जंहा फुर्सत के कुछ पल भी बहुत मुश्किल से मिलते हैं, वहां हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म जोकर को देखने का मौका मिला और मुझे यह कहने में ज़रा भी कोताही नहीं कि यह एक बेहतरीन फिल्म थी। एक अरसे से मैंने इस तरह की फिल्म को नहीं देखा था। बेहतरीन अभिनय, बेहतरीन संवाद,  जंहा आवाज़ शांत है और अदाकारी के माध्यम से ही फिल्म का मुख्य कलाकार अपनी बात रखने में कामयाब होता है।

फिल्म की शुरुआत में ही फिल्म का मुख्य नायक जो कि एक जोकर के किरदार में है, खुद को आईने में देखकर, अपनी ही उंगलियों से अपने ही होठों को खींचकर मुस्कुराने की कोशिश कर रहा है। जहां चेहरे पर मुस्कान बनाई जा रही है, वही चेहरे के हाव-भाव, आंखों की परेशानी ओर उसमें से सिसक रहे आंसू, अपनी ही एक बात कह रहे हैं।

यहां निर्देशक बहुत ही सधे हुए लहज़े में यह दिखाने में कामयाब हो रहा है कि समाज में लोग दुखी है और इसकी वजह बहुत हद तक व्यवस्था और समाज में आ रहे बदलाव भी हैं।

जोकर फिल्म का दृश्य, फोटो साभार- सोशल मीडिया

फिल्म बहुत खूबसूरत है। खासकर, फिल्म के दृश्य।  फिल्म की शुरुआत में ही नायक, शहर की सड़क पर, जोकर के रूप में प्रर्दशन कर रहा होता है। यही इसकी आय का मुख्य स्रोत है लेकिन कुछ लड़के जोकर का सामान उठाकर भाग जाते हैं। जोकर उनका पीछा करता है, जिसके बाद वे लड़के जोकर को पीटते है। जोकर फिर भी इसका विरोध नहीं करता।

यंहा विरोध ना करने के दर्शक कई कारण निकाल सकते हैं लेकिन मेरा यह अनुमान है कि जोकर, एक सामान्य इंसान है जो हिंसक नहीं है और ना ही इसका हिंसा में कोई यकीन है।

शानदार निर्देशन जो हर दश्य में समाज की टीस दिखाता है

फिल्म के एक दृश्य में जोकर बस में सवारी कर रहा है और अपनी आगे वाली सीट पर बैठे एक बच्चे को हंसाने की कोशिश कर रहा है लेकिन बच्चे की माँ जोोंकर को इस तरह से करने पर बहुत बुरी तरह से रोकती है।

जोकर फिल्म का दृश्य, फोटो साभार- सोशल मीडिया

यहां निर्देशक बहुत ही गंभीर है और वह समाज पर ही सवाल कर रहा है, जंहा परेशानी इतनी ज़्यादा बढ़ चुकी है कि समाज के दो सामान्य नागरिकों में ही संवाद का रिश्ता खत्म हो गया है। खासकर, जब दोनों ही आर्थिक रूप से तंग है, क्योंकि यंहा निर्देशक इन दोनों कलाकारों को एक सरकारी सामान्य बस में दिखा रहा है।

खैर, इस महिला द्वारा जोकर को टोकने पर, जोकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है। जंहा वह खुद की हंसी को रोकने की बहुत नाकामयाब कोशिश कर रहा है लेकिन वह कामयाब नहीं होता और वह महिला को बताता है कि ये एक बीमारी है, जंहा जब दर्द असहाय हो जाता है तो चेहरे के भाव गंभीर होने की बजाय, हंसी के भाव प्रकट होने लगते हैं।

निर्देशक यहां बहुत चतुराई से मध्यम वर्ग के नागरिक की उपस्थिति पेश करने की कोशिश करता है, जो नाराज है, दुखी है, जिसके पास इतने साधन नहीं है कि वह अपने सपनों को पूरा कर सके। वह अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तो पर व्यतीत कर सके। यहां ध्यान देने की ज़रूरत है कि जोकर के रूप में मौजूद नायक, स्टैंडिंग कॉमेडियन बनना चाहता है लेकिन उसकी हंसने की बीमारी उसे कामयाब नही होने देती है।

आम डरे हुए आदमी का हिंसक रूप

आगे चलकर, जोकर खुद के साथ एक बंदूक रखने लगता है। अब यहां हथियार की मौजूदगी उसकी रक्षा के रूप मे निर्देशक दिखाता है लेकिन जोकर को हथियार रखने की ज़रूरत क्यो पड़ती है? फिल्म जगह-जगह यहां एक नाकामयाब व्यवस्था, समाज में बढ़ रही बेरोज़गारी और गरीबी के कारण भी दिखाती है।

फिल्म में निर्देशक, चुनाव भी दिखाता है जहां दो चुनावी प्रतिद्वंद्वी भी है। मसलन, समाज में लोकतंत्र है लेकिन निर्देशक इसे एक नाकामयाब लोकतंत्र के रूप में दिखाता है, जंहा एक नागरिक को खुद के साथ बंदूक रखने की ज़रूरत महसूस होती है।

फिल्म के निर्देशक और कहानीकार, इसपर ज़्यादा संवाद और बहस नहीं करते हैं। शायद वे इस बात का फैसला दर्शक पर छोड़ते हैं कि क्या एक नागरिक द्वारा खुद के साथ बंदूक रखना जायज़ है या नहीं।

खैर, ये एक अलग बहस का मुद्दा है लेकिन फिल्म अमेरिका की पृष्ठभूमि पर बनी है और आज भी अमेरिका के कई राज्यों में हथियार रखना जायज़ है। अमेरिका में  ये एक बहुत बड़ा मुद्दा है कि नागरिक द्वारा हथियार रखना कहां तक जायज़ है।

एक डरा आदमी जब निडर हो जाए

अब, फिल्म का मुख्य दृश्य, जंहा मेट्रो में जोकर सफ़र कर रहा है और इसके साथ तीन ओर नौजवान और एक महिला भी है। रात का समय है और ये तीनों नौजवान महिला से बदसलूकी करते हैं। महिला एक बार जोकर की तरफ देखती है कि शायद वह उसकी मदद करे लेकिन जोकर जो एक दुबला और शारीरक रूप से कमज़ोर व्यक्ति है, वह महिला की मदद करने में खुद को असहज महसूस करता है। वह महिला वहां से उठकर चली जाती है।

जोकर फिल्म का दृश्य, फोटो साभार- सोशल मीडिया

यहां जोकर की वही हंसने वाली बीमारी प्रकट होती है और जोकर ना चाहते हुए भी हंसने लगता है। जोकर को इस बात का अनुमान है कि वह तीन नोजवान जो पढ़े लिखे हैं, पैंट-कोर्ट में है और शारीरक रूप से बहुत ज़्यादा समर्थ है, उनके सामने जोकर की मौजूदगी एक तरह से ना मात्र है। उसकी हंसी देखकर ये तीनों नौजवान, जोकर की बहुत ही बेरहमी से पिटाई करते हैं।

शायद ये जोकर का आखिरी वक्त होता लेकिन एक समय तक खुद की रक्षा में नाकामयाब जोकर, अपनी हंसी को ना रोक पाने वाला जोकर, अंत में अपनी बंदूक से इन तीनों नौजवानों का कत्ल कर देता है और बहुत तेज़ी से वहां से भाग जाता है।

तीनों नौजवानों का कत्ल, मेरे लिये व्यक्तिगत रूप से इसका समर्थन अथवा असमर्थन करना दोनों ही गंभीर मुद्दे है क्योंकि अगर मैं हिंसा का समर्थन करता हूं, तो मुझे कोई हक नहीं कि मैं 1984 ओर 2002 के कत्लेआम का विरोध करूं, क्योकि यंहा भी हिंसा ही कत्लेआम का एक कारण है लेकिन जोकर और इन दोनों कत्लेआम हिंसा में एक मूलभूत फर्क है। जंहा जोकर खुद की रक्षा में हिंसा का मार्ग चुनता है वहीं 1984 ओर 2002 दोनों जगह, सरकारी व्यवस्था की कत्लेआम में मौजूद भूमिका, हम सब जानते हैं।

फिल्म यहीं से करवट लेती है और जोकर के पास मौजूद बंदूक अब एक ताकत के रूप में दिखने लगती है। अब उसे अपनी कमज़ोरी का और एहसास नही होता है।  वह खुद को ताकतवर समझता है।

हर कोई  हो जाता है ‘जोकर’

फिल्म कई परतों से गुज़रती है और इन तीन नौजवानों का कत्ल, शहर में एक अलग ही मुद्दा बन जाता है। जोकर की लोकप्रियता बढ़ने लगती है। जोकर अब अंत में, एक लाइव शो पर इस बात का खुलासा करता है कि उसने ही इन तीन नौजवानों का कत्ल किया था।

इस शो के होस्ट से वह सवाल  करता है कि वह स्टूडियो में बैठा है और लोगो पर व्यंग्य कस रहा है लेकिन बाहर समाज में, ज़मीनी स्तर पर क्या हो रहा है और एक नागरिक अपनी जीवनी के लिये किस तरह लड़ रहा है, वह शो के होस्ट को नहीं पता है।

फिल्म के अंत में, एक लाइव शो पर जोकर द्वारा शो के होस्ट का कत्ल कर दिया जाता है। फिल्म के अंतरिम भाग में, जब पुलिस जोकर को ले जा रही होती है, तब सड़कों पर मौजूद हजूम जोकर के समर्थन में, जोकर का मुखौटा पहनकर जगह-जगह सड़कों पर आगजनी और लूटपाट कर रहे होते है।

पुलिस और राजनेता दोनों ही भीड़ के शिकार होते हैं और भीड़ द्वारा जोकर को छुड़ा लिया जाता है। यंहा भीड़ में सभी जोकर है और यंहा घायल जोकर झूमता है और खुश होता है। फिल्म का अंत हिंसा है लेकिन फिल्म की शुरुआत में वह कमज़ोर है, जिसे समाज का हर पहलू एक मज़ाक बनाता है।

हिंसा व्यक्तिगत नहीं

फिल्म के अंत को अगर थोड़ा सा ध्यान से देखें तो जोकर के रूप में मौजूद सभी पात्र, भीड़, कौन है? वह एक मध्यमवर्गीय नागरिक हैं, जो कमज़ोर हैं, जिनकी सुनवाई व्यवस्था में नहीं हो रही है। यंहा निर्देशक व्यवस्था और समाज दोनों पर ही गंभीर सवाल उठाता है कि दोनों जगह एक मध्यमवर्गीय और गरीब नागरिक, अपनी मौजूदगी का एहसास नहीं करवा पा रहा है और दोनों ही जगह वह एक हास्य का पात्र बना हुआ है।

फिल्म में हिंसा है लेकिन ये हिंसा किसी की लूटपाट या व्यक्तिगत नहीं है। यह एक नागरिक द्वारा नाकामयाब व्यवस्था और एकाधिकार समाज के खिलाफ हिंसा है, जंहा एक प्रफुल्लित वर्ग समाज की सारी इकाइयों पर विराजमान है। यंहा एक सामान्य नागरिक अपनी मौजूदगी का विकल्प ही ढूंढता रहता है। मसलन, जात-पात जिस तरह से भारतीय समाज में मौजूद है, जंहा एक वर्ग को जात-पात के आधार पर उसके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है। वह भी एक हिंसा है।

हिंसा और समाज के ताने-बाने को हमेशा से दर्शाया है फिल्मों ने

पश्चिम समाज में रंग-भेद भी इसका उदाहरण है। वहीं हिंसा के भी अलग-अलग रूप मौजूद हैं। मसलन, द्वितीय विश्व युद्ध पर बनी फिल्म डारकेस्ट ऑवर में चर्चिल उस समय इंग्लैंड के प्रधानमंत्री, संसद में हिटलर के खिलाफ युद्ध करने की घोषणा करते है और हर तरह की शांतिवार्ता को अस्वीकार करते हैं, क्योकि शांतिवार्ता इग्लैंड के नागरिकों के अधिकारों को बहुत ज़्यादा कम कर रही थी।

उस समय सीधे रूप से इंग्लैंड की व्यवस्था में हिटलर की मौजूदगी का आह्वान था। अब युद्ध का विरोध युद्ध, चर्चिल के फैसले को इग्लैंड की जनता और शाही परिवार दोनों का समर्थन मिलता है, अब हिंसा का विरोध हिंसा, यह भी एक बहस का मुद्दा है और समाज इसकी स्वीकृति भी देता है लेकिन अगर दुनियाभर में हुये कत्लेआम को समझा जाए तो ये भी हिंसा के बदले हिंसा की पृष्ठभूमि पर है।

जोकर फिल्म का दृश्य, फोटो साभार- सोशल मीडिया

समाज में मौजूद असुरक्षा को भी एक कारण बनाया जाता है लेकिन हिंसा का प्रयोजन कौन करता है, इस पर कभी बहस नहीं हुई, क्योंकि इस असुरक्षा ओर हिंसा का मूलभूत कारण व्यवस्था है और व्यवस्था जो की हिंसा का मूल कारण है, वह कभी भी अपने पर आंच नहीं आने देती है, क्योंकि न्यायपालिका और न्यायिक ढांचे पर एक तरह से व्यवस्था का ही एकाधिकार है।

हिंसा के कई रूप हैं और यह बड़ा और उलझा हुआ मुद्दा है। फिल्म हिंसा को दिखाती है लेकिन फिल्म दुनियाभर में बहुत सराही गई है और व्यवसायिक रूप से फिल्म बहुत कामयाब भी हुई है। जैसे कि फिल्म को हमारा समाज स्वीकृति दे रहा है।

व्यक्तिगत रूप से मैं फिल्म और समाज में मौजूद किसी भी प्रकार की हिंसा के खिलाफ हूं लेकिन हिंसा के कारण जो कि अपनी मौजूदगी नहीं दिखाते उनपर भी एक आज़ाद आवाज़ में विरोध होना ज़रूरी है। अगर ये नहीं होगा तो जोकर के रूप में मौजूद पात्र को नकारा नहीं जा पाएगा।

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