शाबाश गुड़िया तुमने बुझे चिरागों से अपना घर रोशन किया

यह कौन है, जो हमारी दीपावली के जश्न को भंग करने आ गई? यह कौन है जो लौह पुरुष की जयंती के उत्साह को धूमिल करने की कोशिश कर रही है? यह किस लोक की प्राणी है, जिसमें इतनी हिम्मत कि अयोध्या में दीपावली पर जलाये गए दियों में तेल जमा कर रही है।

यह आठ दस साल की गरीब लड़की शायद हमारी किसी ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओं’ योजना का हिस्सा नहीं होगी, बाल बिखरे हैं, चेहरा तो देखो लगता है कि गरीबी के आंसू अभी थोड़ी देर पहले सूखे हों और बोतल में कितना तेल जमा कर लिया है।

हे राम, वह भी उन दियों से जिनसे हमने अभी-अभी विश्व रिकॉर्ड बनाया है।

कितने खुश थे हम इस रिकॉर्ड को बनाकर लेकिन इस लड़की ने सारा मज़ा किरकरा कर दिया और विपक्ष के नेताओं को देखों उन्हें यह पांच लाख दिए नहीं दिखे, दिखी तो सिर्फ यह तेल जमा करती लड़की। जब लड़की से इतनी हमदर्दी है, तो खुद जाकर उनके घर तेल दान कर आते क्यों फालतू में महाराज जी को टारगेट कर रहे हैं?

अयोध्या में दिये से तेल की बॉटल भरती लड़की, फोटो साभार- ट्विटर

वायरल होता छोटी लड़की का अंधेरा

आजकल सोशल मीडिया पर आपने भी एक फोटो और वीडियो घूमती हुई देखी होगी। दरअसल, दिवाली के मौके पर अयोध्या में 5 लाख से अधिक दिये जलाए गए। दिये जलाकर अयोध्या में धूमधाम से दिवाली मनाई गई।

इसके बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो एक छोटी लड़की का है। वीडियो में दिखाई दे रहा है कि लड़की बुझे हुए चिरागों का तेल बोतल में जमा कर रही है। शायद उसे अपने पेट का अंधेरा दूर करना होगा वरना बुझे चिराग किसका अंधियारा दूर करते हैं।

जो लोग इस वीडियो को शेयर कर रहे हैं उन्हें सरकार की नाकामी चाहिए। वरना देश के प्रधानमंत्री ने हाउडी मोदी प्रोग्राम से सारी दुनिया को बता दिया था कि भारत में सब कुछ अच्छा चल रहा है। हालांकि इसके बाद वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) ने भुखमरी से जूझ रहे 117 देशों की रिपोर्ट जारी की थी और रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 102वें नंबर पर है। जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान (94वें), बांग्लादेश (88वें), नेपाल (73वें) और श्रीलंका (66वें) भारत से बेहतर स्थित में हैं।

सरकार के लिए यह अकाल कमाल का अवसर है

खैर, हम ऐसी रिपोर्ट को एजेंडा कहते हैं और शाम को डीएनए में एक आदमी काले कोट में आकर सब दूध का दूध पानी का पानी कर जाता है। वह बता देता है कि ये पश्चिमी मीडिया का सोचा समझा एजेंडा है। वरना गरीब मज़े में है, किसान चांदी काट रहे हैं और मज़दूर बर्गर खा रहे हैं। शायद ही किसी मीडिया चैनल ने यह खबर प्रसारित की हो इसलिए आप आसानी से समझिए। मीडिया का खबरों का ये अकाल हमें बताता है कि कैसे व्यवस्था और सरकार के लिए यह अकाल कमाल का अवसर है।

खैर, बात दिए और बाती की हो रही थी। बात थी तेल की, तो हमें गर्व होना चाहिए कि इस बार दिवाली पर 12 हज़ार लीटर तेल से अयोध्या में जगमग हुई अयोध्या महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। आपको पता भी है कि दियों को जलाने के काम में आने वाली पांच लाख रुई की बत्ती लखनऊ से मंगाई गई थी?

एक दिए में दो बाती थी ताकि अगर एक बुझ जाये तो दूसरी बाती विश्व रिकॉर्ड को संभाल ले। बताया जा रहा है कि सरकार ने इस रिकॉर्ड के लिए खज़ाना खोल दिया था। अब आगे अगर कोई दूसरी सरकार आई और उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे क्या कहा जायेगा? आप खुद समझ सकते हैं।

दिवाली पर अयोध्या की तस्वीर, फोटो साभार- ट्विटर

गरीबों की आवाज़ कौन सुनेगा?

दरअसल, यह गरीब भी खबरों में बनने की कोशिश तो करते हैं, पर कोई इन्हें बनाता नहीं है क्योंकि इन गरीबों को चीखना नहीं आता। इन्हें ललकारना नहीं आता। अगर आता भी है तो उनकी आवाज कौन सुनेगा? हमेशा की तरह उनकी चीख, भूख और ललकार की बन्दरबांट ये नेता आसानी से कर लेते हैं।

भले ही कोई दाना मांझी अपनी पत्नी अमंग देई की लाश कंधे पर ढोता रहे, किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है? देश में इतनी जयंती और पुण्यतिथि आती हैं कि सरकारों का अधिकांश टाइम तो उन्हीं में निकल जाता है।

गरीब और गरीबी की बात कहने सुनने के लिए सिर्फ चुनाव का एक महीना मिलता है। चुनाव खत्म गरीब, गरीबी, रोजी, रोटी, खेती-किसानी, मजदूरी सब मुद्दे खत्म। फिर हिन्दू मुसलमान, भारत पाकिस्तान, रामलला बाबरी, नेहरु पटेल, गोडसे गाँधी शुरू।

कहने को देश बदल रहा है, परिवर्तन के नारों से आकाश तक आतंकित हो रहा है परन्तु दियों से तेल जमा करती लड़की, लाश ढोते दाना माझी या रोटी के लिए आदिवासी युवक मधु की भीड़ द्वारा पीट-पीट कर हत्या जैसे अनगिनत नागरिक जीवन के समंदर में गरीबी को उठाए दौड़ रहे हैं।

कुछ जिंदा है, कुछ मर गये। शाबास तेल जमा करती मासूम गुडिया हमें तुम पर गर्व होना चाहिए कि तुमने बुझे चिरागों से अपना घर रोशन किया।

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