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CAA के विरोध पर गिरफ्तार इस दंपत्ति को उनके दुधमुंहे बच्चे से मिलने नहीं दिया गया

बनारस प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है। बनारस में एक बार पीएम ने कहा था कि उन्हें माँ गंगा ने बुलाया है और वे अपनी माँ की सेवा करने आए हैं। उसी बनारस में कुछ बच्चों को उनके माँ-बाप की ज़रूरत है लेकिन वे अपने माँ-बाप से नहीं मिल सकते हैं। दरअसल, बनारस में 19 दिसंबर को सिटीज़नशिप एक्ट और NRC का शांतिपूर्ण विरोध करने वाले 64 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था।

पुलिस ने उन पर कई तरह के ज़मानती तथा गैर ज़मानती मुकदमें लाद दिए। उन 64 लोगों में से लगभग 20 लोग बीएचयू के छात्र हैं। कुछ छात्र काशी विद्यापीठ के भी हैं। कुछ बनारस की सिविल सोसाइटी के लोग भी शामिल हैं।

रवि और एकता का एक साल का बच्चा है

इन 64 लोगों में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनका एक साल का दुधमुंहा बच्चा घर पर उनका इंतज़ार कर रहा है, एक की पत्नी बीमार है और एक महीने का बच्चा है जो उनका इंतज़ार कर रहा है। इस दौरान इन्हें किसी से मिलने भी नहीं दिया जाता था। जब इन लोगों ने भूख हड़ताल पर जाने की बात कही, तब जाकर इन्हें लोगों से मिलने की अनुमति दी गई।

रवि और एकता अपने बच्चे के साथ

रवि और एकता पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं। ये एक NGO के माध्यम से देशभर में पर्यावरण बचाने की मुहिम चला रहे हैं। ये पति-पत्नी भी हैं और इनका एक साल का एक बच्चा भी है।

19 दिसंबर को सिटीज़नशिप एक्ट और NRC के विरुद्ध बनारस के बेनियाबाग में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन का आयोजन किया गया। ये दोनों भी उस शांतिपूर्ण विरोध में हिस्सा लेने गए। इन्हें क्या मालूम था कि ये अपने बच्चे को अगली बार ना जाने कब देखेंगे? वहां पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार किया और जेल में डाल दिया। ये आज तक जेल में बंद हैं।

वे क्यों विरोध कर रहे थे? वे इसलिए विरोध कर रहे थे ताकि आने वाली पीढियां खुली और आज़ाद हवा में सांस ले सकें। उनके बच्चे इस नफरती माहौल में ना रहें, जहा हमेशा डर का माहौल बना रहे। वे अपने बच्चों तथा आने वाली पीढ़ियों को मुहब्बत से भरा समाज देना चाहते हैं।

दिवाकर का भी है एक माह का बच्चा

दिवाकर बीएचयू आईआईटी में रिसर्च स्कॉलर हैं। इनकी पत्नी पिछले 6 महीने से बीमार थी। इसी दौरान एक महीने पहले उन्हें एक बच्चा हुआ। उसके बाद पत्नी ICU में चली गई। कुछ दिन पहले ही ICU से बाहर आई है। आज जब दिवाकर की पत्नी और बच्चे को उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तो दिवाकर उनके साथ नहीं हैं, क्यों? क्योंकि दिवाकर सिर्फ अपनी पत्नी या बच्चे का भविष्य नहीं सोच रहे हैं।

दिवाकर

दिवाकर आने वाली नस्लों का भविष्य देख रहे हैं। दिवाकर नहीं चाहते कि आने वाली नस्लें नफरत और घृणा में रहें। वो इस समाज को प्रेम और मुहब्बत के पानी से सींचना चाहते हैं। वो समाज में जहर नहीं फैलने देना चाहते। वो समाज को डर में जीने देना नहीं चाहते।

BHU के छात्रों ने अपना दीक्षांत समारोह छोड़ा

इन के अलावा बीएचयू के कुछ बच्चे ऐसे हैं जिनकी परीक्षाएं छूट गई हैं। राज अभिषेक और दीपक सिंह नामक दो ऐसे जूझारू छात्र भी हैं जिनको बीएचयू में आज 23 दिसंबर को दीक्षांत समारोह में डिग्री लेनी थी लेकिन उनके लिए दीक्षांत समारोह से ऊपर था देश और देश का आपसी भाईचारा।

इनके लिए इनके गुरूओं द्वारा गलत को गलत कहने का जो ज्ञान दिया गया है, वे दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने से ज़्यादा ज़रूरी था। इनके लिए देश को, विश्वविद्यालयों को बचाना डिग्री लेने से ज़्यादा ज़रूरी लगा। इसलिए ये लोग इस विरोध प्रदर्शन में गए और आज पुलिस ने इनको जेल में बंद करके रखा हुआ है।

इन छात्रों में कुछ छात्र ऐसे भी हैं, जिनको पुलिस ने बेनियाबाग पहुंचने से पहले ही उठा लिया और जेल ले गई। इन आठ छात्रों पर पुलिस ने अलग से FIR दर्ज की है। इन आठ छात्रों की FIR की कॉपी अभी तक किसी को नहीं मिली है। पुलिस ने इनसे एक सादे कागज़ पर ज़बरदस्ती हस्ताक्षर भी करा लिया है।

कौन है ये छात्र?

अब सवाल यह है कि ये छात्र कौन है? इनमें से एक हैं विवेक सिंह जो बिहार के रहने वाले हैं। इन्हें कुछ दिन पहले ही पुलिस ने इसलिए मारा था क्योंकि इन्होंने उस वक्त पुलिस के अत्याचार का विरोध किया था। पुलिस लंका पर चाय बनाने वाले, ठेला लगाने वाले रेहड़ी-पटरी मज़दूरों को हटा रही थी, उनके सामान तोड़ रही थी, उन्हें मार-पीट रही थी।

उस दौरान इन्होंने विरोध किया था तो पुलिस ने उस वक्त भी इन्हें थाने ले जाकर बहुत मारा था। आज जब पूरे देश में नफरत फैल रही है। पूरा देश जल रहा है। ऐसे में इनसे नहीं रहा गया। यह अपने देश को नफरत की आग में जलता नहीं देख सके और सड़कों पर आ गए। इसलिए आज यह जेल की सलाखों में कैद हैं।

इन सारी बातों कछ साथ कई सवाल भी हैं।

इसका मतलब की अगर CAA और NRC गलत है तो उसके खिलाफ आवाज़ उठानी ही होगी और अगर गलत को गलत कहने पर लोगों को जेलों में डाला जाने लगे, तो फिर समझ लीजिये की देश खतरे में है। हमारे मनीषियों की तपस्या खतरे में है।

कौन लेगा ज़िम्मेदारी?

हमारे पुरखों ने हमारे लिए जो प्रेम और विविधतापूर्ण समाज बनाया है, वह खतरे में है। हमारे पूर्वजों की धरोहर खतरे में है। हमारा इतिहास खतरे में है। हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति खतरे में है और हमें इसे बचाने की लड़ाई लड़नी होगी।

अब सवाल यह है कि

इन सब के साथ ही सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अब लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना भी अपराध हो गया है। बनारस प्रधानमंत्री का लोकसभा क्षेत्र है। भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े अधिकारी का क्षेत्र। वहां अगर इस तरह लोकतंत्र की हत्या की जाए तो फिर लोकतंत्र की बात ही बेमानी हो जाएगी।

बनारस में पिछले एक साल में सिर्फ 6 दिन ही बिना किसी बंधन के बीते हैं। बाकि समय बनारस में धारा 144 लागू रही। इस बात से ही आप अनुमान लगा सकते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर किस तरह से लोकतंत्र का गला घोंट रही हैं।

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