गोंडी भाषा को जीवित रखने के लिए कैलेंडर की यह रोचक पहल

आदिवासियों की पहचान उनकी संस्कृति व सभ्यता से होती है। संस्कृति के प्रकार इतने हैं कि हर जनजाति दूसरी जनजाति से भिन्न है। जितनी जनजातियां, उतनी प्रकार की संस्कृतियां और उतनी ही प्रकार की भाषाएं।

आज आदिवासी संस्कृति खतरे में है। बरसों से उन्हें परिवर्तित करने का प्रयास होता रहा है। बिरसा मुंडा ने जो धर्मांतरण के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उसे आदिवासी इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में पढ़ा जाता है। कभी-कभी परिवर्तन सांस्कृतिक आदान-प्रदान से स्वतः ही हो जाते हैं, तो कभी-कभी समाज के लोग अपनी संस्कृति के बारे में नहीं जानना चाहते हैं।

हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि हमारी विशिष्टता व भिन्नता ही हमें आदिवासी बनाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations) द्वारा दी गई Indigenous People की परिभाषा भी यही दर्शाती है।

यदि हम अपनी संस्कृति संरक्षित करके नहीं रखेंगे, उसे अपनाएंगे नहीं, तो हम आदिवासियों की सूची से ही निकाल दिए जाएंगे। यह बात सर्वोच्च न्यायालय ने Anjan Kumar V. Union of India [AIR 2006 SC 1177] मामले में साफ-साफ कहा था।

एक संस्कृति के संरक्षण में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों में एक उसकी भाषा होती है। मैं यह पहले भी कह चुकी हूं और अब भी कहूंगी कि UNFPII के अनुसार हर 2 हफ्तों में 1 ट्राइबल भाषा विलुप्त होती है, इसलिए हमें अपनी भाषा को सीखना व उसका प्रचार करना अत्यावश्यक है।

गोंडवाना कैलेंडर से संरक्षित की जा रही है आदिवासी भाषा

इस लेख के माध्यम से मैं आप सबके साथ गोंडी भाषा का प्रचार करने, समाज के लोगों में भाषा की जागरूकता बढ़ाने के लिए की गई एक अनोखी पहल के बारे में बताना चाहूंगी। मैं बात कर रही हूं गोंडवाना कैलेंडर की, जिसके संस्थापक सुभेदार प्रदीप मंडावी जी हैं और संपादक रमेश ठाकुर जी हैं। इनके द्वारा शुरू की गई पत्रिका गोंडवाना दर्शन भी हमें पढ़नी चाहिए।

इस कैलेंडर की खास बात यह है कि इसमें दिनांक, दिन व महीनों को गोंडी भाषा में लिखा गया है। साथ-ही-साथ उस माह में आने वाले तीज-त्यौहारों की तारीख व महत्वपूर्ण दिवसों के बारे में भी लिखा गया है।

यह इस कैलेंडर का मुख्य पृष्ठ है। फोटो- प्रज्ञा उईके

इसके अलावा गोत्र के नाम, उनका अर्थ व कुल चिन्ह की भी जानकारी दी गई है। गोत्र वंश का प्रतीक है, इसलिए गोंड जनजाति में जो गोत्र रहता है, वही हमारा उपनाम भी रहता है। इसमें 12 राशियों को क्या कहा जाता है, यह भी बताया गया है। उदाहरण- मिथुन राशि को “गेट” कहा जाता है, कर्क राशि को “खेकड़ा” कहा जाता है, आदि।

इतना ही नहीं, इसमें समाज के बारे में महत्वपूर्ण चीज़ें भी दी गई हैं, जैसे गोंडी ध्वज का महत्व व उसमें इंगित चीज़ों का महत्व, गोंडी धर्म के पवित्र स्थल, शादी, नृत्य, आदिवासी वीर-वीरांगनाओं और कुछ ऐतिहासिक खबरों के बारे में भी जानकारी दी गई है। इसके साथ-ही-साथ बाबा साहेब अंबेडकर के विचारों को हर पृष्ठ में लिखा गया है। समाज के लोगों को उनके आदर्शों से परिचय कराना बेहद महत्वपूर्ण है।

गोंडवाना ध्वज। सोर्स- https://bit.ly/2ErDVoO

 

यह बात सत्य है कि ज़्यादातर आदिवासी खेती-किसानी, मज़दूरी, सरकारी पेशा या राजनीति के अलावा कुछ और नहीं करते हैं। कुछ ही ऐसे होंगे जो अन्य चीज़ें करने की कोशिश करते हैं।

उन अन्य चीज़ों में सबसे महत्वपूर्ण है व्यवसाय। हमें अपने लोगों को व्यवसाय में आगे आने के लिए प्रेरित करना होगा। इस कैलेंडर की सबसे अच्छी बात यह कि इसमें गोंड समाज के लोगों के व्यवसाय का विज्ञापन भी है, इससे लोग प्रेरित भी होंगे व उनका प्रचार भी होगा।

मैं बाकी जनजातियों से भी अनुरोध करना चाहूंगी कि आप भी अपनी भाषा में ऐसे कैलेंडर बनाइए। यह हमारी संस्कृति संरक्षित रखने की, हमें जागरूक रखने की, हमारे सशक्तिकरण के लिए की गई अनोखी पहल है।

गोंडवाना कैलेंडर के लिए सम्पर्क करें रमेश ठाकुर को, 9424125724 नंबर पर, या फिर ऊपर दिए कैलेंडर का मुख्य पृष्ठ पढ़ें।

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लेखिका के बारे में- प्रज्ञा उईके लेखिका और कवयित्री हैं। यह हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, रायपुर से वकालत की पढ़ाई कर रही हैं। यह गोंड जनजाति से ताल्लुक रखती हैं। इन्हें सामाजिक मुद्दों (आदिवासी, वंचित समुदाय और जेंडर भेदभाव जैसे मुद्दे) पर लिखना पसंद है। आप इन्हें ट्वीटर पर भी फॉलो कर सकते हैं- @PragyaUike

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