क्या हिन्दू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए सरकार नागरिकता कानून लाई है?

इस दुनियां में ऐसी कोई जगह नहीं है जहां सिर्फ एक जाति, एक धर्म या एक रंग के ही लोग रहते हों। हर जगह विविधताएं हैं। दुनिया जब राजतंत्र को त्यागकर लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ रही थी, तब लोगों के अंदर एक अलग प्रकार का उत्साह था। आज भी यह उत्साह मध्य पूर्व देशों में देखने को मिलती है।

सत्ताधीशों के नशे की ज़द्द में है प्रजातंत्र

अमित शाह और नरेन्द्र मोदी
अमित शाह और नरेन्द्र मोदी। फोटो साभार- सोशल मीडिया

सत्ता के नशे में राजतंत्र जब जब आया, तब तब जनता का दमन किया जाता रहा है। आज जब हम लोकतंत्र में सांसें ले रहे हैं, तो भी सत्ता के नशे में सत्ताधीशों ने आम जनता का समय-समय पर दमन किया है। इसमें कोई शक नहीं कि लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं है।

राजनीति और लोकतंत्र की समझ रखने वालों ने भी हमेशा यह स्वीकारा है कि लोकतंत्र के कई नकारात्मक पहलू भी हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी कहा था कि संविधान महज़ एक किताब साबित होगा अगर इसे लागू करने वाले लोग अधर्मी हों। भारत के इस दौर के हालात को देखकर डॉ. बी. आर. अंबेडकर की दूरदृष्टि का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। भारत की आवाम इसके विरोध में सड़कों पर है। संपत्ति, भाईचारा और अर्थव्यवस्था की बलि चढ़ रही है।

स्वाभाविक है विरोध प्रदर्शन

नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन। फोटो साभार- सोशल मीडिया
नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन। फोटो साभार- सोशल मीडिया

नागरिकता कानून भारत के संविधान के विपरीत है। भारत की धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और विविधता खतरे में है। यूं कहें कि मानवता की बलि चढ़ाने हेतु पूरी तैयारी हो चुकी है।

अनुच्छेद 370, तीन तलाक और राम मंदिर के पक्ष में फैसले के खिलाफ विरोध नहीं हुए। जनता इन मुद्दों से तंग आ चुकी थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने बोतल से CAB नामक एक नया जिन्न निकाल दिया है। अब चुप रहना मानवता और खुद को शर्मसार करने वाला होगा।

नागरिकता कानून में सिर्फ 6 धर्म हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसियों को रेखांकित किया गया है। जो अपने आप में यह साबित करता है कि भाजपा ध्रुवीकरण के हथकंडे छोड़ने को तैयार नहीं है।

21वीं सदी में ध्रुवीकरण शर्मनाक

नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन। फोटो साभार- सोशल मीडिया

राजनीतिक पार्टियां जब शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, भोजन और अर्थव्यवस्था ठीक नहीं कर पाती हैं, तो उनके पास ध्रुवीकरण का ही सिर्फ एक हथियार बचता है। 21वीं सदी में भी अगर हम ध्रुवीकरण का शिकार हो रहे हैं, तो यह शर्म की बात है। सरकार की नोटबंदी को लेकर नाकामी सबने देखी है। 99% के करीब जब पैसे बैंकों में जमा हो गए तो आप ही बताइए कि काला धन कहां था?

जीएसटी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है, यह तो पूरा जगत जनता है। नोटबंदी और जीएसटी ने मिलकर अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बिल्कुल धीमा कर दिया है। जीडीपी नतीजे के रूप में आपके सामने है। कई सारी फैक्ट्रियां और लघु उद्योग नोटबंदी की बलि चढ़ गए। लोग दवाईयों के बिना मरे सो अलग।

CAA को लेकर कई सवाल उठते हैं। जैसे- बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र क्या सरकार नागरिकता संशोधन कानून लेकर आई है? क्या हिंदू मतदाता को अपने पक्ष में लेने के लिए सरकार ने पूरे देश में आग लगा दी? लेकिन शरणार्थी सिर्फ शरणार्थी होते हैं। नागरिकता धर्म के आधार पर नहीं दी जा सकती है।

तीन ही मुल्क के लोगों को नागरिकता क्यों?

अमित शाह
गृहमंत्री अमित। फोटो साभार- Twitter

नागरिकता कानून में सिर्फ 6 धर्मों के लोगों को शामिल करने से सवाल यह भी उठता है कि क्या पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर ज़ुल्म नहीं होता? क्या बर्मा में मुसलमानों पर अत्याचार नहीं होता? क्या चीन के विगर मुसलमान शोषित नहीं हैं? क्या बांग्लादेश के सुधारवादी मुस्लिम परेशान नहीं हैं? सरकार पाकिस्तान की अहमदिया, चीन के विगर, बर्मा के रोहिंग्या और बांग्लादेश के सुधारवादी मुस्लिमों की अनदेखी क्यों कर रही है?

मानवता और संयुक्त राष्ट्र के नियमानुसार जो भी आपकी शरण में प्रताड़ित होकर आता है, उसे शरण देना आपका कर्तव्य है। उसकी जाति, धर्म और रंग देखकर फैसला नहीं किया जा सकता।

यूरोप, अमेरिका और अन्य कई देशों में भी प्रवासियों को शरण दी गई है। सीरिया और इराक जैसे देशों में उथल-पुथल के बाद वहां की जनता ने कई देशों में शरण ली है। अगर भारत की तर्ज़ पर दुनिया शरणार्थियों को निकालना शुरू करे तो याद रखें भारत के लोग दुनिया के कोने-कोने में बसे हुए हैं। उदाहरण के लिए कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन हर जगह भारतीय मौजूद हैं। वहां तो वे लोग चुनाव भी लड़ते हैं। उन्हें  मंत्रालय में भी शामिल किया जाता है।

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से हिंदू-मुस्लिम एकता की नींव को तार-तार किया है, मुझे नहीं लगता है कि इसकी भरपाई जल्द हो पाएगी। सच तो यह है कि ध्रुवीकरण की राजनीति ने लोगों को इस तरह से बरगलाया है कि लोग सच सुनने को तैयार ही नहीं हैं।

नेताओं की बात कौन करे? उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भी सच सुनने को तैयार नहीं हैं। शायद इसलिए तमाम सुरक्षाकर्मियों के रहते हुए बाबरी मस्जिद ढहा दी गई। अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों को लोग भेदभाव की तरह पेश करने लगे हैं। पता नहीं लोग समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते कि वह भेदभाव नहीं सुरक्षा की दृष्टि से दिया गया अधिकार है। 

भारत ऐसे ही नहीं हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बंट गया

हिन्दुत्व की राजनीति
प्रतिकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

हमारा देश ऐसे ही नहीं हिंदुस्तान और पाकिस्तान के दो टुकड़ों में बंट गया। जिस तरह आज हिंदुओं के एक बड़े तबके को गुमराह कर दिया गया है, हिंदू-मुस्लिम खुद को अलग-अलग समझने लगे हैं। उसी तरह आज़ादी के पूर्व भी हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ने हिंदू-मुस्लिम को खुद की लालसा पूरी करने हेतु अपने-अपने पक्ष में खड़ा कर लिया था।

आज दोनों धर्मों के लोग एक-दूसरे के सामने खड़े नज़र आते हैं। इससे ज़्यादा भयावह स्थिति तब की थी। “टू नेशन थ्योरी” के लिए हिंदू महासभा, मुस्लिम लीग के साथ-साथ तमाम इस तरह के छोटे-मोटे संगठन ज़िम्मेदार थे। सब खंडित क्षेत्र पर अपनी-अपनी हुकूमत और अपने धर्म का दबदबा कायम होने के सपने पाले हुए थे।

भारत के साथ सुकून की बात यह थी कि यहां गाँधी, नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, पटेल और डॉ. बी आर अंबेडकर जैसे महान लोग थे जिन्होंने भारत को अपनी परंपरा के अनुरूप दुनिया के लिए एक नई मिसाल कायम करते हुए एक संगठित और विविध रूप दिया। जिसे आज सत्ता के लालच में राजनीतिक पार्टियां फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए तैयार हैं।

हमाम में सब नंगे

एक कहावत ‘हमाम में सब नंगे’ की मिसाल भारत की राजनीति में राजनितिक दलों के लिए पूरी तरह फिट बैठती है। तमाम राजनीतिक दल ध्रुवीकरण करते हैं और किया भी है लेकिन भाजपा तो इस नंगई में सबसे आगे है। सब सत्ता का खेल चल रहा है।

केंद्र शासित भाजपा को लगा था कि एनआरसी से मुस्लिम प्रभावित होंगे लेकिन एनआरसी के तहत बाहर हुए लोगों में मुस्लिम की तुलना में हिंदू समुदाय के लोग अधिक हैं। तब भाजपा को लगा इससे बंगाल के साथ-साथ पूरे भारत में भी हमें नुकसान हो सकता है। इसलिए एक नया मोड़ CAB खड़ा किया गया, जिसका नतीजा CAA सबके सामने है।

बीजेपी शासित केंद्र सरकार को अब भी लग रहा है कि विरोध की आग धीरे-धीरे ठंडी हो जाएगी और हम अपने मंसूबे में कामयाब हो जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि इस विरोध में सभी समुदाय के लोग शामिल हैं। अब देखना यह है कि सरकार अपना रुख बदलती है या चिंता की जलती हुई आग धीरे-धीरे ठंडी हो जाती है।

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