कॉल दरों की वृद्धि से क्या फायदे हो सकते हैं

पिछले महीने वोडाफोन और एयरटेल को वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में हुए नुकसान का भुगतान अब ग्राहकों को करना पड़ेगा। दोनों ही कंपनियों ने अपने कॉल और डेटा की दरे बढ़ा दी हैं। आज से कॉल और डेटा की दरों में 50% का इज़ाफा कर दिया गया है। बढ़ी दरों में वॉयस कॉल की दरें भी शामिल हैं।

इसके साथ ही टेलिकॉम इंडस्ट्री में टॉप पर चल रही कंपनी जियो ने भी अपनी दरों में 40% तक वृद्धि की घोषणा की है। यह वृद्धि 6 दिसबंर से लागू होगी। कंपनियों ने यह रेट चार साल में पहली बार बढ़ाया है।

क्यों कंपनियों को रेट बढ़ाने का करना पड़ा फैसला-

कुछ साल पहले देश में टेलिकॉम इंडस्ट्री में कई कंपनियों की भीड़ थी। 8 बड़ी कंपनियों के अलावा क्षेत्रीय स्तर पर भी कुछ कंपनियों ने अपना बिज़नेस शुरू किया था लेकिन धीरे-धीरे अधिकतर कंपनियां बंद होती गईं।

हालांकि फिर भी जियो के आने से पहले बाज़ार में 8 प्लेयर्स बने हुए थे लेकिन जियो ने बाज़ार पर कब्ज़ा जमाया और बात वही हुई, बड़ी मछली छोटी मछली को खा गई। अब बाज़ार में जियो को मिलाकर सिर्फ 4 कंपनियां बची हुई हैं, जियो, एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और BSNL

अब इसमें BSNL की बात करना तो पूरी तरह बेइमानी ही होगी। इकलौती सरकारी टेलिकॉम कंपनी BSNL की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है।

अब मार्केट में प्रतियोगी के रूप में बची सिर्फ 3 कंपनियां-

अब इनमें से भी एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया ने पिछले सप्ताह ही अपने घाटे की घोषणा कर दी थी। वोडाफोन आइडिया को वित्त वर्ष (2019-20) की दूसरी तिमाही में 50,922 करोड़ रुपये का वित्तीय घाटा हुआ है। कंपनी का तिमाही घाटा भारत के इतिहास में अब तक का सबसे खराब नुकसान है। वहीं टेलिकॉम कंपनी भारती एयरटेल को चालू वित्त वर्ष की जुलाई-सितंबर तिमाही में 23,045 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ है।

AGR Verdict- सुप्रीम कोर्ट के AGR Verdict से भी इन कंपनियों पर बोझ बढ़ा है। इसके तहत टेलिकॉम कंपनियों को सरकार के 92,641 करोड़ रुपये बकाये के भुगतान के निर्देश दिए गए हैं। एयरटेल को 21,700 करोड़ रुपये, जबकि वोडाफोन-आइडिया को 28,300 करोड़ रुपये के भुगतान करने के निर्देश दिए गए हैं।

कंपनी की दरों के बढ़ने से होगा ग्राहकों को फायदा

Cellular operators Association के अनुसार,

  • 2014 में जियो से आने से पहले 1 GB डेटा के लिए ग्राहकों को 269 रुपए का भुगतान करना पड़ता था।
  • लेकिन 2016 में जियो के आने के बाद यह दर घटकर 11.78 हो गई, कॉलिंग रेट तो फ्री हो गई।

दरों की इस प्रतियोगिता में खुद को बनाए रखने में कुछ कंपनियां तो बंद ही हो गईं। एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया कंपनी को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। कंपनियों की आय घटने लगी। इसका असर उनकी सर्विस पर भी दिखने लगा, जैसे- उनका टावर ठीक से काम ना करना, 5G की सर्विस योजना के क्रियान्यवयन में विलंब होना। पैसे की कमी की वजह से कर्मचारियों की संख्या में कमी, जो कहीं ना कहीं उनकी सर्विस को प्रभावित कर रही है।

  • अब आय बढ़ने से ये कंपनियां इन सुविधाओं की तरफ अपना पैसा लगा सकती हैं।
  • नए टावर लगाने से लेकर पुराने टावरों की मरम्मत पर ध्यान दिया जा सकता है।
  • 5G की सर्विस की योजना को गति मिल सकती है।
  • नए कर्मचारियों की बहाली से सर्विस क्वालिटी में इज़ाफा होगा।

एकाधिकार के वर्चस्व का खतरा

अगर ये कंपनियां अपने पैसे नहीं बढ़ाती तो ये डूब जाती और मार्केट में जियो का एकाधिकार होता। यह हमें पता ही है कि जब किसी कंपनी का किसी क्षेत्र में एकाधिकार होगा तो वह अपनी मनमर्ज़ी चलाएगी। ग्राहकों को अपने फायदे के अनुरूप सर्विस उपलब्ध करवाएगी। तो ऐसे में एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया की दरों में वृद्धि होने से जियो के एकाधिकार का खतरा टल गया है, जिसका ग्राहकों को भारी नुकसान हो सकता था।

इस दिशा में सरकार की भूमिका

अगर हम इस दिशा में सरकारी की भूमिका की बात करें तो अलग-अलग स्तर पर सरकार की भूमिका हो सकती है।

सबसे पहले हम बात करते हैं स्पेक्ट्रम की प्राइसिंग की। इकोनॉमिक्स टाइम्स के पत्रकार अमित ने इस बारे में बात करते हुए बताया कि किसी भी टेलिकॉम कंपनी को स्पेक्ट्रम की फीस चुकानी होती है, उसी हिसाब से उनका सर्विस रेट निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए- अगर कोई कंपनी 500 मेगाहट स्पेक्ट्रम खरीदती है, तो वह सिर्फ 5000 ग्राहकों को फुलफिल कर पाएगी। इससे ज़्यादा ग्राहक को टारगेट में लेने से उनकी सर्विस क्वालिटी घटेगी। ऐसे में अगर टेलिकॉम कंपनियां घाटे में चल रही हैं तो सरकार स्पेक्ट्रम की प्राइसिंग में बदलाव ला सकती है।

BSNL की क्यों हुई ऐसी स्थिति

इसके बाद अगर हम बात करते हैं खुद सरकारी कंपनी BSNL की तो इस दिशा में सरकार बिलकुल फेल नज़र आती है। BSNL के कर्मचारियों का वेतन समय से नहीं मिल रहा, कमर्चारियों को नौकरी से निकालने की नौबत तक आ गई। कंपनी अपना बिजली बिल तक नहीं भर पा रही, इस वजह से कई टावरों के कनेक्शन भी कटे हुए हैं।

पत्रकार अमित बताते हैं कि BSNL जिसे स्पेक्ट्रम से खर्चे से लेकर दूसरे कई इन्फ्रास्ट्रक्टर के पैसे नहीं चुकाने पड़ते बावजूद वह घाटे में चल रही है। इसकी मुख्य वजह उसका स्मार्ट तरीके से काम ना करना और समय के साथ मार्केट को ना समझना है।

जब जियो मार्केट में नए-नए प्लान ला रहा था उस वक्त BSNL ने इस दिशा में कोई कोशिश नहीं की। अब जब जियो ने मार्केट पर कब्ज़ा जमा लिया है, तब BSNL नए प्लान्स ला रहा है। इस वक्त जियो के ग्राहकों को अपनी ओर शिफ्ट करना BSNL के लिए इतना आसान नहीं होगा।

अगर BSNL ने भी मार्केट को स्मार्ट तरीके से समझा होता तो शायद उसकी पोजिशन भी इस प्रतियोगिता में बेहतर होती। क्योंकि आज भी देश के कई इलाके ऐसे हैं, जहां सिर्फ BSNL की ही पहुंच है। साथ ही कई ग्राहक आज भी सरकारी कंपनी होने की वजह से BSNL पर ही भरोसा करते हैं।

हालांकि इन सबसे अलग यह भी मानना है कि BSNL को जानबूझकर कमज़ोर किया गया है, ताकि निजी कंपनियों को फायदा हो सके, खासकर जियो को। जियो को सरकार द्वारा मिली अतिरिक्त छूट की बात भी कहीं ना कहीं सामने आती है।

जियो के मार्केट पर कब्ज़े की वजह

जियो के मार्केट पर कब्ज़े को लेकर एक बड़ी बात यह कही जाती है कि इसे सरकार से कई मामलों में छूट मिली। साथ ही इसके पीछे रिलाइंस जैसी बड़ी कंपनी है, जो आगे कई सालों तक ग्राहकों को मुफ्त सर्विस देने का खर्चा आसानी से उठा सकती है। लेकिन इन सबके बीच हमें यह भी बात माननी होगी कि जियो का मार्केट प्लान काफी स्मार्ट रहा है, जैसे-

बिलिंग मैनेजमेंट- जियो ने ऑनलाइन पेमेंट को प्रमोट किया है। इसके स्टोर्स काफी कम संख्या में देखने को मिलते हैं। इसके मुकाबले एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया के स्टोर आज भी बड़े स्तर पर हैं। जियो ने इस दिशा में बड़ी मात्रा में अपना पैसा और इन्वेस्टमेंट बचाया है।

टावरों के प्लानटेशन- BSNL पहले किसी खुले स्थान पर टावर लगाता था, जिसकी मोटी रकम ज़मीन मालिक को देनी पड़ती थी लेकिन जियो यहां भी स्मार्ट तरीके से चला। उसने बिल्डिंग के ऊंचे स्थान पर टावर लगाने शुरू किए और यहां भी बड़ी मात्रा में पैसे की बचत की।

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