क्या कमज़ोर विपक्ष का फायदा उठा रही है मोदी सरकार?

जिस प्रकार से मौजूदा सरकार देश का भट्ठा बैठाने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़ी है, वह देशवाशियो के लिए सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि एक सबक है। सबक इस बात का कि अगर जाति-धर्म और नफरत की राजनीति से प्रेरित होकर अपनी सरकार चुनोगे तो बहुत महंगी कीमत चुकानी पड़ेगी।

भारत की स्थिती उस रिमिक्स गाने की तरह हो गई है जिसमें रिमिक्स करने वाला यह मानने को तैयार ही नहीं होता है कि असली गाना बेहतर था और उसने तो सिर्फ उस असली गाने के साथ भयावह जोड़-तोड़ किया है।

भारत की विकास और प्रगति उतनी ही तेज़ी से पीछे जा रही है जितनी तेज़ी से मौजूदा सरकार अपना कार्यकाल पूरा करती जा रही है। आज फिर से ऐसे मुद्दों पर लोग लड़ रहे हैं, जिनके बारे में कुछ साल पहले तक किसी के ज़हन में ख्याल भी नहीं आता होगा।

गोमांस, हिन्दु-मुस्लिम एवं मंदिर-मस्जिद में देशवासियों को फंसा दिया गया है और आवश्यक मुद्दे कहीं खो गए हैं। भ्रम और डर का माहौल बनाकर लोगों को भटकाया जा रहा है। संविधान और मूल अधिकारो की धज्जियां उड़ाते हुए सरकार अपनी मनमानी कर रही है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि आज भी हम भुखमरी, गरीबी, जघन्य अपराध, महिला सुरक्षा, बेरोज़गारी और निरक्षरता जैसे मूलभूत मुद्दों से जूझ रहे हैं लकिन सरकार के लिए इन बातों से ज़्यादा आवश्यक यह है कि कोई वंदे मातरम् कहता है या नहीं!

फूट डालो राज करो वाली मोदी सरकार की नीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो साभार- फेसबुक पेज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो साभार- फेसबुक पेज

मोदी सरकार जिस तरह से काम कर रही है और अपने आलोचकों को दबा रही है, वह देखकर कई बार यह सवाल मन में उठता है कि क्या ये वाकई अपनी ही सरकार है या कोई अंग्रेज़ी सरकार है जो “फूट डालो राज करो’ की नीति अपना रही है। अपने देश की ही गौरवपूर्ण इतिहास को आज के व्हाट्सएप्प मैसेज द्वारा बदलने की कोशिश की जा रही है।

जो मोदी जी एक वक्त जीएसटी, आधार और महंगाई का विरोध करते थे, उनके शासनकाल में ही यह सब लागू  हुआ। चाहे प्याज़ की कीमत की बात हो या एलपीजी की, इन सभी मुद्दों पर ना सिर्फ यह सरकार चुप है बल्कि असंवेदनशील भी दिख रही है। जो स्मृति ईरानी कभी एलपीजी के लिए धरना देती थी, तो कभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चूड़ियां भेजती थी, वह आज चुप दिखती है।

गोमांस की राजनीति करने वाली बीजेपी शासित राज्य यूपी में आज धड़ल्ले से स्लॉटर हाउस चल रहे हैं। भारत सरकार ना सिर्फ गोमांस को स्वीकृति देती है, बल्कि निर्यात भी करती है। ऐसे में गाय को माता किस हक से कहती है? देश को देशभक्ति का पाठ पढ़ने वाली आरएसएस राष्ट्रीय ध्वज फहराने में दशकों तक किस बात का इंतज़ार कर रही थी? यह वही संस्था है जिसके साथी नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी।

विपक्ष का कमज़ोर होना दुखद

भाजपा  सरकार ने चुनाव को मज़ाक बनाकर रख दिया है। लोग किसे वोट दे रहे हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता है। बीजेपी अपनी सत्ता की लोभ में जनमत की हत्या करने में पीछे नहीं हट रही है और इसमें राज्यपाल की भूमिका भी संदेह के घेरे में दिखाई पड़ती है। चाहे राजनीतिक विरोधी हो या आलोचक हो अमित शाह और मोदी जी की जोड़ी सबको गिराने की कोशिश करती है।

सबसे दुखद बात है कि आज मोदी और शाह को टक्कर देने के लिए विपक्ष के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है जिसका गलत फायदा उठाया जा रहा है। एक कहावत है ‘आग के लिए पानी का डर  होना ज़रूरी होता है’ मगर यहां वह डर भी नहीं है।

एनआरसी और सिटिज़नशिप अमेंडमेंट बिल के ज़रिये भाजपा की राजनीति

अमित शाह और नरेन्द्र मोदी
अमित शाह और नरेन्द्र मोदी। फोटो साभार- Getty Images

जिस तरह से भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर एवं नागरिकता संसोधन विधेयक को लाया जा रहा है, उससे सिर्फ और सिर्फ देश का मौहाल बिगड़ेगा। संविधान का मज़ाक उड़ाते हुए ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपनाई जा रही है। आयोध्या मामला करीब-करीब समाप्त होने के बाद से यह एक नया मुद्दा खड़ा किया जा रहा है। लोगों को तार्किक सवाल करने की बजाय इस मुद्दो में उलझाए  रखने के लिए और साथ ही साथ अगले कुछ साल तक अपनी दुकान चालाने की भी कोशिश की जा रही  है।

जो सवाल करता है उसके लिए ‘अर्बन नक्सल’ और ‘एंटी -नैशनल’ जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। सरकार एनआरसी, ट्रिपल तलाक, अनुच्छेद 370 और पुलवामा जैसे मुद्दों को उठाकर ही आगे का चुनाव  लड़ना चाहती है ताकि जनता को लगे कि देश में कुछ तो हो रहा है! गौर करने की बात यह है कि एनआरसी और नागरिता संशोधन विधेयक एक ही सिक्के के दो पहलू  हैं जिसे समझना आवश्यक है।

आज नेहरू-लिआकत समझौता को गलत बताने वाले गृह मंत्री को तो खुद बांग्लादेश के जन्म का सही वर्ष याद नहीं है लेकिन उनका कहना है कि नागरिकता संशोधन विधेयक अत्यंत आवश्यक है।

इतिहास गवाह है कि नफरत की राजनीति से कभी उन्नति नहीं हुई है। आज असम जल रहा है और पुलिस उन पर डंडे बरसा रही है। किसी का भी ध्यान अब नौकरी, महंगाई या बेरोज़गारी पर नहीं जाने दिया जा रहा है। युवाओं को इस बात का अंदाज़ा नहीं लगने दिया जाएगा कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है और वे कठपुतली की तरह अपने लक्ष्य को भूलकर सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी वर्ग के खिलाफ भद्दी टिप्पणियां करने में व्यस्त हैं।

मीडिया में भी छाई है खामोशी

भारतीय मीडिया
फोटो साभार- Flickr

अफसोस की बात है कि जिन लोगों के घर में खाने तक की कमी है, वे ‘मंदिर वहीं बानाएंगे’ जैसे नारों मे व्यस्त हैं। चाहे प्याज़ की महगाई हो या पेट्रोल की, इन लोगो ने चुप्पी साध रखी है क्योंकि इनके दिमाग में यह डाल दिया गया है कि जो हो रहा है वह इनके जीवन में सुधार लाने के लिए आवश्यक है।

जो मोदी पहले डॉलर के सामने रुपये लुढ़कने को मुद्दा बनाते थे, उन्होंने आज चुप्पी साध रखी है, क्योंकि जो  बुरा हाल इनके कार्यकाल में हो रहा है, वह अब तक किसी के कार्यकाल में नहीं हुआ था। जोड़तोड़ की सरकार को एक नई परिभाषा दे दी गई है। जनादेश को हड़पना एक आम बात हो गई है। संवैधानिक पद की गरिमा और सरकारी तंत्र के दुरुपयोग को एक नया आयाम दिया गया है।

दूसरे पर आरोप लगाने वाली भाजपा यह भूल जाती है कि उन्होंने खुद महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बनाई और बाद में सरकार गिराया। सत्ता के लिए भाजपा ने अपने सिद्धांतो के साथ सिर्फ समझौता ही नहीं, बल्कि उसे दफन भी कर दिया।

मीडिया तक को डराकार रखा जा रहा है। कुछ जो 2-4 मीडिया हाउसेज़ ने घुटने नहीं टेके हैं, उन्हें इतिहास ज़रूर याद रखेगा। आज की स्थिति में आवश्यक है कि लोग जागरूक और स्वतंत्र होकर सवाल पूछना शुरू करें। अगर  सिर्फ सवाल करने और खुले दिमाग से सोचने की आज़ादी मिल जाए तो भाजपा के पाखंड की सच्चाई परत दर परत खुल जाएगी।

लोकसभा के बाद राज्य सभा में भी नागरिकता संशोधन विधेयक के पास होने के बाद आवश्यक है कि लोग अपने-अपने अधिकारों को जानें और विधि संगत कदम उठाएं।

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