5 ट्रिलियन इकॉनोमी की ओर बढ़ते देश के आदिवासी सबसे ज़्यादा कुपोषित

आसान शब्दों में यदि कुपोषण को समझा जाए, तो यह वह अवस्था है जब शरीर को पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिलते हैं। इसके कारणों में आहार की कमी, पाचन की समस्या या कई अन्य रोग शामिल हैं। भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की नई साझा रिपोर्ट ‘खाद्य एवं पोषण सुरक्षा विश्लेषण, भारत 2019’ (Food and Nutrition Security Analysis, India, 2019) ने भारत के एक बड़े हिस्से में बाल भुखमरी और कुपोषण की स्थिति को स्पष्ट किया है।

सोचने का विषय है कि हम जिस समृद्ध और विकासशील भारत की बात करते हैं, उस देश की आधी आबादी कुपोषण से ग्रसित है। यूनिसेफ द्वारा जारी किए गए आंकड़ें भी हमको यह सोचने पर विवश करते हैं कि हमारी नीतियां क्या वास्तविक रूप से आम जनमानस तक पहुंच भी पा रही हैं या पहुंचने से पहले ही दम तोड़े जा रही है।

यह किस तरह की समृद्धि है?

द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन 2019‘ के अनुसार, दुनिया में पांच साल से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा या दूसरे शब्दों में 70 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार है और जब इस आधार पर हम भारत की बात करें तो स्थिति और चिंताजनक है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रेशन द्वारा भारत के सभी राज्यों में कुपोषण की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की थी ।

जिसके अनुसार कुपोषण से होने वाली मौतों के मामले में मामूली सा अंतर आया है।  1990 में यह दर 70.4 फीसदी था, 2017 में जो 68.2 फीसदी ही पहुंचा था। यह एक प्रमुख चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पता चलता है कि कुपोषण का खतरा कम नहीं हुआ है।

मेरे नज़रिये से, बहुत सी नीतियां जिस तरह कागज़ों पर अमल में लाई जाती हैं। वे उतनी गति से लोगों तक नहीं पहुंच पाती है। ऐसा क्यों है इन कारणों पर विस्तार से मंथन किये जाने की आवश्यकता है।

मंथन योग्य विषय यह भी है कि खजांचियों की सूची देखी जाए तो भारत मे निर्धनता का आंकड़ा घटा है परन्तु कुपोषण का दायरा बढ़ा है। आखिर ऐसा क्यों है कि हम एक ओर समृद्धता की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं, वहींं दूसरी ओर एक बड़ी आबादी कुपोषण से लड़ रही है ।

आदिवासियों में कुपोषण की समस्या अधिक

इसमे कोई दो राय नहीं है कि भारत लंबे समय से विश्व में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों का देश बना है। हालांकि कुपोषण के स्तर को कम करने में कुछ प्रगति भी हुई है। गंभीर कुपोषण को झेल रहे बच्चों का अनुपात वर्ष 2005-06 के 48 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2015-16 में 38.4 प्रतिशत हो गया। हाल ही में जारी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 की रिपोर्ट के मुताबिक अनुसूचित जनजातियों और आदिवासियों में बहुत अधिक कुपोषण व्याप्त है।  रिपोर्ट के अनुसार,

  • भारत में 5 वर्ष से कम आयु के 44 प्रतिशत आदिवासी बच्चे कुपोषित हैं।
  • रिपोर्ट बताती है कि 45 प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के अनुसार कम वजन के हैं और
  • 27 प्रतिशत बच्चों की ऊंचाई के हिसाब से वज़न कम है।

कुपोषण का दंश झेल रहे आदिवासी बच्चों को लेकर हाल ही में एक खबर भी आई थी जहां ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के आदिवासी बच्चों की कुपोषण के कारण मृत्यु भी हुई लेकिन फिर भी इस समस्या का कोई भी स्थाई समाधान नहीं निकल पा रहा है।

इसकी सबसे बड़ी वजह आज आदिवासियों का जंगल से दूर होना भी माना जा रहा है। माना जाता है कि आदिवासी लोग जंगल से कई तरह की खाने की चीजें प्राप्त करते थे। जो पोषण की दृष्टि से बहुत ही कारगर होती थीं लेकिन आज यह स्थिति नहीं है। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा के नाम पर जो राशन उन्हें दिया जाता है उसमें पोषक तत्वों की भारी कमी भी सवाल उठाती है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी जो जंगलों से ही अपना जीवन व्यापन करते थे, आज उनसे उन्हीं के जंगलों पर अधिकार छीन लिया गया है। ऐसी ही स्थिति झारखंड और छत्तीसगढ़ के भी आदिवासी झेल रहे हैं जो अपने जंगलों को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

इसके साथ ही आदिवासियों में आज भी कई तरह के अंधविश्वास शामिल हैं जो कि कुपोषण की सबसे बड़ी वजह है। कई दफा खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि अंधविश्वास और अपने रिवाज़ों के चलते, नवजात को आदिवासी पैदा होते ही अस्पताल से अपने गाँव ले जाते हैं।

जिस घड़ी एक बच्चे को माँ का दूध पीना चाहिए उस घड़ी उस बच्चे पर झाड़-फूंक की जाती है। आदिवासियों की लंबाई और वज़न में कमी उनके कुपोषित होने का सबूत देते हैं।

चाहे अंधविश्वास कहें या सरकारी प्रबंधों की कमी लेकिन इस समस्या का दंश सबसे ज़्यादा आदिवासी झेल रहे हैं।

कुपोषण से निपटने के लिए बनाए गए आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति लचर

भारत मे कुपोषण निवारण हेतु आंगनबाड़ी केंद्र चलाये जा रहे हैं, जिनमे आंगनबाड़ी कार्यकत्री गाँव-गाँव जाकर कुपोषित बच्चों के निवारण हेतु अभियान के माध्यम से जनजागरण का कार्य करती हैं। बच्चों के भूख और कुपोषण से निपटने के लिए एकीकृत बाल विकास सेवा कार्यक्रम के भाग के रूप में, 1975 में उन्हें भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया था।

आंगनवाड़ी का अर्थ है “आंगन आश्रय”। आंगनबाड़ी केंद्र भी वर्तमान समय मे उस स्तर पर सफल होते दिखाई नहीं दे रहे हैं । मैंने बहुत सी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से वार्ता की है तो उन्होंने अपनी तमाम समस्याओं से अवगत कराया उन्होंने कहा,

1500 रुपये मिलने वाला मानदेय हम लोगों के लिए पर्याप्त नहीं होता है। परिवार के गुज़ारे के लिए हमें अन्य कार्य भी करने पड़ते हैं, जिससे हमारा मूल कार्य प्रभावित होता है।  यह हमारी मजबूरी है , 1500 रुपये प्रतिमाह मिलने वाला मानदेय प्रतिमाह मिलेगा भी या नहीं यह भी आवश्यक नहीं है ।

वह आगे बताते हैं,

कभी यह मानदेय 4 माह पर मिलता है तो कभी 10 माह या कभी 1 वर्ष पर।

अब सोचिये, ऐसी स्थिति में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कैसे अपना शत प्रतिशत दें सकेंगी। जब व्यक्ति अपनी सेवाओं से परिवार को व्यवस्थित नहीं कर सकेगा, तो वह समाज को कैसे स्वस्थ रखने में सहभागी बनेगा? सरकार को आंगनबाड़ी केंद्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह केंद्र गाँव व सरकार के बीच की कड़ी है ।

इनका मज़बूत होना ही कुपोषण पर वार होगा। अगर यह कड़ी कमज़ोर होगी तो यकीन मानिए कुपोषण की स्थिति और अधिक भयावह देखने को मिलेगी । अमर्त्य सेन ने कहा है कि अकाल की उत्पत्ति खाद्य के अभाव से नहीं होती बल्कि खाद्य तक अपर्याप्त पहुंच के कारण होती है। इसपर और ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

कुपोषण के दुष्प्रभाव

जब भी कुपोषण की बात होती है तो हम मृत्यु दर की बात करने लग जाते हैं। अगर कुपोषण के कारण मृत्यु दर में कमी आई है तो हम मानने लग जाते हैं कि भारत कुपोषण मुक्त हो रहा है, जबकि कुपोषण के कारण बहुत सारी समस्याएं पनपती हैं। जैसे,

  • बच्चे का अपनी उम्र के हिसाब से वज़न ना होना,
  • अपनी उम्र के हिसाब से लंबाई ना होना,
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता का कम होना,
  • लाईलाज बीमारियों का घर कर जाना,
  • और बच्चे की मानसिक अवस्था पर भी असर पड़ना।

यह कुपोषण ही है जिसके कारण एक बच्चा सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी झेलता है। कई विषयों में विद्यार्थियों का पीछे रह जाना, खेल-कूद या सोचने समझने की शक्ति का कम हो जाना, ये सब कुपोषण के ही कारण है।

ऐसा भी नहीं है कि कुपोषण बच्चे के पैदा होने के बाद से होता है या उसके बढ़ने की प्रक्रिया में होता है। कुपोषण से बच्चा गर्भ से ही झेलना शुरू कर देता है। अगर गर्भावस्था के दौरान माँ को संपूर्ण आहार ना मिले तो कुपोषण की समस्या जन्म लेने लगती है और उसके साथ ताउम्र भी चलती रहती है।

खुद सोचिए कुपोषण के कारण एक बच्चा अपनी पूरी ज़िंदगी में कई परीक्षाओं और मौकों से पीछे रह जाता है। कुपोषण को सिर्फ मृत्यु से आंकना भी हमारी दूरदर्शी सोच के ना होने का उदाहरण है।

इस तरह हो सकता है कुपोषण रहित भारत

कुपोषण से लड़ने हेतु आवश्यक है महिला सशक्तिकरण पर ज़ोर दिया जाए। महिला सशक्तिकरण की वर्तमान स्थिति यह है कि यह  शहरी क्षेत्रों में तो दिखाई देती है परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण की लौ आज भी नहीं पहुंची है।

इसके लिए अनुसूचित जनजातियों और आदिवासी समुदाय की महिलाओं को जागरूक और सशक्त करने की ज़रूरत है। साख ही दूर दराज़ के इलाकों में आंगनबाड़ी केंद्रों के सुचारू रूप से चलने की भी आवश्यकता है। महिलाओं का जागरूक ना होना ही कुपोषण का मुख्य कारक है।

शिक्षा की उपलब्धता न होना कुपोषण की जननी है। आवश्यक है जगह-जगह कुछ दूरी पर महिला जागरूकता केंद्र खोले जाएं, जिनमें उनको शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के लालन -पालन के भी तरीकों को सिखाया जाए।

आदिवासियों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो सिर्फ बच्चों को जन्म तो डें देता है परन्तु उनको पालन पोषण की निपुणता नहीं है। उनको यह भी नहीं पता कि स्तनपान क्यों आवश्यक है। उनको यह भी ज्ञान नहीं कि जन्म के तुरंत बाद माँ का दूध बच्चे के लिए कुपोषण से बचा सकता है।

मुख्य बात यही है कि उनको अस्पताल की सुविधाएं ही मुहैया नहीं हो पाती है और उसका निष्कर्ष यह निकलता है कि या तो खुद उनकी जान पर बन आती है या तो बच्चे पर।

महिला सशक्तिकरण हेतु आंगनवाड़ी केंद्रों को मुख्य भूमिका में आना होगा। उनके माध्यम से जन जागरण जागरूकता अभियान चलाया जा सकता है और महिलाओं को शिक्षित किये जाने की मुहिम पर ज़ोर दिया जा सकता है। महिलाएं यदि शिक्षित होंगी, तो यकीन मानिए कुपोषण से एक बड़े स्तर पर वे स्वयं लड़ने में सक्षम दिखाई देंगी ।

भारत को अगले पांच वर्ष में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने के सरकार के लक्ष्य पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम इसको प्राप्त कर भी लेंगे, परन्तु 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था से अधिक आवश्यकता भारत को कुपोषण मुक्त बनाये जाने की है।

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