क्या हम भारतीय पचा पाएंगे एक अश्वेत महिला का मिस यूनिवर्स बनना?

ब्यूटी का मतलब गोरी त्वचा, बचपन से हम यही तो समझते आए हैं। इस दौरान हमारी सोच, समझ और नज़रिया सब बदल गया लेकिन सुंदरता की परिभाषा आज भी वही बनी हुई है।

हम सभी इंसान हैं, हमारे रहन-सहन, भाषा, विचार-व्यवहार कुछ हद तक परिवर्तनशील हो सकते हैं। अगर हमारे व्यक्तित्व में कुछ खामियां हैं, तो हम उनमें सुधार कर सकते हैं। 

हमारी त्वचा का रंग प्राकृतिक देन है

लड़की को परेशान करते लोग
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

एक इंसान के रूप में जो हमारी शारीरिक बनावट है, जो हमारा रंग-रूप है, इसमें चाहकर भी हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते हैं। हमारी त्वचा का रंग प्राकृतिक देन है, जिसपर हमारा कोई वश नहीं चल सकता है। जिन लोगों की त्वचा गोरी है, इसमें उनका कोई योगदान नहीं है। बावजूद इसके प्राकृतिक बनावट को लेकर भेद-भावपूर्ण रवैया हमारी संकीर्ण मानसिकता का ही परिचायक है।

आज हम एक समाज के रूप में इतने परिपक्व हुए हैं कि समलैंगिकता, ट्रांसजेंडर, जातिगत भेदभाव, लैंगिक भेदभाव, महिलाओं के साथ भेदभाव एवं समाज के सभी रूढ़िवादी मान्यताओं पर खुलकर बातें कर रहे हैं लेकिन आज भी हमारी परिपक्वता रंगभेद के मामले में कच्ची है। जबकि रंगभेद भारत ही नहीं,बल्कि सम्पूर्ण वैश्विक इतिहास का सर्वाधिक अपमानजनक, अन्यायपूर्ण, संवेदनहीन एवं अनैतिक शोषण है।

अचानक रंगभेद की याद क्यों आई?

दरअसल, इस वर्ष का ”मिस यूनिवर्स 2019″ का खिताब दक्षिण अफ्रीका की एक अश्वेत महिला जोजीबिनी टूंजी को मिला है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस वर्ष ब्रम्हांड की सबसे सुन्दर महिला का खिताब एक सांवली त्वचा की मालकिन को प्राप्त हुआ है। जानकार आश्चर्य होगा कि 1952 से हर वर्ष दिए जाने वाले इस खिताब को जोजीबिनी टूंजी से पूर्व 5 और अश्वेत महिलाएं हासिल कर चुकी हैं।

जेनेले कमिशंग
जेनेले कमिशंग। फोटो साभार- सोशल मीडिया

सर्वप्रथम यह खिताब 1977 में त्रिनिदाद और टोबैगो की जेनेले कमिशंग को मिला था। इसके बाद 1995 में चेल्सी स्मिथ को, 1998  में वेंडी फिट्ज़विलियम को, 1999 में मपुले क्वेलागोबे को और 2011 में अंगोला की लीला लोप्स को मिस यूनिवर्स का यह सम्मान मिल चुका है।

महत्वपूर्ण तो यह भी है कि मिस यूनिवर्स 2019 जोजीबिनी टूंजी इस प्रतियोगिता में ‘मिस दक्षिण अफ्रीका’ के रूप में भाग ले रही थीं। उन्होंने भारत की वर्तिका सिंह सहित दुनिया की 90 खूबसूरत महिलाओं को पीछे छोड़ते हुए इस खिताब पर कब्ज़ा किया।

इस ऐतिहासिक फैसले के लिए उस ज्यूरी को भी सलाम, जिसने यह परिणाम दिया। इसके साथ ही पूरी दुनिया में एक बार पुनः अश्वेतों के प्रति मानसिकता में बदलावों की चर्चा प्रारम्भ हो गई है।

जोजीबिनी टूंजी की जीत दक्षिण अफ्रीका की ऐतिहासिक अश्वेत क्रांति की जीत है

जोजीबिनी टूंजी
जोजीबिनी टूंजी। फोटो साभार- सोशल मीडिया

जोजीबिनी टूंजी का सम्बन्ध दक्षिण अफ्रीका से है। दक्षिण अफ्रीका जहां के मूल-निवासी अश्वेतों के साथ लंबे समय तक गोरों ने बर्बरतापूर्ण एवं अमानवीय व्यवहार किए हैं। रंगभेद की अपमानजनक नीति का शिकार अपने अफ्रीका प्रवास के दौरान महात्मा गाँधी को भी होना पड़ा था, जिसके खिलाफ उन्होंने एक बड़ा आंदोलन भी किया।

एक लम्बे संघर्ष एवं अंतर्राष्ट्रीय दबाव के पश्चात 1992 में दक्षिण अफ्रीका की श्वेत सरकार को झुकना पड़ा, जिन्हें अश्वेतों को बराबर का अधिकार देते हुए रंगभेद की सभी नीतियों को समाप्त करना पड़ा।

वास्तव में जोजीबिनी टूंजी की जीत  कोउस महान अश्वेत क्रांति की जीत की ही अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। आज दक्षिण अफ्रीका में फिल्म, फैशन, मॉडलिंग या खेल प्रत्येक क्षेत्र में अश्वेत महिलाओं को समान अवसर प्राप्त हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो जोजीबिनी टूंजी कभी मिस यूनिवर्स नहीं बन पातीं।

भारत में सांवली महिला का मिस यूनिवर्स चुना जाना बेहद मुश्किल

जोजिबिनी
जोजीबिनी टूंजी। फोटो साभार- सोशल मीडिया

वास्तव में जोजीबिनी टूंजी का मिस यूनिवर्स बनना विश्व के लिए कोई बड़ी खबर भले ना हो, भारतीय समुदाय के लिए बेहद अविश्वसनीय, एवं हास्यास्पद खबर ज़रूर है। अब देखना दिलचस्प है कि क्या जोजीबिनी टूंजी के मिस यूनिवर्स बनने से भारतीय समाज में सांवली त्वचा वाली महिलाओं के प्रति नज़रिये में बदलाव आएगा?

लोग जोजीबिनी टूंजी से अधिक उस ज्यूरी को सर्च कर रहे होंगे जिसने यह निर्णय दिया है, क्योंकि हम भारतीयों के लिए सुंदरता का मतलब ही ‘गोरी’ त्वचा है। मिस यूनिवर्स कौन कहे? यहां तो कोई सांवली त्वचा की महिला मिस गली/मुहल्ला भी नहीं बन सकती। हमारे यहां सांवली त्वचा सिर्फ बदसूरती और गंवारपन का प्रतिक है।

काबिलियत के पूरे अंक तो बनते हैं लेकिन सामने वाले का व्यवहार आपकी त्वचा के रंग के अनुसार तय होता है। पुरुषों के प्रति स्थिति फिर भी बेहतर है, क्योंकि समाज तो पुरुष प्रधान है। अन्यथा महिलाओं के लिए तो अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाने हेतु गोरा अर्थात खूबसूरत होना आवश्यक है।

भारतीय समाज में सांवली त्वचा होना वाकई किसी अभिशाप से कम नहीं है। उनकी पूरी ज़िंदगी तानों भरी नज़रों को बर्दाश्त करते ही गुज़रती है। यह अपमानजनक सफर पैदा होते ही शुरू हो जाता है। लोग नवजात शिशु को देखते ही टिप्पणी करते हैं, “ओह सांवला है, फलां का बच्चा खूब गोरा है।”

भारत में लोग सांवला रंग देख ऐसे दुखी होते हैं जैसे आवेदन मैनेजर का किया हो और ज्वाइनिंग लेटर चपरासी का आ गया हो। किसी भी माँ को अपने बच्चे से बहुत प्यार होता है लेकिन दूसरी महिला की गोद में ‘गोरे बच्चे’ को देख वह अपने बच्चे को छुपा लेती है। बच्चा बड़ा होकर स्कूल जाता है, वहां भी उसे दोयम दर्जे़ का व्यवहार सहन करना पड़ता है। सहपाठी से लेकर शिक्षक तक ताने मारते हैं।

गोरी त्वचा मतलब कम दहेज़ और सांवली त्वचा मतलब ज्यादा दहेज़

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

सांवली महिलाओं को अपने परिवार में भी कई बार अपमानजनक शब्दों के सहारे नीचा दिखाया जाता है। जब बात सांवली त्वचा पर आती है, तब शादी के दौरान सारी काबिलियत ताक पर रह जाती है। परिवार को भी लगता है कि गोरी त्वचा मतलब कम दहेज़ और सांवली त्वचा मतलब ज्यादा दहेज़।

किसी गोरे लड़के या लड़की ने तमाम संकीर्णताओं से उठकर किसी सांवली त्वचा की लड़की या लड़के से अगर शादी रचा ली फिर तो पूरा जीवन उन्हें भी अपमानजनक तानों संग गुज़ारना पड़ता है। बड़े होकर अपने कार्यक्षेत्र, कार्यालय या टीम में भी उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अपमानजनक शब्दों से दो-चार होना पड़ता है।

यहां कई ऐसी नौकरियां हैं जहां एक प्रकार से गोरी त्वचा का आरक्षण है। अन्य प्राइवेट नौकरियों में बमुश्किल ही सांवली त्वचा वाली लड़कियों या महिलाओं को जगह मिलती है।

भारतीय फिल्म एवं फैशन जगत रंगभेद का पर्याय है

कहते हैं सिनेमा समाज का आइना होता है। विश्व सिनेमा एवं फैशन जगत में लाखों अश्वेत महिलाएं ना सिर्फ अपनी जगह बना चुकी हैं, बल्कि एक स्टारडम भी स्थापित किया है। वहीं, दूसरी तरफ भारतीय सिनेमा एवं फैशन जगत में अश्वेतों के लिए कोई जगह अब तक नहीं है।

रुपहले पर्दे की पहली शर्त ही गोरी त्वचा है। किसी सांवली त्वचा की लड़की को फिल्म या टेलीविज़न में अच्छे कैरियर बनाने के बारे में सोचने का हक भी नहीं है। दक्षिण की फिल्मों में सांवली त्वचा के अभिनेताओं ने अच्छी-खासी जगह बनाई है लेकिन अभिनेत्रियों के मामले में सिनेमा जगत अब भी गोरी त्वचा से आगे नहीं बढ़ पाया है।

विदेशों में मिल रहा अश्वेतों को उनके हिस्से का सम्मान, भारत में कब होगा ऐसा?

आदिवासी लड़की
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

यह सही है कि रंगभेद दुनिया के सभी देशों में कमोबेश पाया जाता है जिसे लेकर समय-समय पर आवाज़ें उठती रही हैं। ठीक है कि अब भी उनके हिस्से का पूर्ण सम्मान मिलना बाकी है, बावजूद इसके समय के साथ लोगों के नज़रिये में फर्क आया है। लोग रूढ़िवादी संकीर्णताओं से बाहर निकल अश्वेतों के प्रति सम्मानजनक सोच रखने लगे हैं, जिसका परिणाम सामने भी दिख रहा है।

आज अश्वेत लोग ना सिर्फ विभिन्न मंचों पर अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रहे हैं, बल्कि अपने देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के विकास में अश्वेतों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती है। ठीक इसके विपरीत भारत में त्वचा के रंग को लेकर होने वाले भेद-भाव में कोई कमी नहीं आई है। हमारे समाज में रंग-रूप को लेकर वर्षों पुरानी मानसिकता “सांवली त्वचा बदसूरती की निशानी” आज भी बरकरार है।

आज 21वीं सदी में अपने समाज की तमाम खामियों, रूढ़िवादी मान्यताओं, संकीर्णताओं पर बात कर रहे हैं लेकिन रंगभेद को लेकर बात करने की हिम्मत हममें अब भी नहीं है। समाज का वह हिस्सा जो खुद को खूबसूरत समझता है, अपनी खूबसूरती के गुरुर में ही चूर है।

उसमें अब तक इतनी परिपक्वता नहीं आई है कि आगे बढ़कर इस विषय पर बात कर सके। जो लोग इससे प्रभावित हैं, उन्हें लगता है कि इस मुद्दे पर बात करने से उनका और अधिक मज़ाक बनेगा। वे ऐसा नहीं दिखाना चाहते कि उन्हें भी खूबसूरत कहलाने की तलब है।

आज मिस यूनिवर्स 2019 जोजीबिनी टूंजी ने खूबसूरती की एक नई परिभाषा गढ़ते हुए पूरे विश्व को एक आईना दिखाया है। यहां कई सवाल उठते हैं, क्या हम भारतीयों में भी हिम्मत है उस आईने में झांकने की?

क्या हम इस संदेश को समझ पाएंगे, जिसका आने वाले समय में कुछ असर हमारे समाज पर पड़ेगा? क्या हमारी फिल्म और फैशन इंडस्ट्री इस सच को स्वीकार पाएगी? क्या वह वक्त आएगा जब भारत की कोई अश्वेत महिला मिस इंडिया बनेगी?

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