“रेप की घटना पर लड़की की इज्ज़त चली गई कहने वाला समाज बीमार है”

आज कल अखबार में हेडलाइन देखकर मन विचलित होने लगता है। हैदराबाद में लड़की के साथ गैंगरेप के बाद ज़िंदा जलाया फिर दो दिनों बाद हैदराबाद जैसी घटना बक्सर में घटित हुई, जहां रेप के बाद सिर्फ लड़की का पैर ही पाया गया। वहीं, समस्तीपुर वाली घटना में केवल लड़की का हाथ बचा था।

चूंकि छोटे शहरों की खबरें नैशनल न्यूज चैनलों पर नहीं चलती हैं और ना ही इसके लिए ट्विटर पर कोई हैशटैग चलाया जाता है। हद तो तब हो गई जब उन्नाव में गैंगरेप के अरोपियों ने जमानत पर छुटते ही रेप सर्वाइवर पर को जला दिया जिसके बाद शनिवार को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

NCRB, 2017 के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामलों में पिछले वर्षों की तुलना में काफी वृद्धि हुई है। रेप के 93 प्रतिशत मामलों में जानने वाले ही आरोपी पाए गए।

क्या लड़कियों की इज्ज़त सिर्फ शरीर में ही होती है?

इस देश में पहले तो इतने बीमार मानसिकता से ग्रसित लोग हैं कि इव टीज़िंग या रेप जैसी घटनाओं के बाद आसानी से कहते हैं, “लड़की की इज्ज़त चली गई या इज्ज़त से खेली गई।”

मैं इस समाज से पूछना चाहती हूं कि लड़की की इज्ज़त क्या सिर्फ उसके शरीर और गुप्तांगों में है? कोई मनुष्य भेड़िया की तरह उस पर टूट कर उसके साथ बलात्कार करता हो या आपत्तिजनक वीडियो बनाकर वायरल करता हो, उसमें लड़की की इज्ज़त कैसे गई? हम सब को समझना होगा कि ऐसा कुकृत्य करने वाले आदमी और उसके परिवार की इज्ज़त जाती है ना कि लड़कियों की।

रेप के आरोपी को सज़ा सुनाने में नाकाम है यह सिस्टम

प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

हिम्मत जुटाकर कुछ लड़कियां न्याय मांगने पहुंच भी जाती है, तो रेप की पुष्टि से लेकर अपराधी को सज़ा सुनाने तक की प्रक्रिया इतनी सुस्त होती है कि रेप सर्वाइवर की हिम्मत ही साथ छोड़ जाती है। निर्भया केस में एक अपराधी नाबालिग था जिसे बाद में छोड़ दिया गया और एक ने आत्महत्या कर लिया। बाकी के अपराधियों को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई है लेकिन जल्लाद नहीं मिलने के कारण अब तक उन दरिंदों को जेल में बैठाकर मुफ्त का खाना खिलाया जा रहा है।

ज़रा सोचिए अगर फास्ट ट्रैक के तहत 90 दिनों के अंदर दोषियों को पकड़कर सज़ा सुनाते हुए फांसी दे दी जाती तो कहीं ना कहीं कानून के प्रति लोगों का भरोसा मज़बूत होता और कुकर्मी मानसिकता में भी खौफ भी दिखाई पड़ता लेकिन यहां एक के बाद एक घटना घटित हो रही है और हम कभी मोमबत्ती जलाकर विरोध करते हैं तो कभी फेसबुक, ट्विटर पर हैशटैग लगाकर न्याय मांगते हैं। सड़कों पर आंदोलन से लेकर अनशन होता रहता है लेकिन स्थिति बिल्कुल वैसी ही दर्दनाक बनी रहती है।

उदाहरण के तौर पर आप देखिए कि किस तरह से उन्नाव रेप सर्वाइवर को परिवार समेत कुचल दिया गया जिसके बाद से शायद रेप सर्वाइवर को मारने का ट्रेंड सा चल पड़ा है।

निर्भया के बाद देश उबल रहा था और तब ऐसा लगा कि अब सब संवेदनशील हो गए हैं। अब ऐसा दोबारा नहीं होगा लेकिन हर रोज़ महिलाओं के साथ हिंसात्मक घटनाएं बढ़ ही रही हैं।

सरकारी घोषणाएं भी असरदार नहीं हैं

अभी हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देशभर के थानों में महिला हेल्प डेस्क के लिए निर्भया कोष से 100 करोड़ रूपये आवंटित करने की मंज़ूरी दी है। इस खबर को पढ़कर बस इतना समझ आया कि रात-दिन, घर से लेकर दफ्तर और सड़क पर बलात्कार के मामले आते रहेंगे औप दूसरी तरफ हमारे सियासतदान सिर्फ योजनाओं की बात करेंगे।

संस्कृति और संस्कार के नाम पर औरत के शरीर को इतना रहस्यमई बना दिया गया है कि युवाओं में जब बायोलॉजिकल चेंज आता है, तो उनके दिमाग में सिर्फ सेक्स ही पलता रहता है। पिछले दिनों हैदराबाद कांड के बाद पॉर्न साइट्स पर प्रियंका रेड्डी के बलात्कार के वीडियो को सर्च किया गया था। सोचिए ज़रा वे लोग आखिर उस वीडियो में क्या देखना चाह रहे होंगे?

सच तो यह है कि हमारा समाज सड़ते जा रहा है। सस्ता डेटा और फूहड़ वेब सीरीज़ से लेकर पॉर्न साइट्स देखकर मनोरंजन कर रहे युवाओं की मानसिकता में यौन कुंठा इस कदर हावी हो चुकी है कि इनके लिए सज़ा भी मायने नहीं रखती है। इसलिए बहुत ज़रूरी है कि लैंगिक संवेदनशीलता के लिए स्कूलों में पढ़ाई कम्पलसरी करनी चाहिए और हाई स्कूल में भी सेक्स एजुकेशन कम्पलसरी होनी चाहिए।

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