दलितों के राजनीतिक आरक्षण पर भाजपा की मारीच राजनीति

विधायिका में अनुसूचित जाति, जनजाति के आरक्षण के 10 वर्ष और विस्तार के लिए संसद में पहले ही प्रस्ताव पारित हो चुका है, जिसे 50 प्रतिशत राज्यों के विधान मंडलों के अनुमोदन की ज़रूरत है।

इस कवायद में गत वर्ष के अंतिम दिन उत्तर प्रदेश विधान मंडल के दोनों सदनों में भी इससे संबंधित प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया है। यह अजीब बात है कि भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद पार्टी के एक बड़े वर्ग ने अघोषित रूप से इस धारणा के प्रसार का काम किया कि तीन तलाक व अन्य ज्वलंत मुद्दों की तरह आरक्षण के मुद्दे पर भी पार्टी की सरकार तथाकथित साहसिक कदम उठाएगी। दूसरे शब्दों में आरक्षण के जंजाल को खत्म कर देगी लेकिन भाजपा भी अन्य पार्टियों की परंपरा का निर्वाह कर रही है, जिससे उसके समर्थक सवर्ण वर्ग में इस मुद्दे को लेकर कुंठा का संचार होने की आशंका देखी जा रही है।

भाजपा की रैली में शामिल लोग।

दरअसल, भाजपा ने SC/ST के मामले में सवर्णों में विशाल हृदय का परिचय देने के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया, जबकि ऐसा नहीं है कि सवर्ण न्याय भावना से परे हो। सत्य यह है कि दलित और पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के प्रावधान की पहल में सवर्ण जाति से आए नेताओं का ही बड़ा योगदान है। दलितों की तरह पिछड़ों के लिए भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था सवर्ण नेताओं की ही देन है, भले ही यह कदम वीपी सिंह ने उठाया था, जिसके कारण सवर्ण राजनीति के अंदर की सदियों की शाश्वत प्रतिद्वंदिता के कारण इसे ऐसे पेश कर दिया गया, जिससे समूचे सवर्ण धरातल पर विश्वनाथ प्रताप सिंह सबसे बड़े खलनायक बन गए।

आरक्षण को एक राजनैतिक पैंतरे की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। विशेष अवसर के सिद्धांत को जिसके अंतर्गत आरक्षण आता है दुनिया के तमाम और देश जिनमें अमेरिका, कनाडा पहले से अपनाए हुए हैं। भारत ने तो सामाजिक न्याय के लिए दूसरे देशों की ही सकारात्मकता से प्रेरणा लेकर इस व्यवस्था को अपनाया गया है।

भाजपा और आरक्षण

इस व्यवस्था के विरूद्ध भारत में जितनी घृणा का वमन किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ है। भाजपा के एजेंडे में घोषित रूप से कभी भी आरक्षण को खत्म किया जाना शामिल नहीं था, फिर भी इस पार्टी के नेताओं को पता नहीं कैसे यह प्रतीत रहा कि उनकी पार्टी अपने दम पर सत्ता में होने के कारण इस प्रावधान को खत्म कर देगी, जिसे वे अन्याय कहते हैं।

लेकिन भाजपा इसके व्यावहारिक परिणामों को जानने के कारण कभी ऐसा कदम नहीं उठा सकती, यह पहले ही दिन से साफ रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने केन्द्र में भाजपा के पदारूढ़ होने के बाद एक सभा में ऐसा वक्तव्य दिया था, जिसमें आरक्षण को समाप्त करने की उनकी राय का संकेत था। इसके कारण विधानसभा चुनाव में बिहार में भाजपा को भारी क्षति झेलनी पड़ी थी।

इसके बाद कुछ समय पहले संघ प्रमुख ने आरक्षण की व्यवस्था पर चर्चा कराने का राग छेड़ा, तो जैसे फिर बर्रे के छत्ते को छेड़ दिया गया हो। संघ प्रमुख का यह कहना सही है कि समाचार को चटपटा बनाने के लिए उनके बयान को तोड़ मरोड़कर पेश कर दिया जाता है, जिससे भ्रांतियां फैलती हैं। उन्होंने आरक्षण के मामले में उनके बयान पर विवाद उत्पन्न होने के बाद कहा कि जब तक दलित पूरी तरह बराबरी का दर्जा हासिल नहीं कर लेते तब तक आरक्षण जारी रहेगा इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

आरक्षण और देश का विकास

आरक्षण के विरोधी इस व्यवस्था के कारण देश के लगातार कमज़ोर होते जाने की काल्पनिक धारणा फैलाते हैं, जबकि सत्य यह है कि आज़ाद भारत में जब आरक्षण की व्यवस्था लागू और विस्तृत हुई, तब से देश जितना मज़बूत हुआ है, उतना पहले कभी नहीं रहा।

फोटो प्रतीकात्मक है।

अग्रेंज़ जब गए थे तो विरासत में बदहाल देश छोड़ गए थे, जिसकी गणना पिछड़े देशों की सूची में भी सबसे पीछे थी लेकिन अन्य प्रयासों के साथ-साथ सामाजिक न्याय के प्रयासों ने भारत को प्रमुख महाशक्ति की कतार में पहुंचाकर खड़ा कर दिया।

यह भी असत्य है कि इस व्यवस्था के कारण योग्यता होते हुए भी सवर्णों के लिए अवसर कम हुए हैं। सही तो यह है कि सवर्णों की जितनी संख्या है उसके अनुपात के हिसाब से वे सरकारी नौकरियों तक में बहुत ज़्यादा हैं। अगर सारे पिछड़े दलित देश से अलग कर दिए जाए तो सवर्णों के लिए उतनी नौकरियां बचने वाली भी नहीं हैं, जितनी उनको हासिल हैं।

इसके अलावा आरक्षण के कारण दलितों और पिछड़ों का जो उत्थान हुआ है और उसके चलते बाज़ार में जो बूम आया है, उसके चलते प्राइवेट सेक्टर में बड़ी संख्या में आकर्षक नौकरियां सृजित हो रही हैं और वे 90 प्रतिशत सवर्ण युवकों को हासिल हो रही हैं।

दिक्कत यह है कि जो लोग कुरीतियों के विरोध में बोलते हैं, उन्हें भी धर्म विरोधी और नास्तिक करार दे दिया जाता है। कई बार तो धर्मनिष्ठा के नाम पर ऐसी बातों को स्वीकार कर लिया जाता है, जो कुएं में कूदने के बराबर होता है।

ऐसे अंधविश्वासों की वजह से ही वे ढोंगी साधु संत ईश्वर के अवतार के रूप में पूज दिए गए, जो साधु के रूप में शैतान थे और जब उनकी कलई खुली तो हमें धर्म पर कालिख पुतवाने के गुनहगार की कोटि में खड़ा होना पड़ा।

इसी तरह ऊंच-नीच पर आधारित जाति व्यवस्था का संबंध धर्म से कदापि नहीं है, यह एक समाजशास्त्रीय अवधारणा है। पूरी दुनिया में आज जब समानता, न्याय और बंधुत्व पर आधारित व्यवस्था को आदर्श के रूप में घोषित किया जा चुका है, तो इसके विरूद्ध किसी समाजशास्त्री मांडल को अपनाए रखने की ज़िद स्वीकार्य नहीं हो सकती है।

आरक्षण के विरोध के नाम पर समाज इतना अंधा हो जाता है कि दुनिया में पहले लागू हुई इस तरह की व्यवस्थाओं के बारे में वह कोई जानकारी नहीं करना चाहता। एक ओर सबसे श्रेष्ठ भारतवासी की दुहाई दी जाती है, दूसरी ओर जातिगत संगठन बनाकर यह दुहाई दी जाती है कि अमुक जाति से कोई श्रेष्ठ नहीं, कोई पवित्र नहीं, कोई बलशाली नहीं है।

इसमें दूसरों को हीन ठहराने की भावना स्वतः निहित है, तो इसे देशभक्ति माना जाए या देश को विभाजित करने की मानसिकता जो देशद्रोह की श्रेणी में आती है। 

राजनीति और दलित उम्मीदवार

दलित जनप्रतिनिधियों के चुनाव के लिए आरक्षण के एक बारगी फिर विस्तार पर यही कहा जाएगा कि इतने सालों से आरक्षण का लाभ लेने के बावजूद अगर सक्षम दलित नेता तैयार नहीं हो पाए तो समाज को कब तक उनके आरक्षण को ढोने के लिए मजबूर किया जाता रहेगा पर वस्तुस्थिति कुछ और है।

राजनीतिक पार्टियां जानबूझकर जमूरे छाप दलित प्रत्याशियों को चुनाव में थोपती हैं, जबकि योग्य दलित आत्मसम्मान के प्रति जागरूकता दिखाने के कारण बाईपास हो जाने को अभिशप्त रहते हैं।

केन्द्र में पहली बार जब 1977 में गैर कॉंग्रेसी सरकार बनी थी तो प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की दौड़ में जगजीवन राम सबसे आगे थे क्योंकि वे तमाम महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके थे और सरकार चलाने का पूरा अनुभव उन्हें था। शायद वे प्रधानमंत्री बनाए गए होते तो जनता पार्टी पूरे पांच वर्ष कायम करती लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए चौधरी चरण सिंह तक ने मोरारजी देसाई को स्वीकार कर लिया जो बेहद अव्यवहारिक और घमंडी नेता थे, जिसके चलते हिचकौले खा-खाकर उनकी सरकार जैसे-तैसे ढाई वर्ष पूरे कर पाई और धड़ाम हो गई।

बाद में 1980 का चुनाव अटल बिहारी वाजपेयी के आदर्शवाद के कारण जगजीवन राम को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके जनता पार्टी ने चुनाव लड़ा तो समाज ने अपनी बीमार सोच के कारण इसे स्वीकार नहीं किया और जनता पार्टी की चुनाव में बुरी दुर्गति हुई।

रामविलास पासवान भी इसलिए अवसरवाद की राजनीति के दलदल में चले गए, क्योंकि दलित होने के बावजूद वे लोकप्रिय और स्वतंत्र व्यक्तित्व के धनी थे, जो भारतीय समाज में स्वीकार्य नहीं है।

अगर सवर्ण प्रभुत्व की राजनीति की पोषक ताकतों को आरक्षण जैसी किसी मजबूरी का सामना करना पड़ता है तो वे राष्ट्रपति से लेकर वार्ड मेम्बर तक विदूषक चेहरे तलाशती हैं, ताकि दलित समाज ग्लानि के गर्क में डूबा रहे। दलित आरक्षण का बार-बार राजनीतिक विस्तार करना पड़ता है। दलित भलाई की इस मारीच राजनीति की वजह से ही दलितोत्थान के उपक्रम तार्किक परिणति तक ना पहुंच पाने के लिए अभिशप्त हैं। बहरहाल, जो भी हो एक बार फिर दलितों को राजनीतिक आरक्षण का विस्तार मिलने से उन वर्ग शक्तियों को आइना देखना पड़ा है, जो भाजपा का समर्थन करती हैं।

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