“अब देश में पोहा खाने पर कहीं बांग्लादेश ना भेज दिया जाए”

कैलाश विजयवर्गीय भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता हैं। हाल ही में उनका बयान सुर्खियां बटोर रहा है, उन्होंने कहा है

उनके घर पर काम करने आए मज़दूर सिर्फ पोहा ही खा रहे थे, कोई भी हिंदी नहीं बोल पा रहा था।

उन्हें सुपरवाइज़र ने बताया यह लोग बंगाल से हैं, मज़दूरी लेते हैं और 12 घंटे काम करते हैं। नेताजी यह सब एक जनसभा में बोल गएं। पोहा खा रहे मज़दूरों को नेता जी ने बांग्लादेशी घुसपैठिया करार दिया।

कैलाश विजयवर्गीय।

विजयवर्गीय का यह बयान विवादास्पद है। जैसा कि सुपरवाइज़र ने उन्हें बताया काम करने वाले मज़दूर बंगाल से आए हैं और वह बंगाली जानते हैं। यह बात भी संभव है काम करने वाले लोग भारत के ही हों और उन्हें हिंदी ना आती हो। दक्षिण भारत के बहुत से लोगों को हिंदी नहीं आती है। दक्षिण भारत के लोग इसके चलते विदेशी नहीं हो सकते हैं। इनका बस चले तो कल को पोहा खाने पर ये हमें बांग्लादेश ही भेज दें।

हम क्या खाएं, क्या पहने इससे आपको क्या तकलीफ?

यह बयान देते हुए जनसभा को संबोधित करने के पीछे कैलाश विजयवर्गीय की क्या सोच रही होगी? विजयवर्गीय नागरिकता कानून की ज़रूरत बता रहे थे लेकिन क्या विशेष समुदाय को निशाना नहीं बना रहे थे? हम क्या खाएं, क्या पहने इससे आपको क्या तकलीफ?

यह काफी आसान सवाल है, इसका जवाब सत्ताधारी पार्टी का कोई भी नेता या प्रवक्ता नहीं देगा। पिछले दिनों पूरे देशभर में बीफ को लेकर माहौल बनाया गया, गौ हत्या के शक पर दर्जनों लोगों की जान चली गई। सिर्फ संदेह के चलते अखलाक को अपनी जान गंवानी पड़ी।
लव जिहाद के बात पर माहौल बनाया गया।

साधारण बात है, संविधान आपको अंतर्जातीय एवं अंतर धार्मिक विवाह की अनुमति देता है। आज़ादी है कि आप किसी भी धर्म का अनुपालन कर सकते हैं। सवाल ऐसे बड़बोले राजनेताओं से, सत्ताधारी पार्टियों से किया जाना चाहिए, हम क्या खाएं, क्या पहने इससे आपको क्या तकलीफ है?

“कपड़े से ही पता चलता है वे कौन लोग हैं”

नरेंद्र मोदी।

झारखंड की चुनावी रैलियों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने दुमका में कहा था,

कपड़े से ही पता चलता है वे कौन लोग हैं।

हालांकि इसका चुनाव पर कोई असर नहीं हुआ, झारखंड चुनाव के नतीजे आप सबके सामने हैं। दुमका की सीट भी बीजेपी नहीं जीत सकी। वहां से हेमंत सोरेन ने चुनाव जीता।

दिल्ली में प्रधानमंत्री कहते हैं,

उनके हाथों में तिरंगा देखकर सुकून मिलता है।

प्रधानमंत्री क्या अशफाक उल्ला खान के बारे में नहीं जानतें? अगर वाकई वास्तव में ऐसा ही है, तो उन्हें इतिहास थोड़ा बहुत पढ़ लेना चाहिए।
भाषा और खानपान के आधार पर विभाजन खतरनाक है।

जिस तरह से विजयवर्गीय ने खानपान का ज़िक्र किया है, हो सकता है मज़दूरों की कुछ परेशानी रही हो, जिसके चलते वह रोटी नहीं खा पाएं। दूसरी बात वह कहते हैं कि उन मजदूरों को हिंदी नहीं आती थी। विजयवर्गीय साहब को बता दें कि भारत में संविधान के अनुसार 22 भाषाएं अधिकृत हैं। हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है, राष्ट्रभाषा का नहीं।

अगर आप हिंदी को पूरे देश भर में थोपने की कोशिश करेंगे, तो लोग उसके खिलाफ आवाज़ उठाएंगे। भारत में हर राज्य का खानपान अलग है। ऐसे में खानपान को लेकर भी आप किसी को अलग नहीं कर सकते हैं।

ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, पाकिस्तान से अलग हुए बांग्लादेश के इतिहास को समझिए, पश्चिमी पाकिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान पर उर्दू भाषा जबरन थोपना चाहता था। नतीजा क्या हुआ बताने की ज़रूरत नहीं है।

पाठक और देश के नागरिक के तौर पर आप कैसा सोचते हैं? वाकई क्या देश में विभाजनवादी ताकते सक्रिय हैं? नया नागरिकता कानून क्या धर्म के आधार पर विभाजन करता है?

गणतंत्र दिवस पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं आप सभी से नए भारत की आशा है।

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