“दीपिका, यह समाज आवाज़ उठाने वाली हर महिला को अपमानित ही करना जानता है”

वर्ल्ड की सबसे बड़ी ट्रोल आर्मी ने फिल्म छपाक की आईएमडीबी रेटिंग 4.1 तक गिरा दी थी। कई लोगों ने वन स्टार की रेटिंग दी। यह सब बस इसलिए कि फिल्म की अभिनेत्री सह निर्माता ‘दीपिका पादुकोण’ JNU चली गयी थीं। एक विश्वविद्यालय से इतनी चिढ़? दीपिका के स्किल इंडिया मिशन के सरकारी कैंपेन से उनका ऐड वीडियो ड्रॉप कर दिया गया है।

इस समाज को आइना दिखाती है यह फिल्म

बात बस JNU की नहीं है, बात हाइपर राष्ट्रवाद की भी नहीं है, बात बस इतनी है कि फिल्म का थीम था एक एसिड अटैक सर्वाइवर की कहानी दिखाना। फिल्म सीधे तौर पर एक कहानी भी नहीं कहती है, आप सिनेमा हॉल में जैसे ही बैठते हैं ‘छपाक’ देखने, फिल्म आपको एक आइना पकड़ा देती है कि आप दो-ढाई घंटे खुद को निहारिए। आप इंसान से जानवर बन चुके हैं। जानवर से भी बदतर, क्योंकि जानवर तो एक दूसरे के ऊपर तेजाब नहीं ही फेंकते हैं।

फिल्म आपके साथ-साथ एक आइना सरकार और सरकार में बैठे सो-कॉल्ड एलीट पढ़े-लिखे पॉलिसी-मेकर्स को भी देती है, जो किसी के चेहरे पर गर्म पानी और तेज़ाब फेंकने के मामले में एक ही तरह के कानून और सज़ा का प्रावधान बनाते हैं।

फिल्म उनसे कहती है कि खुद को निहारिए और सोचिए कि अगर आपके चेहरे पर गर्म पानी और तेज़ाब फेंका जाए, तो रिएक्शन क्या एक जैसा ही होगा?

हम तो बस अपनी आवाज़ उठाने वाली हर महिला को अपमानित करना जानते हैं

खैर, एक सभ्य भारतीय पुरुष प्रधान समाज होने के नाते हमारा तो यह कर्तव्य है कि हमें हर उस महिला का अपमान करना है, जो हमारे काले सच को बाहर निकलने की कोशिश करती है, अपने क्राफ्ट के ज़रिये एक कहानी कहने की कोशिश करती है, अपनी अभिव्यक्ति की मौलिक आज़ादी का अभ्यास करना चाहती है लेकिन दीपिका ने तो बोला भी नहीं, फिर भी गालियां तो खा ही रही हैं।

फिल्म का पीआर ही सही, जब आपकी मेहनत और पैसे दोनों दांव पर लगे हों तो ऐसे पीआर के लिए भी हिम्मत ही चाहिए और आज के दौर में JNU में जाकर सरकार के विरोध में खड़ा होने के लिए तो हिम्मत का बंडल चाहिए।

मैं पर्सनली बॉलीवुड में प्रियंका चोपड़ा को बॉलीवुड वीमेन एम्पावरमेंट की एक मिसाल के तौर पर देखता था लेकिन ये बस अपना काम निकालना जानती हैं, अपना जेब भर रही हैं, दिखावे के लिए यूएन गुडविल अम्बेसडर का एक आई कार्ड हो गया, काफी है।

अभी फिलहाल में स्वरा भास्कर, ऋचा चड्ढा, सयानी गुप्ता, कोंकणा सेन शर्मा जैसी अभिनेत्रियों ने जैसे देश के हालातों पर अपनी आवाज़ बुलंद की है और फिर से वीमेन इम्पावरमेंट को सही मायने में दिशा दिया है।

रही बात दीपिका पादुकोण की तो, शायद मैं अगर दीपिका की जगह होता तो मैं भी शायद यहीं देखता कि मेरे प्रोजेक्ट या उसमें किए हुए इन्वेस्टमेंट को नुकसान हो रहा है, तो मैं भी ऐसे किसी विवादित जगह पर नहीं जाता, इतनी हिम्मत मेरे में नहीं थी शायद।

लेकिन दीपिका आपने लोगों को यह दिखा दिया है कि सबकुछ पैसा और फेम ही नहीं होता है। आपके अंदर की आवाज़ बुलंद होनी चाहिए। सही और गलत में फर्क करना आना चाहिए।

वह आपको लेफ्टिस्ट, आतंकवादी, पाकिस्तानी एजेंट, वेश्या, नाचने वाली और पता ना क्या-क्या कहेंगे लेकिन वास्तविकता बस यही है कि आप एक बहुत ही बेहतरीन अदाकारा हैं और उससे भी बेहतर इंसान।

आपके डिप्रेशन में जाने और फिर उससे उबरने वाली बात को पब्लिकली साझा करके आज की हमारी पीढ़ी को एक बहुत बड़ा मेंटल और इमोशनल स्पोर्ट दिया है। आपकी क्राफ्ट और हिम्मत अपने आपमें एक मोटिवेशन है और हां, एक बात और झटककर ज़ुल्फ जब तुम तौलिए से बारिशें आज़ाद करती हो अच्छा लगता है।

Similar Posts

Sign up for the Youth Ki Awaaz Prime Ministerial Brief below