मुस्लिम लड़कियों को तालीम देने वाली पहली महिला फातिमा शेख को क्यों मिली गुमनामी?

19वीं सदी के आरंभ की महिलाओं के जीवनियों से गुज़रते हुए पता चलता है कि उस दौर में महिलाओं को पढ़ने-लिखने की गहरी चाह थी। उस दौर में हर जातीय और धार्मिक समुदाय में लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ा।

जे़रल्डीन फोब्स अपने लेख “एजुकेशन फॉर वुमेन” में 1809 में जन्मी रास सुंदरी देवी के बारे में बताते हैं कि कैसे घरेलू कामकाज और बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारियों से समय चुराकर उन्होंने पढ़ना शुरू किया था।

इसी तरह हेमावती सेन के बारे में भी एक लेख बताता है कि एक उपनिरीक्षक ने एक बार उनसे कुछ सवाल किए थे, जिसका उत्तर उनके भाई नहीं दे पाए थे मगर हेमावती ने सवालों का जवाब दे दिया था दिया था। जिसके बाद  उनके स्कूली शिक्षा की व्यवस्था उपनिरक्षक ने की थी।

मुस्लिम महिलाओं के लिए केवल कुरान

मुस्लिम समाज से संबंध रखने वाली लड़कियों के लिए पढ़ना और भी कठिन था क्योंकि उच्चवर्गीय और निम्नवर्गीय समाज में बंटे हुए मुस्लिम समाज में उच्चवर्गीय मुस्लिम महिलाओं को मज़हबी तालीम लेने की छूट थी मगर निम्नवर्गीय मुस्लिम समाज में वह छूट भी नहीं थी।

हालांकि उच्चवर्गीय मुस्लिम समाज में महिलाएं कुरान और फारसी की प्राथमिक किताबें पढ़ा करती थी।

फातिमा शेख की गुमनामी

मुस्लिम समाज में महिलाओं के तालीम पर समाज सुधारक सर सय्यद द्वारा हटर आयोग के सामने दिए गए अपरिपक्व विचारों को सब याद रखते हैं मगर कोई भी फातिमा शेख को याद नहीं करता। वह मुस्लिम महिलाओं की पहली शिक्षिका थीं, जिन्होंने मुस्लिम लड़कियों के तालिम के बारे में सबसे पहले सोचा। उन्होंने अपनी इस योजना पर काम  सावत्री बाई फुले के साथ मिलकर उनके द्वारा स्थापित स्कूल से प्रारंभ किया था।

सावित्री बाई और ज्योतिराव

उन्होंने सावित्री बाई फुले और उनके पति को स्कूल खोलने की जगह दी थी। इसके साथ ही वह स्वयं भी उस स्कूल में पढ़ाती थी मगर अधिकांश टेक्स्ट बुक ने उनको जगह प्रदान नहीं की है इसलिए उनका नाम आज भी गुमनामी में है।

फातिमा का साहसिक कार्य

फातिमा का काम सावित्री बाई से ज़्यादा साहसी माना जाना चाहिए क्योंकि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को उजागर करने के लिए उन्होंने अपने कदम आगे बढ़ाए। उनके प्रयास ने ही मुस्लिम लड़कियों को आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की कोशिश की, जिसकी बानगी आज भी कहीं ना कहीं दिखती है। उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए ज़मीनी स्तर पर प्रयास किए और उन्हें उनका हक दिलाया।

फातिमा शेख के बारे में जानकारी का स्रोत सावित्री बाई द्वारा पति ज्योतिबा फुले को लिखे पत्र भी हैं। अपने कार्य के लिए उन्हें एक साथ हिंदुओं और मुसलमानों के विरोध का सामना करना पड़ा था। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने उर्दू टेक्स्ट बुक बाल भारती में फातिमा शेख के योगदान का ज़िक्र किया है, जो आज की पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है।

फातिमा शेख

क्यों मिली गुमनामी

सवाल उठता है कि फातिमा शेख को गुमनामी क्यों मिली, जबकि वह भी सावित्री बाई के साथ काम कर रही थीं। आप इस बात पर गौर करें कि सावित्री बाई अपने कार्य के साथ लेखन से भी जुड़ी थीं और लगातार लिख रही थीं। जैसे- पद्द और गद्द आदि मगर फातिमा के लेखन कार्य नहीं मिलते हैं। शायद इसलिए ही वह गुमनामी को मिलीं।

जबकि फतिमा के भाई उस्मान शेख ने फुले दंपति के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और विरोध के बावज़ूद उन्हें स्कूल खोलने के लिए मकान दिया भी दिया था। हालांकि उस्मान शेख के बारे में भी जानकारियों का अभाव है।

दूसरा पहलू यह भी

दूसरे पहलू की अगर बात करें तो मुस्लिम समाज ने कभी भी फातिमा शेख को महत्व नहीं दिया, जिसकी वह हकदार थीं क्योंकि उनमें लड़कियों को शिक्षा देने का उत्साह नहीं था। हालांकि परंपरागत मदरसों में लड़कियां पहले भी जाती थीं।

फातिमा शेख और सावित्री बाई ने 1848 में लड़कियों का स्कूल खोला था। उसके 27 साल बाद 1875 में सर सैय्यद अहमद खान ने मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज खोला, जिसकी बुनियाद पर ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई।

मुस्लमान समाज सैय्यद अहमद खान को शिक्षाविद् के तौर पर जितना महत्व देता है, उसके मुकाबले फातिमा शेख को वह महत्व नहीं मिला।

इतिहास और महिलाओं की शिक्षा

इतिहास कहता है कि महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करनी की चाह थी मगर सकारात्मक प्रयासों के अभाव में कहीं ना कहीं इस डगर को आगे बढ़ने में दिक्कत हुई। हालांकि इतिहास का सौर करने पर यह पता चलता है कि उस दौर में तमाम अंर्तविरोधों के बाद भी स्त्रियों में पढ़ने-लिखने की गहरी चाह थी।

कई महिलाओं के आत्मस्वीकृति और आत्मकथाओं के माध्यम से यह बात उभर कर सामने आती है कि कुछ महिलाएं अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए समय चुराकर पढ़ना-लिखना सीख रही थी।

प्रतीकात्मक तस्वीर

कुछ महिलाएं पति या भाई के सहयोग से पढ़ना-लिखना सीख रही थी तो कई महिलाओं की इच्छा होने के बाद भी कोई विकल्प मौजूद नहीं था। इसके साथ ही यह बात भी मनन करने योग्य हो कि आखिर क्यों महिलाएं अपनी उपलब्धि को छुपाती थीं। इसका कारण बेहद विचित्र है।

बहुसंख्यक परिवारों में यह मान्यता प्रचलित थी कि पढ़ी-लिखी लड़कियां अपने विवाह के बाद विधवा हो जाती हैं या अक्षरों की जानकारी महिलाओं को कुटिल बना देती है। यही कारण था कि महिलाओं चाह के बावजूद भी बढ़े कदमों को रोक लेती थीं मगर वहीं दूसरी ओर सावित्री बाई और फातिमा जैसी भी महिलाएं थीं, जो महिलाओं के हौसलों को पर देने के लिए आगे बढ़ रही थीं।

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