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“मेरे लिए अनजान दिल्ली में इंटरनेट शटडाउन ने मुझे आपातकाल जैसा महसूस कराया”

अभी कुछ दिन पहले ही इंटरनेट शटडाउन का मैं भी शिकार हुआ हूं। अपने शहर से दिल्ली पहुंचा ही था कि पता चला दिल्ली के कुछ हिस्सों में नेट पर पाबंदी लगा दी गई है। एक अनजान शहर और उसमें नेट का बन्द कर दिया जाना अत्यंत स्तब्ध कर देने वाली घटना थी।

जिस नियत स्थान पर मुझे जाना था, उसकी जानकारी गूगल मैप को ही थी जो कि अब सिर्फ खिलौना मात्र था। नेट बंद किए जाने के कारण मेरे लिए वह सटीक लोकेशन ट्रेस कर पाना बेहद मुश्किल था। मेट्रो से सिर्फ अपने गंतव्य स्टेशन तक तो पहुंचा जा सकता था परन्तु जिस कार्यालय मुझे पहुंचना था, वह मेरी पहुंच से कोसों दूर था।

फोटो सोर्स- pixabay.com

घर से चला था, तो कोई चिंता नहीं थी सिर्फ इसलिए कि नेट है तो दुनिया मुट्ठी में है। क्या पता था दिल्ली पहुंचते-पहुंचते नेट दम तोड़ देगा।

नियत स्थान को खोजने में मुझे पूरे ढाई घंटे लग गए। सोचिये, जो स्थान खोजने में चंद मिनट लगते वह मेरी पहुंच से ढाई घंटे दूर हो गया। जो समय था कार्यालय पहुंचने का, वहां मैं डेढ़ घंटे की देरी से पहुंचा। अब आप समझ ही सकते हैं कि कार्यालय में मेरा पहुंचना व्यर्थ ही कहा जा सकता है।

दिल्ली में घूमते हुए मुझे अभी और अधिक समस्याओं का सामना करना था। मैं कार्यालय से फिर होटल की ओर निकल पड़ा था, मैंने मोबाइल निकाला और सोचा होटल बुक कर लेते हैं। अचानक ख्याल आया कि नेट पर तो पाबंदी है। मैंने फोन को झुंझलाहट में पटक कर रख दिया।

मुझे समझ आ गया कि मुझे अब होटल डोर-टू-डोर जाकर ही खोजना होगा। सोचने का विषय है कि एक अनजान शहर में व्यक्ति का यूं भटकते रहना, कितना कष्टदायक होगा। फिर भी संघर्ष करते हुए होटलों की ओर मैंने दौड़ लगा दी थी।

फोटो प्रतीकात्मक है। सोर्स- pexels.com

होटल पहुंचने के बाद उनके आसमान छूते दाम मुझे अंदर ही अंदर रुला रहे थे। नेट के माध्यम से जो होटल सस्ते दामों  पर मिल सकते थे, वह अब मेरे बजट के बाहर थे। इसमें होटल का दोष नहीं था, जिस माध्यम से मैं होटल लेता था, वह होटल से अपना हिस्सा तय करते हुए मुझे सस्ते दाम पर ही होटल उपलब्ध करा देते थे परन्तु नेट बाधित होने से वह मध्यस्थता समाप्त हो गई थी, अब दाम वही निर्धारित होने थे, जो कि होटल का वास्तविक मूल्य है।

उस रोज़ मैं खुद से गुस्सा कर रहा था, उस रोज़ मैंने नेट की पाबंदी का दंश झेला था। उस दिन मैं महसूस कर पा रहा था कि आखिर किस तरह नेट हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना स्वयं के अस्तित्व की कल्पना करना बेईमानी है।

माननीय प्रधानमंत्री जी के डिजिटल भारत का सपना क्या ऐसे ही साकार होगा? आए दिन नेट की पाबंदियां डिजिटलीकरण के सपने को भ्रमित कर रही हैं, इस तरह हम कभी उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकते हैं, जो कि आधुनिक भारत के विकास के लिए आवश्यक है।

भारत में बढ़ती नेट पाबंदी चिंता का विषय है। सरकार को इस ओर ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।

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