जानिए क्यों CAA और NRC आदिवासियों के खिलाफ है?

ट्राइबल अफेयर मिनिस्ट्री के मुताबिक 1.19 मिलियन आदिवासियों के वन अधिकार एप्लीकेशंस को खारिज कर दिया गया। ये एप्लीकेशंस उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर भरी थी।

वन अधिकार अधिनियम 2006 को लागू करते हुए कोर्ट ने फरवरी, 2019 में आदिवासियों को अपने ज़मीनी हक को साबित करने का आदेश दिया था। बिना इस सबूत के वे बेघर हो जाएंगे।

शरणार्थियों की गतिविधियों को नियंत्रित करना कठिन

सितंबर 2019 में कोर्ट ने इस निर्णय पर रोक लगाई थी, लेकिन नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और नागरिकों का राष्ट्रीय पंजीकरण (NRC) से आदिवासियों को अपनी पहचान और हक को साबित करने के लिए दोबारा संघर्ष करना होगा लेकिन इस बार यह और भी कठिन होगा।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 जारी होने के बाद देश भर में विरोध उमड़ा। असम में शुरू हुए इस विरोध को पूरे देश ने आगे बढ़ाया। देशभर में इसका विरोध एक मुस्लिम लोगों के विरूद्ध होने वाले अधिनियम के लिए किया गया। धर्म निरपेक्षता की हत्या करते हुए, इस कानून ने आदिवासियों को भी संकट में डाल दिया है।

अधिनियम में लिखा है कि असम, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा के शड्यूल्ड क्षेत्रों में CAA लागू नहीं किया जाएगा। यहां की आदिवासी जनसंख्या और संस्कृति को बाहरी पलायन से पहले ही बहुत खतरा है।

उत्तर पूर्व में बंगाली हिन्दूओं की बड़ी संख्या से यहां के आदिवासियों की सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता खतरे में हैं। अगर CAA के तहत शरणार्थियों को नागरिकता मिलती है, तो आदिवासियों के अल्पसंख्यक होने की संभावना और बढ़ जाती है।

असम की सीमाएं 6 राज्यों के साथ लगी हुई हैं। असम से दूसरे राज्यों में प्रवेश करना आसान और इन गतिविधियों को नियंत्रित करना मुश्किल होगा।

असम बाकी राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय से सीमा साज़ा करता है।

नागरिकता कानून और भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर

नागरिकता कानून अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के मुल्कों से हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बुद्धिस्ट और पारसी लोगों को भारत में नागरिकता देती है। इसका कट ऑफ तिथि दिसंबर 2014 रखा गया है जो कि बहुत ज़्यादा लोगों को नागरिकता देगी।

सरकार के अनुसार असम में करीब 50,000 लोगों को इसकी मान्यता मिलेगी लेकिन, असल में यह आंकड़ा 1 करोड़ से भी ज़्यादा है। इससे उत्तरी पूर्व भारत की जनसांख्यिकी में बहुत बदलाव आएगा।

आदिवासी समुदाय भारत की आबादी का 8% और अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और मणिपुर की आबादी का 90% हिस्सा है। गैर आदिवासियों के आने से इन राज्यों के आदिवासियों पर बुरा असर पड़ेगा।

असम में NRC लागू होने पर करीब 1 लाख आदिवासी नागरिकों का नाम सूची से गायब था। अगर इसे देश भर में लागू किया गया तो ज़्यादातर आदिवासी अपनी पहचान नहीं साबित कर पाएंगे, क्योंकि उनके पास दस्तावेज़ नहीं होंगे।

दूसरी बात यह है कि CAA को NRC से अलग नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वे एक दूसरे के ही पहलू हैं। NRC के अनुसार जो लोग अपने नाम भारत के नागरिकता रजिस्टर में दर्ज कर पाएंगे, सिर्फ वही नागरिक होंगे।

नागरिकता पाने के लिए किसी भी व्यक्ति या उसके माता पिता का जन्म भारत में 1971 से पहले होना अनिवार्य है। नागरिक रेजिस्ट्री में बहुतों का नाम नहीं था, जिनमें हिन्दू भी शामिल थे। इसपर आरएसएस ने नाराज़गी जताई थी। विशेषज्ञों के अनुसार इन हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए CAA जारी किया गया है, जिसमें हिन्दू धर्म मुख्य पहलू है।

आदिवासियों के लिए हमेशा से मुश्किल रहा है पहचान साबित करना

अपने जंगल के घरों से निकाले जाने का खतरा आदिवासियों पर हमेशा मंडराता है। उन्हें बेघर होने से सिर्फ कागज़ बचा सकते हैं, जो उनके ज़मीनी हकों को साबित कर सकता है, लेकिन लाखों आदिवासियों के आवेदन को खारिज कर दिया गया है।

इसका कारण? बहुतों के पास या तो कागज़ात नहीं थे या जो कागज़ात थे, उन्हें गलत कह दिया गया। कई लोग जिनके पास पट्टे थे, उनकी भी एप्लीकेशंस को नज़र-अंदाज़ कर दिया गया।

CAA और NRC में आदिवासियों को फिर से अपनी पहचान के कागज़ों को दिखाना होगा। वे बहुसंख्यक समाज से नहीं जुड़ें हैं। लाज़मी है कि ऐसे में उनके पास अपने और अपने पूर्वजों के “भारतीय” होने का प्रमाण कागज़ों में नहीं मिलेगा।

नोगाँव, असम में CAA का विरोध करती आदिवासी महिलाएं। फोटो- बलाका छतराज

इसके अलावा, ऑफिशियल प्रक्रियाओं से अशिक्षित, गरीब और दुर्बल हमेशा से परेशान हुए हैं। भारत में सरकारी काम में पैसे और पावर वालों की चलती है और गरीबों को दुष्प्रभाव सहना पड़ता है। यह बात नोटबंदी से लेकर राशन के घपले तक साबित है। ऐसे में CAA और NRC की प्रक्रिया से आदिवासियों को नज़र-अंदाज़ और शोषित ही किया जाएगा।

द वायर के इस चार्ट से समझें CAA और NRC का खतरनाक मेल

धर्म को नागरिकता का आधार बनाना है आदिवासियों के खिलाफ

सरकार यह कह रही है कि हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी धर्मों के लोगों को “धार्मिक शोषण” के कारण नागरिकता दी जाएगी, लेकिन अधिनियम में “धार्मिक शोषण” का कहीं भी ज़िक्र नहीं है। इसलिए यह मानना गलत नहीं होगा कि सरकार इन धर्मों को प्राथमिकता देकर यह कह रही है कि वे इन धर्मों के नागरिक चाहती है।

आदिवासियों के लिए यह संकट है, क्योंकि उनका या तो कोई धर्म नहीं या उनके धर्म को संविधान में मान्यता नहीं मिली है। जब बहुमत सरकार आदिवासियों को “घर वापसी” के नाम पर हिन्दू बताती है और RSS जैसे संघ पूरे देश को “हिन्दू” मानती है, तब यह आदिवासियों के असल धार्मिक रीतियों और परम्परों को भी नज़रअंदाज़ करती हैं। आदिवासी  इन संगठित बहुसंख्यक धर्मों में शामिल नहीं हैं।

जंतर मंतर पर आदिवासी धर्मों को मान्यता देने के लिए धरना।

भारतीय जनगणना में आदिवासियों के धर्म के लिए कोई वर्ग नहीं है। आदिवासी अपने धर्म जैसे सरना, गोंडी, प्रकृति पूजा अथवा में विश्वास रखते हैं। लेकिन, जब उनके धर्मों को सरकार मान्यता नहीं देती है, तो वह संदेश दे रही कि आदिवासियों को बहुसंख्यक धर्मों को अपनाना होगा। CAA में धर्म के शर्त से आदिवासियों में चिंता है। यह उनके अस्तित्व को ही चुनौती दे रहा है।

बंजारे आदिवासी कैसे साबित करेंगे अपनी नागरिकता?

बालकृष्ण रेंके ने डिनोटिफाइड और बंजारे ट्राइब्स पर 11 राज्यों में किए सर्वे में पाया कि 7 करोड़ आदिवासियों के पास अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के कोई कागज़ात नहीं हैं। बहुत सारे आदिवासी संस्थाओं ने CAA और NRC को आदिवासियों और खासकर बंजारे और डिनोटिफाइड जनजातियों के लिए खतरनाक घोषित किया है।

अंग्रेज़ों को बंजारे आदिवासियों से डर था क्योंकि, वे उन्हें नियंत्रित नहीं कर पाते थे। इसलिए उन्हें “अपराधी” ट्राइब्स घोषित कर दिया गया था। आज़ादी के बाद हालांकि उन्हें “डिनोटिफाइड” घोषित किया गया या अपराधी के नाम से हटाया गया, लेकिन आज भी उनपर “अपराधी” का कलंक है।

आदिवासी

इस कारण, डिनोटिफाइड ट्राइब्स जैसे गुजरात के दफीर जनजाति और राजस्थान के सतीया जनजाति आज भी बुनियादी सुविधाओं जैसे शिक्षा, नौकरी और घर से वंचित हैं क्योंकि, उनके पास प्रमाण नहीं है। मदुराई के बंबम्मतकरा और कुरकुरूपक्रगल बंजारे ट्राइब्स को भी शक से देखा जाता है जिस कारण उनके पास कोई सरकारी कागज़ात नहीं है।

बहुत से आदिवासी 6 वीं अनुसूची में ही नहीं हैं, जो आदिवासी या मूलवासी होने का संवैधानिक प्रमाण देती है। मेघालय में बोडो, हजोंग, राभा, जैंत्या आदि अपने इस पहचान के लिए लड़ रहे है। ऐसे में जब उनके क्षेत्र में नागरिकता प्रमाणित करने की बारी आएगी, तब वे इस प्रक्रिया में भी खुद की पहचान को साबित नहीं कर पाएंगे।

राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप ने अपने सर्वे में पाया कि 25,000 बोडो, 9,000 रियांग, 8,000 हजोंग और अन्य जनजाति के हजारों आदिवासी 31 अगस्त, 2019 के NRC से वंचित रह गए हैं। उन्होंने पाया कि उन्हें नागरिकता इस लिए नहीं दी गई क्योंकि वे अपने ज़मीनी हक को प्रमाणित नहीं कर पाए।

गौर करने की बात है कि ये जनजातियां स्थानांतरण खेती करती हैं, जिस कारण वे ना तो एक स्थान पर रहते हैं और ना ही किसी ज़मीन पर अपना मालिकाना हक जताते हैं। वैसे ही जम्मू और कश्मीर के गुज्जर और बकरवाल जनजाति जो बकरी और भेड़े चराते हैं, वे भी अपनी ज़मीन से वंचित हैं।

बंजारे ट्राइब्स के पास ज़मीनी प्रमाण नहीं

तमिलनाडू के इरुला ट्राइब्स पर लगातार शोषण होता और कोई भी अपराध हो तो बस शक के आधार पर बिना सही जांच के इन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। वे बताते हैं कि वे SC/ST Prevention of Atrocities Act,1989 का सहारा भी नहीं ले सकते क्योंकि उन्हें जनजाति सूची में शामिल नहीं किया गया है। ऐसे में जब CAA और NRC से लोगों को “गैर कानूनी” घोषित किया जाएगा, तो बंजारे ट्राइब्स, इनमें ज़रूर होंगे।

भारत पड़ोसी देशों के शरणार्थियों को नागरिकता देने को बेताब है। लेकिन, भारत के अपने बेघर नागरिकों का क्या? गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से लेकर सरदार सरोवर डैम ने करोड़ों आदिवासियों को बेघर कर दिया गया है।

झारखंड और  महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सरकार आदिवासियों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए लाखों आदिवासियों को बेघर कर रही है। इन्हें ना ही निर्धारित मुआवज़ा मिला है और ना ही इनका पुनर्वास किया गया है। बल्कि ये सिर्फ गरीबी में गुमनाम कर दिए गए हैं।

वे शिक्षा, रोज़गार, सेहत और आर्थिक संस्थाओं में पहले से वर्जित हैं। ऐसे में इस एक्ट के बाद आदिवासियों के लिए अपनी पहचान प्रमाणित करना और बुनियादी सुविधाओं जैसे राशन, पानी, घर, नौकरी और शिक्षा को प्राप्त करना और भी कठिन हो जाएगा।

जब सरकार अपने भारतीय नागरिकों को ही असल मायने में नागरिकता नहीं दे सकती है, तो दूसरे मुल्कों के लोगों को नागरिकता देने के बारे में सोच भी कैसे सकती है? जब वे अपने आदिवासी अल्पसंख्यकों के हित के लिए पैसे नहीं दे सकती, तो ऐसे बेकार की प्रक्रियाओं में क्यों खर्च कर रही है?

CAA के खिलाफ आदिवासी

आदिवासी नए और रचनात्मक रूप से देश भर में CAA का विरोध कर रहे है। झारखंड विधान सभा चुनाव में जेएमएम कांग्रेस गठबंधन को चुनकर इस आदिवासी राज्य ने आदिवासियों के खिलाफ नीतियों को खारिज किया है। झारखंड के रांची और जमशेदपुर में कई आदिवासी संगठनों ने CAA के विरोध में प्रोटेस्ट मार्च निकाला है।

देखिए TISS के आदिवासी स्टूडेंट्स को इसके खिलाफ अपने पारंपरिक नाच और संघर्ष के गीतों के माध्यम से विरोध करते हुए।

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=489205901705328&id=243306082961979&fs=0&focus_composer=0

चाहे कागज़ाद दिखाने हो या अपनी पहचान साबित करनी हो, आदिवासियों पर CAA का ज़्यादा और बुरा प्रभाव होगा। साथ ही उत्तर पूर्वी भारत में आदिवासियों की संस्कृति पर भी असर होगा। CAA या NRC के बारे में, या इसके विरोध में बात करते वक्त आदिवासियों पर इन प्रभावों का ध्यान भी रखना ज़रूरी है, और उनके बारे में बात करना भी।

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लेखिका के बारे में- दीप्ती मेरी मिंज (Deepti Mary Minj) ने JNU से डेवलपमेंट एंड लेबर स्टडीज़ में ग्रैजुएशन किया है। आदिवासी, महिला, डेवलपमेंट और राज्य नीतियों जैसे विषयों पर यह शोध और काम रही हैं। अपने खाली समय में यह Apocalypto और Gods Must be Crazy जैसी फिल्मों को देखना पसंद करती हैं। फिलहाल यह जयपाल सिंह मुंडा को पढ़ रही हैं।

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