घुमंतू समुदाय के लोग पूछ रहे हैं, क्या उन्हें डिटेंशन कैंप में जाना पड़ेगा?

26 जनवरी 2020 को हमने अपने देश का 71वां गणतंत्र दिवस मनाया है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश के गणों (हम भारत के लोग) के सामने समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। पूरे देश के लगभग हर हिस्से में गुस्सा, नाराज़गी व्याप्त है।

भारतीय संविधान ने देश के हर एक नागरिक को अपनी तरह से सोचने, समझने, सहमती, असहमति व्यक्त करने की पूरी आज़ादी दी है। प्रशासनिक तंत्र की भी अपनी कार्य करने की शैली है।

आज गण और तंत्र के बीच में किसी तरह का सामंजस्य नज़र नहीं आ रहा है। इस सहयोग, सामंजस्य को बनाए रखना ही वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है। दोनों में अगर सामंजस्य बना रहेगा तो लोकतंत्र भी बचा रहेगा।

देश में चल रही बहुत सारी समस्याओं में से मैं अपने इस लेख के माध्यम से घुमंतू समुदायों की नागरिकता के प्रश्न पर पाठकों का ध्यानाकर्षण करना चाहता हूं।

घुमंतू समुदाय के लोगों का ठिकाना। फोटो सोर्स-जितेंद्र सिंह

ब्रिटिश सरकार के बाद अब वर्तमान भारत सरकार भी घुमंतुओं के लिए खड़ी कर रही है परेशानी

CTA ( क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871) के ज़रिये ब्रिटिश सरकार ने बहुत से घुमंतू समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित किया था। CAA नागरिकता में संशोधन की बात करता है। इस अधिनियम की प्रवृति कैसी है, इस पर मैं अपनी बात नहीं कह रहा हूं।

घुमंतू समुदाय अपनी नागरिकता के प्रश्न को लेकर काफी डरे-सहमे हुए हैं। समाज के अन्य तबकों में भी डर का माहौल बना हुआ है। वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए घुमंतू समुदायों के सन्दर्भ में कुछ सवाल ज़रूर रखने की कोशिश कर रहा हूं।

घुमंतू समुदायों से अक्सर पूछा जाने वाला सवाल, “कौन हो तुम?, कहां से आए हो?” इन सवालों को उन्होंने कभी इतने गंभीर रूप से नहीं लिया, जितना अब ले रहे हैं। अब वे इन सवालों से काफी भयभीत और सशंकित हैं। अग्र लिखित पंक्तियां प्रश्नोत्तर के सन्दर्भ में उन्हीं की ज़ुबानी है-

-तुम कौन हो?
-हम खानाबदोश हैं, साब
-कहां से आए हो?
-हम खानाबदोश हैं, साब।
-कहां जाओगे?
-हम खानाबदोश हैं, साब।
-तुम लोग यहां कब से रह रहे हो?
-आपसे पहले से, साब।
-अपनी ज़ुबान संभाल रे।
-हम अपनी भाषा जानते, साब।
-तुम क्या काम करते हो?
-साब परंपरागत रूप से हम कलाकार रहे हैं… हमने अपने जंगल और ज़मीन खो दी है, इसलिए अब हम अपने अस्तित्व के लिए घूम-घूमकर अपना पेट पालते हैं।
-हम्म। हम जानते हैं कि आप किस तरह के कलाकार हैं। आपके सभी समुदाय “जन्मजात अपराधी हैं।(1)

इनके पास ना कोई गॉंव है, ना खेत है और ना ही कोई कागज़ात हैं

जिस समाज में इनका जन्म हुआ है, उसे भारत की वर्ण-व्यवस्था और समाज-व्यवस्था ने नकारा है। इन समुदायों के पास ना तो कोई गाँव है, ना खेत है, ना किसी जाति का प्रमाण पत्र है और ना ही जन्मदिन के हिसाब-किताब का कोई सबूत है। ऐसे ही लोगों को घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त समुदायों के नाम से जाना जाता है।  

घुमंतू समुदाय के लोगों का ठिकाना। फोटो सोर्स-जितेंद्र सिंह

ब्रिटिश काल में बोए गए थे घुमंतू समुदायों के शोषण के बीज

घुमंतू समुदायों की वंचना और शोषण के बीज औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार ने बोए थे। 1871 का साल, अग्रेज़ों ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से बहुत से समुदाओं को अपनी कलम से जन्मजात अपराधी बना दिया था।

क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू हो चूका था, अंग्रेज़ हंस रहे थे। “जन्मजात अपराधी”- कबुतरा, मोघिया, सांसी, पारधी, बबरिया और भी बहुत सारे घुमंतू समुदायों को बिना किसी अपराध के “अपराधी जनजाति आधिनियम” 1871 के तहत जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया और इनकी सभी प्रकार की गतिविधियों पर लगाम लगा दी गई।  

जिस तरह से औपनिवैशिक काल में अपराधी जनजाति अधिनियम 1871 के तहत इनको “रिफॉरमेटरी सेटेलमेंट्स” में रखा गया था, जहां पर इन समुदाओं के सभी सदस्यों को 4-18 वर्ष में ही खुद को रजिस्टर करना पड़ता था। दिन में तीन बार अपनी हाज़िरी देनी पड़ती थी, बिना हाज़िरी के कोई भी सदस्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा नहीं सकता था। 

स्थानीय ब्रिटिश पुलिस को पूरी शक्ति दी गई थी, शक की बुनियाद पर किसी को भी कैद कर सकती थी।  इन सेटेलमेंट्स में कठोर श्रम के साथ-साथ अमानवीय व्यवहार भी किया जाता था। ये सबकुछ इनके जन्मजात अपराध के व्यवहार को सुधारने के लिए किया जा रहा था। ऐसा ब्रिटिश सरकार के हुक्मरानों का मानना था।

स्वतंत्रता के बाद कानून तौर पर तो मिली मुक्ति मगर ज़मीनी स्तर पर नहीं दिखा कोई असर

फिर हमारा देश 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त हुआ लेकिन ये तब भी जन्मजात अपराधी बने रहें। स्वंत्रतता के लगभग 5 साल बाद 31 अक्टूबर 1952 को इनको जन्मजात अपराधी के कलंक से कानूनी तौर पर मुक्ति मिली। इस दिन को ये समुदाय विमुक्ति दिवस के रूप में मनाते हैं।

समस्या यहीं पर खत्म नहीं हुई थी। इस कलंक को कानूनी रूप से तो खत्म कर दिया गया था लेकिन व्यवहारिक  रूप से आज भी चलन में है और ये इसका दंश झेल रहे हैं। पुलिस, प्रशासन, समाज के सभ्य नागरिक अभी भी इनको अपराधी की नज़र से ही देखते हैं। 

घुमंतू समुदाय के लोगों का ठिकाना। फोटो सोर्स-जितेंद्र सिंह

समाजशास्त्री डी.एन.मजूमदार ने अपनी पुस्तक “फार्च्यूनस ऑफ प्रिमिटिव ट्राइब्स” में बहुत ही संवेदनहीनता के साथ इनको परिभाषित किया है, 

भारत में अपराधी जनजातियों का तात्पर्य उन जन समूहों से है, जो जाति या सामाजिक संबंधों के आधार पर एक-दूसरे से बंधे होते हैं, जो समाज-विरोधी, कार्य-चोरी, ठगी, डकैती, हत्या और दूसरों को शारीरिक चोट पहुंचाने का काम करते है।

कोई भी समुदाय जन्मजात अपराधी नहीं हो सकता है

अभी हाल के घुमंतू समुदायों के अध्ययनों को देखा जाए तो कुछ भारतीय विद्वानों ने इन्हें अपराधी बनाने वाले अधिनियम पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा है कि कोई भी व्यक्ति, समुदाय, समूह जन्मजात अपराधी नहीं हो सकता है। 

अंग्रेज़ों ने अपनी स्वार्थ सिद्धी के चलते कुछ समुदायों को जन्मजात अपराधी घोषित किया था, जो कि किसी भी सभ्य समाज के ऊपर एक कलंक है। रोज़ी-रोटी के सभी साधन और मार्ग इनके लिए बंद कर दिए गए थे। इसी वजह से अनैतिक कामों में इन्हें अपने आपको खपाना पड़ा, यही मात्र विकल्प इनके पास उपलब्ध था। 

इनके ऊपर लगाया गए अपराधी के लेवल का उपयोग ऊपर वालों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए किया। संभवत विश्व में यही ऐसे समुदाय हैं, जिनको जन्मजात अपराधी की मुहर लगाई गई है, विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह से वंचित किया गया है, जिसके चलते आज ये समुदाय मूक और अदृश्य बने हुए हैं। 

रेनेके आयोग ने 2008 में भारत सरकार को भारत के 11 राज्यों के सर्वे के आधार पर “विमुक्त, घुमंतू, अर्ध-घुमंतू समुदायों की स्थिति पर रपट दी, जिसमें कहा गया कि लगभग 7 करोड़ ऐसे भारतीय हैं, जिनके पास अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कोई भी दस्तावेज़ नहीं हैं। इनके पास ना तो जन्म प्रमाण पत्र है, ना ही निवास प्रमाण पत्र और ना ही केंद्र और राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सामाजिक वर्गों (SC, ST, OBC) में नामांकित किया गया है।

इस रपट के दो संस्करणों में इन लोगों के लिए सिफारिश की है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की पहचान दस्तावेज़ या कार्ड दिए जा सकें, जिससे इनको भारतीय नागरिकता मिल सके। (2) 

ऐसी ही मिलती-जुलती रपट इदाते आयोग ने 2018 में भारत सरकार को दी। इदाते आयोग के सर्वे के अनुसार सम्पूर्ण देश में 173 घुमंतू समुदाय (64%), 2 अर्ध-घुमंतू समुदाय (1%) और 94 विमुक्त समुदाय (35%) हैं, जिनको किसी भी श्रेणी (SC, ST, OBC) में अभी तक सम्मिलित नहीं किया गया है। (3) 

दुर्भाग्य से अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है। खानाबदोश समुदायों के कई कार्यकर्ताओं ने नागरिक संशोधन अधिनियम और भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर का विरोध करते हुए इसे घुमंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरा बताया है और ऐसे कानूनों को तत्काल रद्द करने की अपील की है।

प्रकाश अंबेडकर, जो वंचित और घुमंतू समुदायों के कार्यकर्त्ता हैं, उन्होंने कहा कि घुमंतू समुदाय CAA और NRC से सबसे अधिक पीड़ित हैं। यह लड़ाई हिन्दू मुस्लिम के बारे में नहीं है, यह “आरएसएस नागरिकता बनाम संवैधानिक नागरिकता” के बारे में है। ये बातें उन्होंने 26 दिसम्बर को महाराष्ट्र में आयोजित धरने में कही थीं। (4)

नागरिकता संशोधन आधिनियम के आ जाने से इनके साथ क्या घटित होगा?

ये समुदाय लंबे अरसे से अपनी सम्माननीय पहचान, जीवन, नागरिकता के लिए संघर्ष रहे हैं, जो कि अभी तक इनको नहीं दी गई है लेकिन ये अपने होने का, देश की स्वतंत्रता में अपने योगदान, अपनी परंपरागत व्यवसाय, जिनसे इनकी पहचान थी के दावे अभी भी पेश कर रहे हैं।

सबूत के तौर पर इनके पास किसी भी तरह का प्रमाण पत्र नहीं है, वो प्रमाण पत्र जो इनको कभी दिया ही नहीं गया है। क्या CAA इनकी नागरिकता (जो कभी दी  ही नहीं गई) देगा?  

क्योंकि यह जो अधिनियम आया है, वह नागरिकता में संशोधन का अधिनियम है, इसका मतलब, जिसके पास नागरिकता नहीं है उसको नागरिकता देगा या जिसके पास नागरिकता है उससे छीनेगा?

घुमंतुओं की इतनी सिफारिशों के बाद भी भारत सरकार ने अभी तक उनको नागरिकता नहीं दी है। घुमंतू समुदाय के लोग पूछ रहे हैं कि क्या उनको डिटेंशन कैंप में जाना पड़ेगा? अगर ऐसा हुआ तो देश फिर से गुलामी की ओर अग्रसर है।   

इस दिशा में सरकार को गंभीर रूप से ऐसे समुदायों के बारे में सोचना चाहिए। ऐसे में अगर CAA और NRC लागू होता है तो इन समुदायों का क्या होगा? आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, कौन इन्हें कागज़ात देगा? सरकार? जिसने अभी तक इनके बारे में कुछ भी नहीं सोचा है, मुझे कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है।

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1. घुमंतू समुदाय की एक सदस्य  की ज़ुबानी। ऐसे सवाल इनसे अक्सर कोई भी पूछ लेता है।  

2. https://bit.ly/30XnNFW

 3. इदाते कमीशन रिपोर्ट-2018: 105-106

4. https://bit.ly/2Ru4KQu

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