क्या पप्पू यादव सही मायने में हो सकते हैं बिहार के विकास पुरुष?

सितंबर के आखिरी हफ्ते में जब पूरा पटना बाढ़ की विभीषिका झेल रहा था तब ट्विटर इंडिया पर बिहार के पूर्व सांसद पप्‍पू यादव टॉप ट्रेंड कर रहे थे और लोग लिख रहे थे #BiharWantsPappuYadav.

पप्पू यादव बिहार जलजमाव में लोगों की मदद करते हुए। फोटो साभार- ट्विटर

वजह पटना में भीषण बारिश से हुए जलजमाव के बाद, उनके द्वारा चलाया गया राहत व बचाव कार्य, जो अपने आप में एक मिसाल थी। इसके बाद हमने कोशिश की जानने की कि पप्पू यादव है कौन? और साथ ही, बिहार में ऐसी क्या परिस्थिति है कि वहां की जनता ट्विटर के माध्यम से एक पूर्व सांसद जो किसी राष्ट्रीय दल या बिहार के मुख्य राजनीतिक दल का नेता नहीं है, को मुख्मंत्री बनाने की पुरज़ोर मांग कर रही है।

क्या बिहार एक राज्य के तौर पर फेल हुआ है?

बिहार के वर्तमान राजनीतिक दलों की स्थिति पर मुझे  इटली के सुप्रसिद्ध समाजिक वैज्ञानिक विलफ्रेडो पेरेटो के “शासन परिवर्तन के सिद्धांत”(government change) में “कुलीनों के संचलन”(circulation of elite) के विचार की याद आ गई।

इसमें पेरेटो का तर्क है कि इस तरह की व्यवस्था में शासन परिवर्तन तब नहीं होता है जब शासक/ सरकार नीचे से उखाड़ दिए जाते हैं, लेकिन  तब होता है, जब एक कुलीन दूसरे की जगह लेता है।

पप्पू यादव बिहार जलजमाव में लोगों की मदद करते हुए। फोटो साभार- ट्विटर

विल्फ्रेडो पेरेटो ने आगे तर्क दिया कि इन परिवर्तनों में आम जनता की भूमिका केवल सत्ता में बैठे लोगों के समर्थकों और अनुयायियों की होती है। बिहार राज्य इस सिद्धांत का एक जीता जागता उदाहरण है। जहां के आम लोग यह भूल गए हैं कि उनके कुछ अधिकार हैं। साथ ही सरकार और विपक्ष में बैठे लोगों की उनके लिए ज़िम्मेदारी है।

पप्पू यादव सांसद के रूप में भी थे समर्पित

बिहार के इन हालातों के बीच मधेपुरा और पूर्णिया से कई बार निर्दलीय सांसद रहे पप्पू यादव बिहार में बुनियादी बदलाव की लड़ाई लड़ रहे हैं। मानवता के विचारों को अपने जीवन का दर्शन मानने वाले पप्पू यादव की चर्चा उनके बेबाक, बेलौस अंदाज़ के कारण भी की जाती है।

वे भारत ही नहीं दुनिया भर के कई स्वयंसेवी व सामाजिक संस्थाओं के ज़रिये गरीबों, पीड़ितों, शोषितों और रोगियों की भलाई में दिन रात कार्यरत रहते हैं।

पप्पू यादव बिहार जलजमाव में लोगों की मदद करते हुए। फोटो साभार- ट्विटर

इतना ही नहीं, जब वह 2014-19 के बीच सांसद थे, तब नई दिल्ली के बलवंत राय मेहता लेन स्थित अपनी सरकारी कोठी को उन्होंने देश भर से इलाज के लिये राजधानी आने वाले गरीब और परेशान लोगों के लिये पनाहगार बना रखा था। जो मानवता का एक अनूठा उदाहरण था। वहां लोगों को एम्स आदि अस्पतालों में इलाज के लिये मदद के साथ-साथ रहने और खाने की मुफ्त व्यवस्था, वे खुद अपनी देख-रेख में करवाते थे।

पटना में हुए बाढ़ और जलजमाव के दौरान पप्पू यादव ने तन-मन और धन से ज़रूरतमंदों की मदद की थी और लगातार पटना के बाढ़ प्रभावित इलाकों का खुद दौरा कर राहत साम्रगी पहुंचाई थी। बाढ़ और जलजमाव के खत्म हो जाने पर पटना में अलग-अलग जगहों पर मेडकिल कैंप लगाया।

बिहार राज्य का जंगल राज

2000 के दशक के शुरुआती दिनों में याद रखने वाले अधिकांश भारतीय बिहार को “जंगल राज” के लिए याद करते थे। बिहार एक शोक था, अंधेरे युग में फंसा एक राज्य, एक जगह जहां समय अभी भी खड़ा है।

बिहार में 2005 से 2019 तक स्व-घोषित “विकास पुरुष नीतीश कुमार” होने के बावजूद कई वर्षों से स्थिति जस की तस है। राज्य में समृद्ध मानव संसाधनों के बावजूद, इसके अधिकांश लोग पृथ्वी पर कल्पना करने वाली सबसे खराब परिस्थितियों में रहते हैं।

पप्पू यादव बिहार जलजमाव में लोगों की मदद करते हुए। फोटो साभार- ट्विटर

भारत सरकार और अन्य प्रतिष्ठित संगठनों, थिंक टैंकों की कोई भी रिपोर्ट लें, बिहार की स्थिति हाशिये पर है। वैसे राज्य में जहां हालात बदलने की बहुत आवश्यकता है, वहां पप्पू यादव कुछ मौलिक प्रश्न कर रहे हैं कि बिहार के “सत्तारूढ़ राजनीतिक वर्ग ने राज्य को विकास के सभी बुनियादी मानकों पर लगातार विफल क्यों कर दिया है?

  • बिहार को इतना पिछड़ा क्यों रहना चाहिए?
  • आधुनिक सामंतवाद और अतीत के बोझ से बिहार के लोगों को लगातार आतंकित क्यों किया जा रहा है? विकास और प्रगति के रास्ते पर राजनीति साज़िश क्यों कि जा रही है?

बिहार के मुख्य राजनीतिक दल जदयू,भाजपा जब विकास की बात करते है तब इक़बाल का एक शेर याद आता है,

मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमां की हरारत वालों ने, मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन ना सका।

पप्पू यादव बिहार जलजमाव में लोगों की मदद करते हुए। फोटो साभार- ट्विटर

बिहार की ऐसी बुरी हालत में पप्पू यादव बिहार में एक व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे कोशिश कर रहे हैं कि बिहार के बुनियादी मुद्दों पर बात हो और आज़ादी से आज तक स्वास्थ, शिक्षा और सुरक्षा के बुनियादी ज़रूरतों से कोसों दूर रहने वाले बिहार की गरीब जनता का भला हो।

पूरे घटनाक्रम को जानने के बाद मुझे यह लगा कि पप्पू यादव इस सोच के साथ निकले हैं,

माना कि अंधरा घना है, लेकिन दीया जलाना कहां मना है।

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