हमारे प्रधानमंत्री जी की नफरत फैलाने वाले नेताओं से दोस्ती क्यों है?

जब मैं छोटा था, तब मेरे दादा रेडियो पर अकसर एक हरियाणवी लोकगीत सुनते थे। जिसका मतलब कुछ ऐसे था कि पानी में पानी मिल जाता है, मिट्टी में मिट्टी, पक्षियों में पक्षी और जानवरों में जानवर।

एक कहावत भी है कि अगर आदमी का चरित्र जानना हो तो उसके मित्रों और उसके साथ उठने बैठने वालों का चरित्र देख लो। आपने देखा भी होगा कि शराबी, शराबियों के साथ बैठते हैं, चोर उचक्के चोर उचक्कों के पास और तानाशाह, तानाशाहों के पास। जैसे हिटलर और मुसोलिनी मिलकर लडे थे।

अमेरिकी अखबार भी आलोचना करते हैं कि ट्रम्प की केमिस्ट्री किम जोंग उन और ‎मोहम्मद बिन सलमान के साथ इतनी अच्छी क्यों है? क्या वह तानाशाही सोच के नेता हैं? लेकिन हमारे प्रधानमंत्री इस पैमाने पर कहां खडे हैं?

सऊदी अरब के क्राऊन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फोटो साभार- Flicker

सऊदी प्रिंस का दुश्मन हमारे प्रधानमंत्री का दुश्मन

पिछले दिनों अमेज़न के मालिक जेफ बेजोस का फोन हैक हो गया। उनके पर्सनल मैसेज और फोटो लीक हो गए। इस वजह से ही उनका बहुचर्चित तलाक हुआ, लेकिन यह किया किसने और क्यों?

एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी प्रिंस सलमान ने बेजोस के फोन पर एक स्पाइवेयर (जासूसी वायरस) भेजा, जिससे बेजोस के फोन की सारी जानकारी सऊदी अरब लीक होने लगी। ऐसा सऊदी प्रिंस ने इसलिए किया क्योंकि जेफ बेजोस के स्वामित्व वाले अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने खगोशी हत्या मामले में उसकी बहुत आलोचना की थी, लेकिन इस बात से मोदी का क्या लेना देना?

पिछले दिनों बेजोस भारत आए और 1 अरब डाॅलर के निवेश की घोषणा की, लेकिन मोदी या किसी मंत्री ने उनसे मिलना तक ज़रूरी नहीं समझा। वह भी ऐसे समय में जब भारत को विदेशी निवेश की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। उल्टे पीयूष गोयल बोले कि उन्होनें निवेश करके हम पर कोई एहसान नहीं कर दिया।

कारण? वाशिंगटन पोस्ट द्वारा मोदी की आलोचना और सऊदी प्रिंस और मोदी की दोस्ती। गौरतलब है कि सऊदी प्रिंस की आगवानी के लिए मोदी प्रोटोकाॅल तोड कर खुद एयरपोर्ट गए थे।

नरेन्द्र मोदी और बोल्सनारो
नरेन्द्र मोदी और ब्राज़ील के राष्ट्रपति ज़ायर बोल्सनारो

महिला और समलैंगिक विरोधी मोदी जी के दोस्त

गणतंत्र दिवस पर मोदी सरकार ने मुख्य अतिथि बनाया ब्राज़ील के कुख्यात राष्ट्रपति ज़ायर बोलसोनारो को। महिला और समलैंगिक विरोधी बयान देने वाला ये नेता खुद को चीली के कुख्यात तानाशाह अगुस्तो पिनोशे का फैन मानता है।

कह चुका है कि लोकतंत्र से राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान नहीं होता है। वहां की जनता इसको अमेज़न की भीषण आग का दोषी मानती है। बोलसोनारो को गरीबी से भी नफरत है और वह गरीबों की नसबंदी की बात करता हैं। कहीं ना कहीं बोलसोनारो की छवि ट्रम्प और मोदी से मिलती जुलती है।

वही ट्रम्प हैं, जिनकी मोदी से ऐसी दोस्ती है कि कृष्ण और सुदामा भी शरमा जाएं। पिछले दिनों हाउडी मोदी नाम का तमाशा हुआ। जिसमें मोदी ने अपने पद की गरिमा को तार-तार करके अमेरिकी लोकतंत्र की संप्रभुता को चुनौती दे कर “अब की बार ट्रम्प सरकार ” का नारा दे दिया।

ट्रम्प की छवि भी तानाशाह वाली मानी जाती है। ट्रम्प अकसर अपने देश की मीडिया की आलोचना करते रहते हैं, लेकिन मोदी मीडिया की आलोचना नहीं करते बल्कि आर्थिक सहयोग करते हैं। जिसकी वजह से भारत का मीडिया 2014 के बाद से बहुत ज़्यादा प्रगति कर रहा है।

कानून को ताक में रखने वाले दोस्त

मोदी के मित्रों की चर्चा हो और इज़रायल के पूर्व प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का नाम ना आए ऐसा संभव नहीं है। मोदी के बाकी मित्रों की तरह नेतन्याहू की छवि भी घोर दक्षिणपंथी तानाशाह की रही है। इजरायल के कई अखबार उनको लोकतांत्रिक तानाशाह बोल चुके हैं।

नेतन्याहू पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उसने खुद को बचाने के लिए कानून में बदलाव की कोशिश की और संसद में मांग की कि उनको कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की जाए।

पिछले दिनों इजराइल में चुनाव हुए, जिसमें नेतन्याहू ने मोदी की तस्वीर अपने प्रचार के लिए प्रयोग की जबकि लोकतंत्र की पहली शर्त यह है कि चुनाव बाहरी या विदेशी प्रभाव से मुक्त रहे।

क्या दुनिया का सबसे बडा लोकतंत्र होने के नाते भारत को इस पर आपत्ति दर्ज नहीं करनी चाहिए थी? क्या दोस्ती के लिए देश की छवि और सिद्धांतो को ताक पर रखना किसी देशद्रोह से कम है?

आज जब देश में सरकार अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ का दमन कर रही है, तो ऐसे में सवाल तो बनता ही है कि मोदी की दुनिया भर के तानाशाहों से दोस्ती के देश के लिए क्या मायने हैं।

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