“क्या पिछले 7 दशकों के गणतंत्र दिवस के भाषणों का कुछ परिणाम प्राप्त हुआ है?”

खुशी होती है सुनकर कि देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुए 73 वर्ष तथा संवैधानिक रुप से स्वतंत्र हुए 70 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। गणतंत्र दिवस यह संदेश देता है कि हमें संवैधानिक अधिकार और स्वतंत्रताएं प्राप्त हुई हैं और यह अधिक महत्वपूर्ण है उस स्वतंत्रता से जो कुछ पहले प्राप्त हो गई थी।

सोचने की बात है कि पिछले लगभग 7 दशक से हम सभी देश के धरोहर लाल किला और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर खड़े होकर झंडा फहराने और भाषण देने की परंपराएं निभा रहे हैं परंतु एक बार भी हम यह नहीं सोचते हैं कि जैसे अन्य विधाओं में हम परिवर्तन कर रहे हैं, इस परिपेक्ष्य में भी समय है कि हम बदलाव लाएं।

गणतंत्र दिवस केवल मंच पर खड़े होकर अपने मन की बात को सबके सामने परोसने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मिठाईयां बांटने के लिए नहीं रखा गया है। इसके अंदर एक महत्वपूर्ण बात छिपी है, जिसको हम हमेशा नज़रअंदाज़ करते हैं या फिर जिसके बारे में हम स्वयं जानकारी नहीं रखते हैं।

हम अपने कर्तव्यों से परिचित भी नहीं हैं

सर्दियों में बैठे लोग
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- Flickr

देश में लगातार अपराध करने वाले अपराधी सड़कों पर खुलेआम घूम रहे हैं और कोई निर्दोष बिना अपराध किए ही जेल की कोठरियों में अपना जीवन काट रहा है, तलाश कर रहा है कि उसे इंसाफ मिले। ऐसे में किस बात की संवैधानिक स्वतंत्रता मानी जाए?

आज देश में कक्षा 12 तक कोई ऐसा विषय नहीं है, जिससे बच्चे देश के संविधान और कानून की आधारभूत जानकारियां प्राप्त कर सकें। कुछ उच्च कक्षाओं में सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत राजनीति शास्त्र की शिक्षा भी दी जाती है, जिनमें इसे बहुत संक्षेप में रख दिया जाता है, फिर बच्चे पूर्ण जानकारी से अनभिज्ञ रह जाते हैं।

देश की शिक्षा केवल विज्ञान, चिकित्सा और वाणिज्य के क्षेत्र में उन्नति पर है लेकिन इन सब को सुचारू रूप से संचालित करने वाले विधि शिक्षा पर देश के किसी भी शीर्ष समिति का ध्यान नहीं है। देश की गरीबी का पैमाना अन्न और आय से तय होता है और हम भूल जाते हैं कि वैधानिक साक्षरता भी किसी देश की गरीबी को मापने के लिए पैमाने के रूप में प्रयुक्त होता है।

वर्तमान समय मे स्थिति यह है कि हमें चिंता और लड़ाई अपने अधिकारों को लेकर है और हम अपने मूलभूत कर्तव्यों से परिचित भी नहीं हैं। देश में प्रत्येक मांग लोगों के अधिकारों की पूर्ति हेतु उठती है एवं इस मांग को लेकर किए गए प्रदर्शन में ना जाने कौन-कौन से कानूनी कर्तव्यों से हम विमूढ़ होते हैं, इसपर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है।

अधिकारों की जानकारी के अभाव में होने वाले शोषण

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प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

आज हम अधिकारों की मांग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम लेकर ना जाने कितनी सीमाओं को तोड़ देते हैं। इसका हमें स्वयं अंदाज़ा नहीं होता है, फिर लोकप्रियता हासिल करने हेतु देश मे असहिष्णुता की व्याप्तता और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित होने का बयान देते हैं।

देश के सभी लोग विधि शास्त्र के प्रणेता भले ही नहीं बनें लेकिन उन्हें उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों की जानकारी तो अवश्य ही होनी चाहिए, क्योंकि आज हमारा सर्वाधिक शोषण अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होने के कारण होता है।

देश का प्रशासन सदैव उन्हीं का शोषण करता है जो आर्थिक,सामाजिक अथवा शैक्षणिक रूप से पिछड़े होते हैं और हम इसी शैक्षणिक स्थिति हो मज़बूत नहीं करते हैं।
हम इन राष्ट्रीय दिवसों पर सार्वजनिक मंचों पर खड़े होकर सदैव पाकिस्तान और आंतकवाद का विरोध करते हुए बहुत जोशीले भाषण देते हैं।

हमें सोचना होगा कि पिछले 7 दशकों के भाषणों का क्या परिणाम प्राप्त हुआ है? देश की शैक्षणिक, राजनैतिक, सामाजिक या आर्थिक संदर्भों में इन भाषणों का क्या योगदान रहा है?

अगर हम सच में सामाजिक बुराइयों का दमन करके देश मे सुधार लाना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम अपने देश के अंदर की बुराइयों को समाप्त करना पड़ेगा। समाप्त करना पड़ेगा उन बच्चों के बोझ को जिनके पीठ पर किताबों से अधिक पेट में भोजन का बोझ है।

हमारा ध्यान कभी इन आवश्यकताओं की तरफ नहीं जाता है। हम अपने अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन जब अपने क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले में आरटीआई की बात आती है, तो चुप्पी साध लेते हैं। हमें लगता है कि मुझे इससे क्या मतलब?

किन्नर और जनजातीय समुदाय के अधिकारों की बात करनी होगी

LGBTQ
प्रतीकात्मक तस्वीर।  फोटो साभार- Flickr

आज कल के क्षेत्रीय नेता कुर्ता पैजामा पहनकर पान मुंह में रखकर सबको ज्ञान बांटते हैं। जबकि उनके पास स्वयं यह ज्ञान नहीं होता है कि देश के राष्ट्रीय प्रतीक और धरोहर कौन-कौन से हैं। अब तो स्थिति यह है कि राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान में अंतर नहीं जानने वाले लोग हमारे राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बने रहते हैं।

हम राष्ट्र की बात तो करते हैं, राष्ट्रीय स्थिति सुधारने की बात तो बड़ी-बड़ी बात करते हैं लेकिन कभी राष्ट्र की ज़रूरतों को लेकर प्रयास नहीं करते हैं। देश में आरक्षण की मांग हम जातिगत आधार पर करते हैं, लैंगिक आधार पर करते हैं लेकिन कभी देश की उस आबादी के बारे में हमारा ध्यान नहीं जाता है, जो जन्म से ही सामाजिक बहिष्कार का शिकार हो जाते हैं।

जी हां, मैं किन्नरों की ही बात कर रहा हूं, जो जन्म के समय से ही उपेक्षा का शिकार होते हैं। ना उन्हें भारत की विधायिका में स्थान है और ना ही सरकारी संस्थानों में ज़्यादा अवसर प्राप्त होते हैं। वे अपने जीवन का निर्वहन जिस तरह से करते हैं, वह हम सभी के लिए कोई नई बात नहीं है, फिर भी हम अभी तक इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने में असफल रहे हैं।

वहीं, अगर जनजातीय समुदाय की बात करें तो वे सुदूर प्रांतों में बिना आधारभूत आवश्यकताओं को पूर्ण किए अपना जीवन निर्वहन करते हैं। ये समुदाय अभी तक हमारी भाषाओं से भी अनभिज्ञ हैं, तो क्या इस गणतंत्र दिवस पर यह आवश्यक नहीं कि उन्हें सबसे पहले साथ जोड़ा जाए?

क्या हमारे इस गणतंत्रात्मक देश मे कभी यह पहल की गई है या ऐसा कोई अभियान चलाया गया है जिस से लोग सामाजिक बदलाव हेतु, सामाजिक संरक्षण हेतु अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों से अवगत हो सकें तथा अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकें।

सिर्फ सरकार ही नहीं, हमारी भी उतनी ही ज़िम्मेदारी है

टीवी देखते लोग
प्रतीकात्मक तस्वीर। फोटो साभार- सोशल मीडिया

इस नाकामी में केवल सरकार और प्रशासन का ही दोष नहीं है, हम भी इसमें समान रूप से दोषी हैं। आज किसी कार्य हेतु अधिकारी रिश्वत बाद में मांगता है, हम पहले पहुंच जाते हैं कि कुछ देने से शायद कार्य आसान हो जाए। आज आधार कार्ड, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन और इंदिरा आवास, मनरेगा जैसी योजनाओं में जिस प्रकार से भ्रष्टाचार हो रहा है, उससे सभी लोग भली भांति परिचित हैं लेकिन इसका विरोध नहीं करते हैं।

आज निशुल्क योजनाओं में भी हम शुल्क इसलिए देते हैं ताकि हमारा कार्य आसान हो जाए। क्षेत्रीय नेताओं की चापलूसी में हम इतने गिर चुके हैं कि उन सभी के गलत कार्यों का विरोध करने वालों का ही हम विरोध करने लगते हैं।

आज सरकारी विद्यालयों, अस्पतालों , बस अड्डों या अन्य सार्वजनिक क्षेत्रों में जिस प्रकार की समस्याएं हैं, उनके विरुद्ध हम सब कुछ देखते हुए भी आवाज़ नहीं उठाते हैं क्योंकि इस देश में या तो हम अपने अधिकारों से परिचित नहीं हैं या हमें डर लगता है कि हमें शोषण का शिकार नहीं होना पड़े।

आज शिक्षा विभाग के अंदर हम सूचना का अधिकार का प्रयोग नहीं करते, क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि कहीं अधिकारी अगले दिन ही हमारी जांच कर हमपर कार्रवाई ना कर दे। इसलिए हमें सर्वप्रथम अपने अधिकारों को जानने की आवश्यकता है, फिर उसमें बदलाव करने हेतु प्रयास करने की पहल करनी है।

इस गणतंत्र दिवस पर हमें ज़रूरत है सामाजिक बदलाव लाने हेतु देश मे वैधानिक शिक्षा के प्रसार करने की, जिससे हम गिरफ्तारी के समय के अधिकार, उपभोक्ता संरक्षण, वैधानिक विवाह, यात्रा के दौरान प्राप्त अधिकार, सरकारी योजनाओं की जानकारी, शिक्षा का अधिकार इत्यादि के बारे में समाज को जागरूक कर पाएं और यहीं हमारे गणतंत्र की सच्ची जीत होगी। हम बनेंगे विश्व के सबसे मज़बूत गणतांत्रिक देश और निर्माण होगा सशक्त भारत का।

Created by राष्ट्रवादी अंकित देव अर्पण

क्या आपको लगता है कि देश में वैधानिक साक्षरता महत्वपूर्ण है ?

जय हिंद , जय गणतंत्र।

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